raja ram mohan roy biography in hindi
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राजा राममोहन राय

raja ram mohan roy biography in hindi : अंधविश्वास और कई कष्टकारी कुरीतियों जैसे अभिशापों से अभिशप्त भारतीय जनजीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले राजा राममोहन राय भारतीय विभूतियों के दैदीप्यमान नक्षत्रों में से एक थे । ऐसे महापुरुष का जन्म पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान जिलान्तर्गत राधा नगर ग्राम में एक सम्रान्त कट्टर ब्राह्मण परिवार में 22 मई , 1774 को हुआ था।

raja ram mohan roy biography in hindi : प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान उन्होंने संस्कृत और बंगला की शिक्षा प्राप्त की तथा 12 वर्ष की उम्र में वह फारसी और अरबी पढ़ने पटना चले गए , वह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवा में लगभग 14 वर्ष -1814 ई तक रहे ।

इस बीच उन्होंने डिग्बी नामक अंग्रेज से अंग्रेजी भी सीख ली तथा ईसाई धर्म ग्रन्थों के अध्ययन हेतु ग्रीक , लैटिन और हिब्रू भाषा भी सीखी ।

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नामराजा राममोहन राय
जन्म 22 May 1772 (लगभग)
जन्म स्थानपश्चिम बंगाल के वर्द्धमान जिलान्तर्गत राधा नगर ग्राम
परिवारकट्टर ब्राह्मण परिवार
मृत्यु27 सितम्बर 1833 (उम्र 61)
सम्पादनमिशन उल अखबार और संवाद कौमुदी
मृत्यु कारणमेनिन्जाईटिस
योगदानसती प्रथा -बालविवाह,ब्रह्म समाज
सम्मानराजा की उपाधि
माता-पितातारिणी देवी-रमाकांत राय
पत्नीदेवी उमा
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राजा राम मोहन राय को राज की उपाधि किसने दी

raja ram mohan roy biography in hindi : उनके नाम के साथ प्रयुक्त ‘ राजा ‘ शब्द वंशानुगत न होकर बहुआयामी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व से अर्जित उपाधि थी , जिसे इंगलैण्ड जाते वक्त मुगल सम्राटू ने प्रदान किया था ।

वाह्याडम्वर , पारस्परिक वैमनस्यता , अस्पृश्यता , गुलामी , सामाजिक व धार्मिक कुप्रथाओं की भयावह काली कोठरी में जागरण दीप प्रज्ज्वलित कर उस तम को भगाने तथा भारत को एक नवयुग के पथ पर अग्रसर करने हेतु प्रयत्नशील आप प्रथम महापुरुष थे ।

इसी कारण ‘ भारतीय पुनर्जागरण के जनक ‘ कहलाने का गौरव आपको प्राप्त हुआ । जैसाकि नन्दलाल चटर्जी ने भी कहा है- ” राजा राममोहन राय प्रतिक्रिया तथा प्रगति के मध्य विन्दु थे । वस्तुतः वह भारतीय पुनर्जागरण के प्रभात तारा थे । ” कुछ लोग इनका जन्म 1772 में हुआ मानते हैं ।

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राजा राममोहन राय के बहुआयामी व्यक्तित्व का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –

धर्म सुधारक

raja ram mohan roy biography in hindi : एक साथ कई भाषाओं के जानकार होने के कारण सभी धर्म ग्रन्थों का अध्ययन कर पाने में वह समर्थ हो सके । तत्पश्चात् वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सभी धर्मों में एकेश्वरवाद का ही प्रचलन है । इसीलिए वह धर्मों की मौलिक एकता पर विश्वास करते थे । सम्भवतः उनकी दृष्टि में धर्म एक प्रकाश पुंज है , जिससे दो रश्मियाँ प्रस्फुटित होती हैं


1. त्याज्य , और 2. स्वीकार्य सभी धर्मों में व्याप्त आडम्बर और अंधविश्वास त्याज्य है । जबकि सभी धर्मों के सार स्वीकार्य इस आधार पर उन्होंने हिन्दू धर्म की मूर्ति पूजा व अंधविश्वास का खुलकर विरोध किया , जिसके परिणामस्वरूप कट्टर माँ बाप के साथ ही पत्नी के कोप का भी शिकार होना पड़ा ।

राजा राममोहन राय जीवनी : इसी तरह उन्होंने ईसा मसीह के दैवी होने तथा मानव को अभिमंत्रित व अभिशापित में विभाजित करने वाली इस्लाम की अनन्यता की भी आलोचना की , परन्तु उन्होंने हिन्दू धर्म के ‘ आत्मा वय ब्रह्मः ‘ ( मनुष्य देवता तुल्य ) है ।  जैसे पवित्र सिद्धान्त को स्वीकार किया ।

ब्रह्म समाज की स्थापना

राजा राममोहन राय जीवनी : अपनी प्रसिद्ध रचनातुहफत उल मुवाहिद्दीन ‘ में उन्होंने एकेश्वरवाद का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए बुद्धिवाद अथवा तर्कवाद पर विशेष प्रकाश डाला । इन सभी उद्देश्यों को लेकर राजा साहब ने धार्मिक एकता के आइने के रूप में 20 अगस्त , 1828 ई . को ब्रह्म समाज ‘ की स्थापना की थी ।

इस प्रकार यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं होगी कि वह धार्मिक सहिष्णुता के प्रबल पक्षधर थे और उनके हृदय सागर में पवित्र और सिर्फ पवित्र भावधारा की कई नदियाँ आकर मिली थीं ।

धर्म के संदर्भ में उनके बारे में मॉनियर विलियम्स ने लिखा है- ” राजा राममोहन राय सम्भवतः तुलनात्मक धर्मशास्त्र के प्रथम सच्चे अन्वेषक थे ।

समाज सुधारक

सती प्रथा और बालविवाह : समाज सुधारक के रूप में राजा साहब विशेष रूप से याद किए जाते हैं । सती प्रथा , बालविवाह , जाति प्रथा , अस्पृश्यता जैसे दुसह्य संक्रामक रोगों से ग्रसित और विकृत भारतीय समाज में नवचेतना का संचार कर उसे सुधारने के जो प्रयास उन्होंने किए वह सिर्फ सराहनीय ही नहीं , स्तुत्य भी हैं ।

राजा राममोहन राय जीवनी : उनके ही अथक प्रयास के परिणामस्वरूप सती प्रथा जैसी अमानुषिक दानवी प्रथा का संहार सम्भव हो सका , क्योंकि लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने इसे 1829 ई . में गैर – कानूनी घोषित कर दिया था । यद्यपि हाल ही में दिवराला में रूपकुँवर के सती होने के साथ दफनाए जा चुके ।

इस शव को पुनः जीवित करने का प्रयास किया गया , परन्तु उनके प्रयास से जाग्रत भारतीय मानसिकता ने पुनः इस प्रथा को किसी गहरी घाटी में फेंक दिया ।

राजा राममोहन राय जीवन परिचय : उन्होंने बालविवाह को सामाजिक अभिशाप बतलाते हुए उसका डटकर विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया । मनु स्मृति का संदर्भ पेश करते हुए भारतीय विधवाओं को दहकती चिता से उठाकर सादगी का जीवन व्यतीत करने को प्रेरित किया । इसके साथ ही राष्ट्रीय एकता व अखण्डता पर तीखा प्रहार करने वाली प्रथा के उन्मूलनार्थ वह एक समर्पित कर्मवीर थे ।

ऊँच – नीच व अस्पृश्यता की भावना को भी उन्होंने मानवता का महान् शत्रु बताया । इससे मुक्ति हेतु वह अंतर्जातीय विवाह के पूर्ण हिमायती थे । स्वयं उनके ही शब्दों में ” जाति भेद , जिससे हिन्दू समाज अनेक जाति – उपजाति में बँट गया है । हमारी गुलामी का प्रमुख कारण रहा है . एकता के अभाव में ही हम दासता की जंजीर में जकड़े रहे । “

राजनीतिक विचारक

raja ram mohan roy biography in hindi : राजनीतिक चिन्तन से ओत – प्रोत राजा साहब भारत की स्वतन्त्रता के प्रबल हिमायती थे और उनके राजनीतिक विचार बेंथम के विचारों से अधिक मेल खाते थे । उनका प्रतिपादन था कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए वरदान है ।

जिससे भारतीय अधिक सभ्य और सुसंस्कृत हो तथा बाद में आजादी हासिल कर लेगे । ब्रिटिश शासन का भय होने के बावजूद भी वह उसकी विसंगतियों के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करते रहे और विधि सर्वोपरिता , विचारा भिव्यक्ति की स्वतन्त्रता , राजनीतिक व धार्मिक स्वतन्त्रता के लिए तथा नागरिकों के जीवन , सम्पत्ति सह अधिकार रक्षार्थ सदैव प्रयत्नशील रहे ।

raja ram mohan roy biography :   उचित न्याय व्यवस्था हेतु वह स्वतन्त्र न्यायपालिका पर बल देते थे तथा इसके लिए शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को अत्यावश्यक समझते थे . भारतीय परम्पराओं के प्रतिकूल तथा भ्रष्ट ब्रिटिश न्याय व्यवस्था से क्षुब्ध राजा साहब ने उसमें पर्याप्त सुधार हेतु निम्न लिखित शर्तों को रखा –


( i ) जूरी तथा प्रारम्भ की जाए ,
( ii ) न्यायाधीश तथा मजिस्ट्रेट के पद पृथक् किए जाएँ ,

( iii ) न्यायालय की कार्यवाही लोगों के लिए खुली हो ,
( iv ) उच्च पदों पर अधिकाधिक भारतीयों की नियुक्ति हो ,

( v ) पंचायतों को पुनर्जीवित किया जाए तथा
( vi ) भारतीय परम्पराओं की अनुकूलता हेतु भारतीय जनमत पर आधारित विधि का निर्माण हो।

raja ram mohan roy biography : 1833 ई . में होने वाले कम्पनी के चार्टर के नवीनीकरण का समाचार सुनकर भारतीयों की दुर्दशा से अवगत कराने कम्पनी के दोष को उजागर करने तथा ब्रिटिश जन – मानस को भारतीय जनता की माँगों के पक्ष में करने के लिए प्रथम भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने 1830 में इंगलैण्ड की यात्रा की , जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ ।

पेंशनभोक्ता मुगल सम्राट् के आवेदन – पत्र के साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण सुधारों से युक्त स्मरण पत्र भी पेश किया । आप ही प्रथम भारतीय थे , जिनसे ब्रिटिश संसद शासन के मामले में सलाह लिया करती थी ।

महान् देशभक्त

raja ram mohan roy jiwan parichay : राजा राममोहन राय एक महान् देशभक्त थे , जिनकी रगों में देशभक्ति की पवित्र भावना प्रवाहित हो रही थी । अशिक्षितों व निर्धनों की जर्जर दशा देखकर यह दयार्द्र हो उठते लहरें हिलोरें मारने लगती थीं । इसी थे और हृदय सागर में उनके कल्याणार्थ संकल्प भावना से प्रेरित होकर 1830 में उन्होंने माफी की भूमि अथवा दानस्वरूप दी

गई भूमि को पुनः हड़प लेने के विरोध में आन्दोलन चलाया । वह पवित्र हृदय से भारतवासियों की सर्वतोन्मुखी स्वतंत्रता और भलाई के हिमायती थे । उनमें राजनीतिक जागरण लाने के लिए ही उन्होंने ‘ संवाद कौमुदी ‘ और ‘ मिशन उल अखबार ‘ का सम्पादन किया तथा प्रशासन में सुधार लाने के लिए आन्दोलन चलाया ।

हिन्दू – मुस्लिम एकता के प्रणेता

raja ram mohan roy jiwan parichay : राजा साहब भारत की आजादी हेतु हिन्दू मुस्लिम एकता को अत्यावश्यक समझते थे और ब्रिटिश सरकार के ऐसे किसी भी कार्य का विरोध करने को तत्पर रहते थे , जो इन दोनों धर्मों के बीच विष घोलकर वैमनस्यता की खाई को पैदा करने वाला होता था । उदाहरणार्थ 1827 ई . में उन्होंने हिन्दू मुसलमान में विशृंखलता पैदा करने वाले जूरी एक्ट का  आत्मा थी ।

raja ram mohan roy jiwan parichay : ” विरोध किया और इसके विरुद्ध ब्रिटिश संसद में आवेदन भी किया । उनकी जन्म शताब्दी के शुभावसर पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सही ही कथा था- ” उनके हृदय में हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई आदि सबके लिए जगह थी । वस्तुतः उनकी आत्मा भारत की आत्मा थी।

प्रेस स्वतन्त्रता के समर्थक

raja ram mohan roy jiwan parichay : राजा राममोहन राय प्रेस की स्वतन्त्रता को किसी भी तरह के सुधार के लिए अत्यावश्यक समझते थे । समाचार पत्रों पर वह किसी भी तरह का प्रतिबंध स्वीकारने को कतई तैयार नहीं थे । राजा राममोहन राय जीवनी : यही कारण है कि प्रेस की आजादी छिनने वाला 1823 ई . के एडास के प्रेस अध्यादेश के विरोध में उन्होंने संवैधानिक आंदोलन चलाया ।

सर्वप्रथम इसके विरुद्ध उन्होंने कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट में स्मरण – पत्र पेश किया । वहाँ से अस्वीकृत होने पर उन्होंने प्रिवी कौंसिल में भी स्मरण – पत्र दिया । यद्यपि वहाँ भी उसे अस्वीकृत कर दिया गया , फिर भी उनका आंदोलन जारी रहा।raja ram mohan roy biography : अंततः उनका प्रयास सार्थक सिद्ध हुआ और इसके दो वर्ष बाद गवर्नर जनरल चार्ल्स मेटकॉफ को 1835 में प्रेस की स्वतंत्रता को मान्यता देनी पड़ी है ।

अन्तर्राष्ट्रीयतावादी और मानवतावादी

raja ram mohan roy biography in hindi : राजा साहब अन्तर्राष्ट्रीयता के अनन्य पुजारी और महान् मानवतावादी थे । भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र- ‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ में उनकी पूर्ण आस्था थी। यही कारण है कि आस्ट्रिया द्वारा नेपुल्स के विद्रोह दमन की खबर से उन्हें निराशा और स्पेन में संवैधानिक सरकार की स्थापना की खबर से प्रसन्नता हुई । साथ ही 1830 में फ्रांस की जुलाई क्रान्ति तथा 1832 के इंगलैण्ड के सुधार विधेयक का उन्होंने स्वागत किया ।

raja ram mohan roy jiwan parichay : महान् मानवतावादी होने का परिचय उनके इसी कथन से मिल जाता है— “ सम्पूर्ण मानव जाति एक बड़ा परिवार है , जिसके अनेक राष्ट्र और प्रजातियाँ इसकी शाखा मात्र हैं ” । उनकी इसी भावना से बी . एन . सील ने कहा है- ” वह सच्चे और विशुद्ध मानवतावादी थे और उनकी नजर के सामने विश्व – मानवता का चित्र नाचता रहता था ।

raja ram mohan roy biography in hindi : ” इसके साथ ही वह अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के लिए युद्ध को नहीं , प्रत्युत शान्तिपूर्ण समझौते को आवश्यक समझते थे और इसकी सफलता हेतु वह प्रत्येक देश की संसदों से एक – एक सदस्य लेकर एक अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पक्षधर थे । सम्भवतः आज संयुक्त राष्ट्र सघ , गुट निरपेक्ष आन्दोलन आदि अन्तर्राष्ट्रीय संगठन उनके ही स्वप्न की पवित्र परिणति हैं ।

सफल शिक्षाशास्त्री

raja ram mohan roy jiwan parichay : राजा राममोहन राय एक महान् शिक्षाशास्त्री भी थे । वह भारत के विकास के लिए पाश्चात्य शिक्षा और अंग्रेजी को आवश्यक मानते थे । इतना होते हुए भी उन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य व भाषा से पूर्ण लगाव रहा जिसका परिचायक ‘ संवाद कौमुदी ‘ का सम्पादन है ।

राजा राममोहन राय जीवनी : इसके साथ ही 1825 ई . में उन्होंने कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की । ऐसे सर्वतोन्मुखी प्रतिभाशाली महापुरुष का निधन 27 सितम्बर , 1833 को ब्रिस्टल में वह हमारे बीच नहीं हैं ,

फिर भी उनका स्मृति दीपक आज भी हमारे हृदय में जल रहा है और तब हुआ था , जब वह इंगलैण्ड में भारतवासियों के कल्याण कार्य में संलग्न थे ।

यद्यपि आज आने वाली पीढ़ियों के हृदय में भी जलता रहेगा , क्योंकि उनके द्वारा प्रज्ज्वलित कई ज्योतियाँ आज भी प्रदीप्त होकर सम्पूर्ण भारत को प्रकाशित कर रही हैं ।

raja ram mohan roy biography : जैसाकि मैकनिकोल ने भी लिखा है- ” राजा राममोहन राय एक नए युग के प्रवर्तक थे और उन्होंने जो ज्योति जलाई , वह आज भी अनवरत् जल रही है । ” वास्तव में उनके कार्यों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर यह कहना पड़ता है कि उनके योगदान रूपी जल से सिंचित भारत आज गर्व से प्रगति के शिखर पर विहँस रहा है ।

निष्कर्ष


निष्कर्ष के तौर पर यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं होगी कि- ” भारतीय समाजरूपी रथ को अन्यन्य विसंगतियों और कुप्रथाओं , पिछड़ापन , अशिक्षा आदि के धुंध से निकालकर प्रकाश सह प्रगति के पथ पर अग्रसरित करने वाले राजा साहव सफल सारथी थे

राजा राममोहन राय जीवनी से जुड़े कुछ सवाल

ब्रह्म समाज की स्थापना किसने किया था?

राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय के बचपन का नाम क्या था?

राममोहन

राजा राम मोहन राय को राय की उपाधि किसने दी ?

इंगलैण्ड जाते वक्त मुगल सम्राटू ने प्रदान किया था ।

राजा राममोहन राय की मृत्यु कैसे हुई ?

मेनिन्जाईटिस

राजा राममोहन राय की मृत्यु कहां हुई थी ?

स्टेपलटन, ब्रिस्टल, यूनाइटेड किंगडम