Sir Mokshagundam Visvesvaraya
Sir Mokshagundam Visvesvaraya

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सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया इन हिंदी

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : भारतीय सभ्यता का इतिहास अत्यन्त ही गौरवशाली रहा है और यही कारण है कि भारतीय संस्कृति विश्व में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है । इस देश में समय – समय पर ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में निपुणता प्राप्त करने के उपरान्त अपने समस्त जीवन को राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किए हैं ।

आर्यभट्ट , भास्कराचार्य , रामानुजम् , नागार्जुन , चरक जैसे प्रकाण्ड वैज्ञानिक यहाँ अवतरित हुए हैं । इन्हीं में से एक महान् इंजीनियर भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम बड़े ही श्रद्धा एवं आदर से स्मरण किया जाता है ।

एक साधारण परिवार में जन्म लेकर इन्होंने अपने परिश्रम , प्रतिभा और अदम्य उत्साह से सफलता के उच्चतम् शिखर पर पहुँचकर राष्ट्र की बहुमूल्य सेवाएँ कीं तथा भारत की कीर्ति पताका को पूरे विश्व में फहराने में सफलता प्राप्त की ।

Sir Mokshagundam Visvesvaraya jiwani

पुरा नामसर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया
जन्म15 सितम्बर , 1861 को
जन्म स्थानमैसूर राज्य के कोलार जिले के मदनहल्ली गाँव में
पिताश्रीनिवास शास्त्री
बाँध का नामकृष्णराज और सक्खर बाँध
पेशाइंजीनियर
पुरुस्कार भारत रत्न (1955)
मृत्यु14 अप्रैल , 1962 (aged 101)
मृत्यु स्थानBangalore, Karnataka, India
Sir Mokshagundam Visvesvaraya biography

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म कब और कहाँ हुआ?

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : श्री विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितम्बर , 1861 को मैसूर राज्य के कोलार जिले के मदनहल्ली गाँव में हुआ था । इनके पिता पंडित श्रीनिवास शास्त्री प्रतिष्ठित विद्वान् , धार्मिक , परन्तु अत्यन्त गरीब एवं साधारण व्यक्ति थे । उनके पास पुत्र को पढ़ाने के लिए धन नही था । गाँव की पढ़ाई के बाद इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए बंगलौर जाना पड़ा ।

वह मामा के घर पर भोजन करते तथा फीस के लिए ट्यूशन करते । कॉलेज के अंग्रेज प्रधानाचार्य चाल्स वाल्टर्स ने इनकी योग्यता , प्रतिभा एवं कार्यकुशलता से प्रभावित होकर इनका प्रवेश पूना के साइंस कॉलेज में करा दिया एवं छात्रवृत्ति भी दिलवाई ।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने इन्जीनियरिंग की शिक्षा कहाँ से किया?

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : इस कॉलेज में इन्होंने अपने समय का पूर्ण सदुपयोग किया तथा सन् 1883 में बम्बई विश्वविद्यालय की इन्जीनियरिंग परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। जिसके फलस्वरूप सन् 1884 में बम्बई के पी.डब्ल्यू.डी . विभाग मे असिस्टेंट इन्जीनियर के पद पर नियुक्त हो गए । कुछ ही समय में अपनी असाधारण योग्यता के कारण यह सुपरिन्टेन्डिंग इन्जीनियर हो गए । अपनी योग्यता से वह चीफ इन्जीनियर के पद पर आसीन होने वाले थे ।

लेकिन अंग्रेज इन्जीनियरों ने एक भारतीय को मुख्य अभियन्ता के पद पर आसीन करने का विरोध किया तथा उन्हें मुख्य अभियन्ता नहीं बनाया , इससे क्षुब्ध होकर सन् 1908 में इन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया ।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया द्वारा कृष्णराज सागर बाँध का निर्माण कब और कहाँ हुआ?

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : सरकारी सेवा के दौरान सन् 1893 में इन्होंने प्रसिद्ध सक्खर बाँध का निर्माण कराया तथा 1899 में सिंचाई के रानाडे जैसे योग्य राजनीतिज्ञों ने भूरि – भूरि प्रशंसा की । ब्लाक सिस्टम का आविष्कार किया जिसकी श्री बालगंगाधर तिलक एवं महादेव गोविन्द सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद श्री विश्वेश्वरैया ने विदेशों की यात्रा वहाँ के उद्योग – धन्धों को देखने हेतु की , ताकि भारत में भी ऐसे कार्य किए जा सकें ।

विदेश यात्रा के दौरान ही निजाम हैदराबाद ने अपनी रियासत में आई भीषण बाढ़ की समस्या को हल करने के लिए इन्हें बुला लिया । इन्होंने मूसी व उसकी सहायता नदियों पर बाँध बनाकर वहाँ की बाढ़ की समस्या को स्थायी रूप से हल कर दिया ।

हैदराबाद की बाढ़ की समस्या के हल होते ही मैसूर के महाराजा ने इन्हें अपने यहाँ बुलाया तथा अनुरोध किया कि वह अपनी जन्मभूमि को भी अपनी योग्यता से लाभ पहुँचाएँ । उन्हें मैसूर राज्य का चीफ इन्जीनियर नियुक्त किया गया । सन् 1912 में कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बाँध का निर्माण करके इन्होंने सारे देश को हैरत में डाल दिया ।

First engineer of India

Sir Mokshagundam Visvesvaraya


Sir Mokshagundam Visvesvaraya :  बाँध बनने से पूर्व बड़े – बड़े अंग्रेज इन्जीनियरों ने कहा था कि यह बाँध नहीं बन सकता तथा इस पर लगने वाला करोड़ों रुपया व्यर्थ जाएगा , परन्तु नाना प्रकार की कठिनाइयों का सामना करते हुए । इन्होंने सन् 1912 में इस बाँध को तथा उससे सम्बद्ध विद्युत् परियोजना को समय से पूरा करा दिया ।

उस समय यह विश्व के सबसे प्रतिष्ठित प्रोजेक्टों में आता था । राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने इस उपलब्धि पर इस भारतीय इन्जीनियर की असाधारण तकनीकी योग्यता की भूरि भूरि प्रशंसा की । कृष्णराज सागर बाँध के निर्माण से देश में ही नहीं , सारे विश्व में इनकी ख्याति फैल गई । इन्हें मैसूर राज्य का दीवान बना दिया गया ।

भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के सदस्यों ने एक इन्जीनियर को इतने उच्च पद पर , जोकि केवल आई.सी.एस. अधिकारियों को दिया जाता था । नियुक्त करने पर विरोध व आश्चर्य प्रकट किया , लेकिन महाराजा व जनता ने इसको ठुकरा दिया तथा वह अपनी योग्यता व पुरुषार्थ के बल पर मैसूर राज्य के छह वर्ष तक ( 1912 से 1918 तक ) दीवान पद पर आसीन रहे।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का शिक्षा मे योगदान

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : इस दौरान इन्होंने मैसूर राज्य में कई उद्योग – धन्धे चालू किए जिसमें भद्रावती का इस्पात कारखाना उल्लेखनीय है । इन्होंने शिक्षा का भी खूब प्रसार किया तथा मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना की । यह संभवतः भारत का छठा विश्वविद्यालय था । मैसूर का विश्व प्रसिद्ध ‘ वृन्दावन गार्डन ‘ भी इन्हीं का बनवाया हुआ है ।

मैसूर में उनके कुशल एवं सफल प्रशासन की आज भी लोग चर्चा करते हैं । मैसूर के भद्रावती कारखाने में इनकी असाधारण सफलता से टाटा इस्पात कारखाने के संचालक अत्यन्त प्रभावित हुए तथा इन्हें टाटा इस्पात का निदेशक बनाया तथा 1927 से 1955 तक इस पद पर रहे । भारत में नियोजित विकास का सूत्रपात करने का श्रेय भी श्री विश्वेश्वरैया को ही है ।

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : देश में नियोजित अर्थव्यवस्था पर कार्य करने पर बल देने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे तथा इस विषय पर अपनी पुस्तक ‘ प्लाण्ड इकॉनॉमी फॉर इण्डिया ‘ 1934 में प्रकाशित कराई । यह अपने विषय की भारत में प्रथम पुस्तक थी । इस पुस्तक में विश्वेश्वरैया ने भारत के नियोजित आर्थिक विकास के लिए एक 10 वर्षीय कार्यक्रम प्रस्तावित किया , जिसे 1934-35 के ‘ भारतीय आर्थिक सम्मेलन ‘ ( Indian Economic Conference ) की वार्षिक सभा किया गया ।

इसके बाद ही भारत में नियोजन की माँग जोर पकड़ती गई । बिहार में प्रस्तुत विश्वेश्वरैया का एक और बड़ा काम बिहार के मोकामा में गंगा के पुल के निर्माण के सबन्ध में परामर्श देना था । करीब 90 वर्ष की आयु में पटना के समीप इस पुल का निर्माण कराके सारे देश को इन्होंने हैरत में डाल दिया ।

सारे देश ने उनकी योग्यता , पुरुषार्थ एवं अद्भुत संगठन शक्ति के लिए आदर सम्मान प्रकट किया । कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से अलंकृत किया। जिसमें 1931 में आंध्र विश्वविद्यालय , 1937 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय , 1940 में एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय बम्बई , 1948 में मैसूर विश्वविद्यालय आदि प्रमुख हैं ।

सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का 100 वाँ जन्म और मृत्यु

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : 1958 में बंगाल की प्रमुख रॉयल एसियाटिक सोसायटी ने इन्हें ‘ दुर्गा प्रसाद खेतान स्वर्ण पदक ‘ से सम्मानित किया । भारत की ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ‘ सर ‘ की उपाधि से विभूषित किया । 7 सितम्बर , 1955 को राष्ट्रपति भवन में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ . राजेन्द्र प्रसाद ने इनके द्वारा की गई राष्ट्र की सेवाओं के लिए इन्हें भारत के सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न से अलंकृत किया ।

डॉ . विश्वेश्वरैया बड़े नियम – संयम से अपना जीवन व्यतीत करते थे । 90-95 वर्ष की आयु तक वह सक्रिय रूप से देश की सेवा करते रहे । 15 सितम्बर , 1960 को उनका 100 वाँ जन्म – दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया । इस अवसर पर तत्कालीन मैसूर के मुख्यमंत्री श्री बी . डी . जत्ती ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया ।

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : अपने जीवनकाल में ही ऐसा सम्मान बिरले व्यक्तियों को ही मिलता है । बड़े सम्मान और पुरुषार्थ के साथ एक सौ एक वर्ष की पूर्ण आयु बिताने के बाद 14 अप्रैल , 1962 को इनका देहान्त हुआ । सारे देश द्वारा इन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से भावभीनी श्रद्धांजलियाँ अर्पित की गईं ।

इनकी मृत्यु पर राष्ट्रपति डॉ . राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था “ एक ऐसा व्यक्ति चल बसा है जिसने हमारे राष्ट्रीय जीवन के अनेक पहलुओं में अमूल्य योगदान दिया है । ‘ एक निर्धन परिवार में जन्म लेकर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से देश को उन्नत करने के लिए इन्होंने जो महत्वपूर्ण कार्य किए , उनके लिए इन्हें हमेशा स्मरण किया जाएगा ।

निष्कर्ष

Sir Mokshagundam Visvesvaraya : Sir Mokshagundam Visvesvaraya हमारे देश के  First engineer of India थे। इनके द्वारा बनवाये गए बाँध कभी प्रशीद है। Sir Mokshagundam Visvesvaraya हमारे देश के लिए एक गौरव हैं।

विश्वेश्वरैया को सर की उपाधि किसने दी

किंग जॉर्ज 5 ने

विश्वेश्वरैया की माता का नाम क्या है?

वेंकटलकषममा

विश्वेश्वरैया का पूरा नाम

सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरय्या