Vishnu Sridhar Wakankar
Vishnu Sridhar Wakankar

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विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म कब और कहाँ हुआ?

Vishnu Sridhar Wakankar jiwani :  विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म 4 मई, 1919 को भारत के एक छोटे से गाँव नीमच, जिला मंदसौर, मध्य प्रदेश में हुआ था।  वह एक किसान परिवार का सबसे बड़ा बेटा है और एक पारंपरिक हिंदू घराने में पला-बढ़ा है। विष्णु श्रीधर वाकणकर  को हरिभाऊ के नाम से भी जाना जाता है।

विष्णु श्रीधर वाकणकर  का जीवन परिचय

Vishnu Sridhar Wakankar : पूना विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् डॉ . एच . डी . सांकलिया ने लिखा है कि इतने सीमित साधनों में ऐसा महान् कार्य करना यदि सम्भव है , तो डॉ . वाकणकर ही कर सकते हैं । विश्व में कहीं भी प्रागैतिहासिककाल के चित्रों की चर्चा परिचर्चा होगी , तो ‘ भीम बैठका ‘ अवश्य याद किया जाएगा और उसके अन्वेषक डॉ . वाकणकर के श्रम , कर्तव्य , अध्यवसाय व लगनशीलता की विशेष सराहना की जाएगी ।

Vishnu Sridhar Wakankar : आज उन्होंने विश्व का ध्यान उस स्थल की ओर आकर्षित किया है , जो आगे चलकर हम पुरातत्वविदों के लिए तीर्थस्थल सिद्ध होगा । ज्ञातव्य है कि विक्रम विश्वविद्यालय , उज्जैन के पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष विश्व विख्यात पुरातत्वविद् , चर्चित चित्रकार पद्मश्री डॉ . विष्णु श्रीधर वाकणकर एवं भोपाल होशंगाबाद मार्ग पर ओबेदुल्ला गंज से 90 किमी , विंध्याचल के उच्च शिखर पर अवस्थित ‘ भीम बैठका ‘ दोनों एक – दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं ।

विष्णु श्रीधर वाकणकर का जीवन परिचय

नामविष्णु श्रीधर वाकणकर
उपनामहरिभाऊ
जन्म 4 मई 1919
जन्म स्थाननीमच, जिला मंदसौर, मध्य प्रदेश
मृत्यु3 अप्रैल 1988
मृत्यु स्थान (उम्र 68) सिंगापुर
शिक्षाजीडी (कला), एमए और पीएच.डी.
योगदानकला सृजन , कला शिक्षण , शैल चित्र , शोध कार्य तथा प्रदर्शनी संयोजन
ग्रन्थए लॉस्ट पैराडाइज
खोजभीमबेटका
सम्मानितपद्मश्री से सम्मानित
पद्मश्री से सम्मानित 1975 में पद्मश्री
प्रसिद्ध हैभीमबेटका रॉक गुफाओं की खोज ।
विष्णु श्रीधर वाकणकर का जीवन परिचय

विष्णु श्रीधर वाकणकर के अश्चर्जनाक कार्य

Vishnu Sridhar Wakankar : मानव अस्तित्व के 20 लाख वर्ष पूर्व तक के प्रमाण तथा 40,000 वर्ष पूर्व का मानव अस्थि – पिंजर एवं 30 हजार वर्ष की प्राचीनतम् चित्रकला के प्रमाण के लिए भीम बैठका का वैज्ञानिक उत्खनन करने वाले डॉ . वाकणकर ने विश्व के अन्वेषणों में एक कीर्तिमान स्थापित किया है । डॉ . वाकणकर का कई – कई रात – दिन शेर – चीते रीछ जैसे वनैले जन्तुओं की भयावह आवाजों के बीच एकांत , निर्जन व दुर्गम वन का अन्वेषण स्थल भीम बैठका विश्व के मानचित्र पर आज उल्का की भाँति दैदीप्यमान है ।

Vishnu Sridhar Wakankar : इसी प्रकार उज्जैन , कायथा , इन्दौर , दंगवाड़ा एवं रुणीजा के पुरातात्विक उत्खनन के लिए भी डॉ . वाकणकर की भूरि – भूरि प्रशंसा की जा रही है । कायथा के उत्खनन में प्राप्त गेहूँ के दानों की काल गणना करते हुए टाटा इन्स्टीट्यूट ने गेहूँ के दानों को ईसा से 1500 वर्ष पूर्व का माना है । इस खोज पर भारत के अप्रतिम पुराविद् व प्राच्य विद्या के विशारद नीतिन बाबू चटर्जी भी चकित रह गए हैं।

विष्णु श्रीधर वाकणकर  : आज डॉ . विष्णु श्रीधर वाकणकर एक व्यक्ति के रूप में नहीं , बल्कि एक सम्पूर्ण संस्था  के समकक्ष वंदनीय हैं । विष्णु श्रीधर वाकणकर  का जीवन परिचय इतिहास एवं संस्कृति परिचय का प्रमुख केन्द्र है , चित्रकार रवि वर्मा से पिकासो तक के चित्रकला विकास क्रम में चित्रांकन करने वाले भारतीय प्राचीन संस्कृति के प्रति पूर्णतया विदेशों में खूब ख्याति प्राप्त की है ।

भीमबेटका क्या है

भीमबेटका मध्य भारत में रॉक आश्रयों का एक नेटवर्क है जो लेट प्लीस्टोसिन और अर्ली होलोसीन के बीच मनुष्यों द्वारा बसा हुआ था।  भीमबेटका शैलाश्रय अपने पर्यावरण में अद्वितीय हैं और भारत में मानव निवास के सबसे पुराने प्रमाणों में से हैं।  भीमबेटका रॉक शेल्टर मध्य भारत में समुद्र तल से लगभग 1,600-1,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं।  भीमबेटका रॉक शेल्टर पास के अरावती ज्वालामुखी से लावा प्रवाह द्वारा बनाए गए थे।

भीमबेटका रॉक शेल्टर भारत के मध्य प्रदेश के भीमबेटका के बेथमचेरला क्षेत्र में स्थित रॉक शेल्टर की एक श्रृंखला है।  भीमबेटका नाम एक स्थानीय राजा, भीम के नाम से लिया गया है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने लगभग 300 ईसा पूर्व रॉक आश्रयों का निर्माण किया था।  भीमबेटका शैलाश्रय भारत में सबसे पहले उत्खनित शैल आश्रय हैं, और वे भारतीय जनसंख्या की उत्पत्ति को समझने में एक महत्वपूर्ण स्थल रहे हैं।  भीमबेटका रॉक शेल्टर भारत के मध्य प्रदेश के भीमबेटका के बेथमचेरला क्षेत्र में स्थित हैं।

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विष्णु श्रीधर वाकणकर का संगम सरस्वती की खोज और विशेषता

Vishnu Sridhar Wakankar : डॉ . विष्णु श्रीधर वाकणकर 69 वर्ष की आयु में आज भी भारतीय अस्मिता के शाश्वत जीवन मूल्यों की स्थापना हेतु सतत् कार्यरत हैं । समर्पित डॉ . वाकणकर एक युगांतकारी व्यक्तित्व हैं । उनकी एकल चित्रकला प्रदर्शनी ने देश भारत की तमाम प्राचीन धार्मिक सांस्कृतिक गाथाओं में गंगा यमुना सरस्वती के

संगमकी चर्चा पढ़कर डॉ . वाकणकर को जब विलुप्त सरस्वती के दर्शन नहीं हुए , तो उन्होंने सरस्वती की खोज में हिमालय से लेकर राजस्थान , पंजाब , दिल्ली , हरियाणा की अनुमानित 4000 किमी पैदल यात्रा करके सत्य खोज निकालने में सफलता प्राप्त करके ही दम लिया ।

विष्णु श्रीधर वाकणकर  : उन्होंने अन्तर्गर्भा सरस्वती की धारा को विभिन्न स्थलों पर दृष्टिगोचर पाकर एक नवीनतम् खोज का परिचय कराया । डॉ . वाकणकर की विशेषता ही यह है कि वह हमेशा चित्रकला , मूर्तिकला , इतिहास अथवा पुरातत्व में नए – नए अन्वेषण एवं अनुसंधान करते ही रहते हैं । अतः डॉ . शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा उन्हें ‘ नवोन्मेषी विद्वान् ‘ कहा गया है ।

विष्णु श्रीधर वाकणकर के श्लोक और कला मे योगदान

Vishnu Sridhar Wakankar :   डॉ . वाशम , डॉ . आर . आर . बुक्स प्रभृति विश्व के महान् पुरातत्वविदों की कोटि के इस मनीषी कलाकार के एक संस्मरण के उल्लेख का मैं मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ – प्रिंस वेल्स म्यूजियम , लन्दन के भोज द्वारा निर्मित द्वार की सरस्वती प्रतिमा का , पुष्प और संस्कृत श्लोकों से अभिषेक करते हुए जब डॉ . वाकणकर को संग्रहालय के अधीक्षक ने टोका ,

तो वाकणकर बोले कि ” भोज की राज्य सभा में नित नए – नए श्लोक सुनने वाली माँ ने वर्षों से कोई संस्कृत छन्द नहीं सुना है । अतः मैं माँ के श्रीचरणों में श्लोक अर्पित कर रहा हूँ ।

” ऐसे सटीक मृदुभाषी मनीषी की सहज श्रद्धा भावना से सभी विद्वानों को मोह लिया है ।  ” प्रसिद्ध व्यंग्य चित्रकार आबू ने कहा था कि- ” इन प्रागैतिहासिककाल के चित्रों को भाषा देने का कार्य डॉ . वाकणकर ने ही किया है ।

अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्ववेत्ता डॉ वि . वाकणकर का कला सृजन , कला शिक्षण , शैल चित्र , शोध कार्य तथा प्रदर्शनी संयोजन में अभूतपूर्व योगदान अविस्मरणीय है । लन्दन , पेरिस , न्यूयॉर्क , फ्रेंकफर्ट , औरलेण्डों , लॉस एंजिल्स , रोम एवं दक्षिण एशिया के कई देशों में 69 वर्षीय वाकणकर अपनी कला – प्रदर्शनियों तथा वक्तव्यों को प्रचारित कर चुके हैं ।

विष्णु श्रीधर वाकणकर का भारतीय संस्कृति और विज्ञान के प्रति दृष्टिकोण

Vishnu Sridhar Wakankar jiwani : बिगत वर्ष 17 दिसम्बर , 1986 को आगरा के भव्य प्रेक्षागृह में आपका हार्दिक अभिनन्दन किया गया । आगरा के प्रबुद्धजनों से ठसाठस भरे सूरसदन में वाकणकर ने भारतीय संस्कृति की अस्मिता तथा राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए भारतीय इतिहास की भ्रमपूर्ण विसंगतियों को दूर आवश्यकता पर बल दिया ।

उन्होंने कहा कि अंग्रेज इतिहासकारों ने भारतीय पुरातत्व का ठीक मूल्यांकन किए बिना ही भ्रामक इतिहास लिख डाला , जिसके फलस्वरूप ही भारत की राष्ट्रीय एकता खतरे में है । हमारी संस्कृति की अस्मिता नष्ट होती जा रही है । उन्होंने अपने तर्कसंगत वक्तव्य से स्पष्ट किया कि इतिहास में यह विसंगतियाँ जान – बूझकर की गई थीं , जिससे करने की भारतीयों की मानसिकता में बदलाव लाकर भारत के वास्तविक व गौरवपूर्ण इतिहास से उन्हें वंचित किया जा सके ।

निष्कर्ष : पद्मश्री से सम्मानित और  ग्रन्थ

Vishnu Sridhar Wakankar: वाकणकर ने कहा कि पुरातत्व अनुसंधान से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अगस्त्य ऋषि ने सर्वप्रथम विद्युत् सैल का निर्माण किया था । इस काल में ऐसे हवाई विमान भी बनाए गए , जो आधुनिक विमान से कहीं अधिक प्रभावशाली थे । 1979 में भारत में आयोजित विश्व पुरातत्व सम्मेलन में पधारे ख्याति प्राप्त पुरातत्व वेत्ताओं को ‘ भीम बैठका ‘ ले जाया गया ,

विष्णु श्रीधर वाकणकर का जीवन परिचय  : तो विश्व की प्राचीनतम् तथा सबसे बड़ी उस कला दीर्घा में डॉ . वाकणकर के कार्य को देखकर सभी विशेषज्ञों ने प्रफुल्लता प्रदर्शित की । डॉ . वाकणकर ने ‘ ए लॉस्ट पैराडाइज ‘ नामक ग्रन्थ लिखकर ‘ भीम बैठका ‘ के महत्व को विश्व स्तर पर चर्चित कर दिया है । इसी खोज पर भारत सरकार सन् 1974-75 में डॉ . वाकणकर को पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है ।

विष्णु श्रीधर वाकणकर के ग्रन्थ का नाम क्या है?

ए लॉस्ट पैराडाइज

विष्णु श्रीधर वाकणकर की रुचियाँ बताये?

कला सृजन , कला शिक्षण , शैल चित्र , शोध कार्य तथा प्रदर्शनी संयोजन