Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay
Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay


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Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर एक भारतीय-अमेरिकी खगोल वैज्ञानिक थे जिन्होंने तारकीय संरचना और विकास, और ब्लैक होल अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।  वह एक ब्लैक होल का निरीक्षण करने और उसकी विशेषता बताने वाले पहले खगोल वैज्ञानिक थे, और एक वैज्ञानिक पेपर में ब्लैक होल शब्द का इस्तेमाल करने वाले पहले व्यक्ति थे।

उन्होंने पहले न्यूट्रॉन स्टार की सह-खोज भी की और पहले ज्ञात एक्स-रे बाइनरी स्टार का निरीक्षण करने वाले पहले व्यक्ति थे।  चंद्रशेखर व्हाइट होल के सिद्धांत पर अपने काम के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं, जिसे उन्होंने पहली बार 1969 में तैयार किया और फिर बाद में 1974 में परिष्कृत किया।

सफेद बौनों और न्यूट्रॉन सितारों  पर सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का शोध कार्य


डॉ सुब्रमण्यम चंद्रशेखर एक सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी और येल विश्वविद्यालय में थॉमस डी और कैरल जी फिशर विज्ञान के प्रोफेसर थेे। उन्हें सितारों की संरचना और विकास पर उनके शोध के लिए जाना जाता है, विशेष रूप से सफेद बौनों (white dwarfs) और न्यूट्रॉन सितारों में।  उन्हें पदार्थ के एक नए रूप, उच्च-आयामी अतिचालकता की सह-खोज के लिए भी जाना जाता है।

चंद्रशेखर ने सफेद बौने सितारों और न्यूट्रॉन सितारों के सिद्धांत में प्रमुख योगदान दिया, और चंद्रशेखर सीमा पर अपने काम के लिए सबसे अच्छी तरह से जाना जाता है, जो एक सफेद बौने के अधिकतम द्रव्यमान का वर्णन करता है जिसे इसके अध: पतन दबाव द्वारा समर्थित किया जा सकता है।

चंद्रशेखर-स्ट्रुट बहस का सबसे प्रसिद्ध परिणाम यह निष्कर्ष था कि सूर्य या विशाल बेतेल्यूज़ जैसे तारे के लिए, चंद्रशेखर सीमा लागू नहीं होती है।  इसका परिणाम यह हुआ कि बड़े तारे न्यूट्रॉन और हीलियम के विस्फोट नहीं बनते जैसा कि पुराने मॉडलों द्वारा भविष्यवाणी की गई थी।  इसके बजाय, वे अपने जीवन को स्थिर, पुराने सितारों की तरह जीते हैं।  नए मॉडल सितारों के आकार की भविष्यवाणी करने में भी सक्षम थे जो संभावित रूप से सुपरनोवा के रूप में विस्फोट कर सकते थे, जो पहले की भविष्यवाणी से बड़े थे।

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay

नामसुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर
जन्म19 अक्टूबर , 1910
जन्म स्थानलाहौर
माता-पितासीता बालकृष्णन (1891-1931) और चंद्रशेखर सुब्रह्मण्य अय्यर
पत्नीश्रीमती ललिता (1936)
नोवेल पुरुस्कारसन् 1989
मृत्युअगस्त 21, 1995 (उम्र 84) शिकागो, संयुक्त राज्य
Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर : सुपरनोवा का अध्ययन मे नोबेल पुरस्कार जीता



Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर (एस. चंद्रशेखर के नाम से भी जाने जाते हैं) एक भारतीय-अमेरिकी खगोल भौतिकीविद् का उन्हे पुरा अनुभव था। जिन्होंने सुपरनोवा के अध्ययन में अपने काम के लिए 1983 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार जीता, विशेष रूप से न्यूट्रॉन स्टार की खोज के अग्रदूत के रूप में। 

उन्होंने न्यूट्रॉन सितारों और पल्सर के अध्ययन और बाइनरी सितारों के निर्माण और आकाशगंगाओं और आकाशगंगा के विकास की समझ में अन्य महत्वपूर्ण योगदान दिए।  उन्हें चंद्रशेखर सीमा पर अपने शोध और तारकीय द्रव्यमान के चंद्रशेखर वर्गीकरण के लिए भी जाना जाता है।  बाद के दो तारे कैसे पतित होते हैं और कैसे वे हमेशा के लिए जीवित रह सकते हैं, इसकी समझ में दोनों महत्वपूर्ण कदम थे।

डॉ . सुब्रह्मण्यम् चन्द्रशेखर जन्म एवं शिक्षा

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay: विश्वविख्यात खगोलशास्त्री डॉ . सुब्रह्मण्यम् चन्द्रशेखर का जन्म 19 अक्टूबर , 1910 को लाहौर में हुआ ( तब लाहौर भारत में था ) । पारिवारिक पृष्ठभूमि सामान्यतः सम्पन्न एवं शिक्षामय थी । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक मद्रास में हुई । आपने सन् 1930 में विशेष योग्यता के साथ भौतिकशास्त्र में एम . ए . प्रेसीडेन्सी कॉलेज मद्रास से उत्तीर्ण किया तदुपरांत आप उच्च शिक्षा के लिए विलायत गए और वहाँ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की  Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay.

मद्रास विश्वविद्यालय मद्रास द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने के उपलक्ष्य में आपको पारितोषकस्वरूप आर्थर एडिंग्टन प्रणति पुस्तक ‘ तारी की आंतरिक संरचना ‘ ( The Internal Constitution of Stars ) प्राप्त हुई । पुस्तक को पढ़ने के उपरान्त चन्द्रशेखर डॉ . आर्थर एडिंग्टन के प्रति समर्पित हो गए और उनसे मिलने के लिए वेचैन हो गए ।

इंगलैण्ड जाने पर डॉ . चन्द्रशेखर ने आर्थर एडिंग्टन से सम्पर्क किया । इस प्रकार इन्हें फाउलर आदि उच्च कोटि के खगोलशास्त्रियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ ।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का शोध कार्य

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay केम्ब्रिज विश्वविद्यालय लन्दन से पी.एच – डी . की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त आपने ।
एडिंग्टन के साथ दो वर्ष ट्रिनिटी कॉलेज में अनुसंधान कार्य किया । आपके अनुसंधान का विषय था- ‘ तारे भी जन्म लेते हैं , बड़े और बूढ़े होते हैं और अन्ततः मृतप्रायः होते हैं . ” इनके शोधकार्य ने विज्ञान की दुनिया में अच्छी ख्याति प्राप्त की ।खगोल जगत में आपका एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया ।

डॉ . चन्द्रशेखर की स्थापना थी कि जिस तारे का द्रव्यमान सूर्य की अपेक्षा 124 गुना तक होता है , केवल वही श्वेतवामन ( White Dwarf ) बन सकता है । इसी के साथ डॉ . चन्द्रशेखर ने यह भी बताया कि जिस तारे का द्रव्यमान सूर्य के डेढ़ गुने द्रव्यमान से अधिक होगा , वह श्वेत नहीं बन पाएगा , उल्टे और भी अधिक सिकुड़ जाएगा और अन्ततः अदृश्य तारा वन जाएगा ।

बहुत अधिक द्रव्यमान वाला यह तारा न्यूट्रॉन तारा ( Neutron Star ) कहा जाता है , इसके द्रव्यमान की सघनता का अनुमान लगाना काफी कठिन होता है , परन्तु उपर्युक्त संदर्भ में यह जानकारी रुचिकर होगी कि इसका कई अरब टन द्रव्यमान माचिस की एक डिविया में सिमटा रहता है ।


सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का नोवा पर शोध कार्य

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : सभी तारे एक से नहीं रहते हैं । समय के साथ , ज्यों ज्यों उनकी अवस्था बढ़ती है , त्यो त्यों उनके भीतर विद्यमान परमाणु ईंधन चुकता जाएगा । सूर्य भी एक तारा है , वह पिछले अब से लगभग पाँच अरब वर्ष पहले से यह अनवरतू रूप से जलता हुआ विश्व को प्रकाश देता आ रहा है । इन तारों के संदर्भ में एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसका भीतरी भाग तो सिकुड़ता जाता है और बाहरी भाग फैलता जाता है ।

ऐसी स्थिति में तारा काफी फैल जाता है और उसकी चमक कई गुनी बढ़ जाती है । इस दशा को प्राप्त तारे की लाल दैत्य ( Red Giant ) कहने लगते हैं ।

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : सूर्य की वर्तमान स्थिति को प्राप्त तारों को नोवा ( Nova ) कहते हैं । इसका ईंधन क्रमशः चुकता जाएगा और अन्ततः वह लाल दैत्य ( Red Giant ) बन जाएगा और वह Super – nova कहा जाएगा । इस स्थिति में हमारा सूर्य फैलकर इतना बड़ा हो जाएगा कि इसके चारों ओर के ग्रह बुध , शुक्र आदि उसमें समा जाएंगे । पृथ्वी भी उसमें समा जाएगी ।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का पुरस्कार एवं सम्मान

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : डॉ . चन्द्रशेखर ने सन् 1939 में अपने शोध को तारों की संरचना का परिचयात्मक अध्ययन ( Introduction for the study of stellar structure ) शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया और उसके बाद वह अपने शोध कार्य में लग गए ।

सन् 1936 में वह अपनी नवविवाहिता पत्नी श्रीमती ललिता के साथ अमरीका चले गए । वहाँ उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया- रिसर्च एसोसिएट यर्कीज वेधशाला , शिकागो विश्वविद्यालय ( 1936-38 ) , सहायक प्रोफेसर शिकागो विश्वविद्यालय ( 1942-43 ) तथा बाद में सन् 1944 से 1947 तक प्रोफेसर सन् 1952 से अपने अंतिम दिनों तक शिकागो विश्वविद्यालय में सैद्धान्तिक तारा भौतिकी के विशिष्ट प्रोफेसर रहे ।

सन् 1953 में उन्होंने अमरीकी नागरिकता ग्रहण कर ली । उसके बाद वह अमरीका में ही रहने लगे । अपनी अमरीका यात्रा में एक बार पंडित नेहरू ने आपको स्वदेश बुलाने का प्रस्ताव भी रखा , परन्तु डॉ . चन्द्रशेखर ने अपनी विवशता प्रकट कर दी ।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का सर्वश्रेष्ठ नोबेल पुरस्कार

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : डॉ . चन्द्रशेखर सतत् नहीं हुए । उनका कथन है कि “ मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय परिप्रेक्ष्य में गहरी रुचि रखता कार्यशील एवं जिज्ञासु बने रहने वाले वैज्ञनिक हैं , वह अपनी उपलब्धियों से सन्तुष्ट कभी हूँ .. डॉ . चन्द्रशेखर का व्यक्तित्व पारसमणि के समान है ।

उन्होंने एस्ट्रोफिजिक्स जनरल का कुछ समय तक सम्पादन किया । उस कालावधि में आपने विज्ञान जगत् को दो महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रदान की , यथा- प्रिन्सिपल्स ऑफ स्टैलर डाइनैमिक्स एण्ड हाइड्रोमैग्नेटिक्स तथा जल गतिक एवं जल चुम्बकीय स्थिरता ) सदृश महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रदान की ।

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : इस महत्वपूर्ण प्रदेय बहुवर्षी के कारण भारत सरकार ने आपको पद्म भूषण द्वारा तथा इण्डियन नेशनल साइंस अकादी ने ‘ रामानुजम् स्वर्ण पदक ‘ से सम्मानित किया । अन्ततः सन् 1989 में आपको विश्व के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार नोबेल पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया गया ।

यह पुरस्कार पहले मिल जाना था । श्वेत चामन ( White Dwarf ) तारों की संरचना सम्बन्धी खोज के लिए उनको नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था ।

उपसंहार :Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay

Subramaniam Chandrasekhar jiwan parichay : डॉ . चन्द्रशेखर ने स्वयं कहा था कि ” यह पुरस्कार मुझे सन् 1953 में ही मिल जाना चाहिए था , क्योंकि उसी समय तक मेरे उक्त शोधकार्य को मान्यता प्राप्त हो गई थी । डॉ . चन्द्रशेखर से भारत को तथा वैज्ञानिक जगत् को बहुत आशाएँ हैं , भारतवासी भारतमाता के ऐसे सपूतों की उपलब्धियों पर गौरवान्वित अनुभव करते हैं ।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर नोबेल पुरस्कार कब मिला?

सन् 1989

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का मृत्यु कब, कैसे और कहाँ हुआ?

डॉ . सुब्रह्मण्यम् चन्द्रशेखर का 22 अगस्त 1995 को 84 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से शिकागो में निधन हो गया।

डॉ . सुब्रह्मण्यम् चन्द्रशेखर के माता-पिता का नाम क्या है?

सीता बालकृष्णन (1891-1931) और चंद्रशेखर सुब्रह्मण्य अय्यर (