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rahul sankrityayan ka jeevan parichay : सांकृत्यायन महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की जन्म शताब्दी संसार के कई देशों में मनाई जा रही है जिनमें प्रमुख हैं— भारत , श्रीलंका , जापान , कोरिया , तिब्बत , चीन आदि । राहुलजी 36 भाषाओं के ज्ञाता थे और उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकों की रचना की । 150 से ऊपर पुस्तकों का सृजन एक जीवनकाल के लिए क्या कम कहा जा सकता है ?

वह एकसाथ बैठकर कई ग्रंथ लिखवा सकते थे । उनका अंतर स्वयं में एक विश्वकोष था । उनके द्वारा बड़ी संख्या में की गई खोजों का अभी तक पूर्णरूप से मूल्यांकन भी नहीं हो पाया है। हिन्दी के भंडार को उन्होंने कितना समृद्ध किया , जब इसका पता लगेगा , तो विद्वान् चकित रह जाएंगे । विषय की दृष्टि से देखें , तो उपन्यास , कहानी , नाटक , जीवनी , यात्रा वर्णन , कोश , दर्शन , इतिहास , विज्ञान कोई भी विषय उनसे नहीं छूटा ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : समीक्षात्मक ग्रंथ भी उन्होंने लिखे । संस्कृत और तिब्बती भाषा में प्रयोग किए । कथा – साहित्य में उनके दो उपन्यास , ‘ सिंह सेनापति ‘ एवं ‘ जय यौद्धेय ‘ बहुत प्रसिद्ध हुए । कहानी संग्रहों में , ‘ सतमी के बच्चे ‘ और ‘ वोल्गा से गंगा तक ‘ प्रमुख हैं । उनके द्वारा सम्पादित किया गया ‘ राष्ट्रभाषा कोश ‘ एक मानक ग्रन्थ माना जाता है । मार्क्स , स्टालिन , माउत्से तुंग जैसे दिग्गजों से लेकर क्रान्तिकारी सरदार पृथ्वी सिंह , चन्द्रसिंह गढ़वाली तथा अन्य असहयोग के साथियों की जीवनियाँ उन्होंने लिखीं ।

साथ ही , वैज्ञानिक भौतिकवाद , दर्शन – दिग्दर्शन और बौद्ध दर्शन जैसी विद्वतापूर्ण पुस्तके भी वह लिख सके । उनकी ‘ घुमक्कड़ शास्त्र ‘ पुस्तक तो संसार में बेजोड़ है । उनकी यात्रा पुस्तकें असाधारण रूप से रोमांचक हैं । ‘ मेरी लद्दाख यात्रा ‘ , ‘ तिब्बत में सवा वर्ष ‘ , ‘ रूस में पच्चीस मास ‘ आदि पुस्तकें प्रसिद्ध हैं। राजनीति के क्षेत्र में उनकी ‘ भागो नहीं बदलो ‘ और ‘ साम्यवाद है ? जैसी पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं । विज्ञान के साथ – साथ उन्होंने साहित्य का इतिहास भी लिखा ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : मध्य एशिया के इतिहास ‘ के माध्यम से उन्होंने ऋग्वैदिक आर्यों से लेकर भारत में अंग्रेजी राज के संस्थापक तक के भारत से हमारा परिचय कराया ।’ तिब्बती भाषा और व्याकरण ‘ ,  संस्कृत वालपोथी ‘ जैसी पुस्तकों के नाम गिनाए जाएं , तो उनकी पुस्तकों की संख्या का कोई अंत नहीं ।

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नाममहापण्डित राहुल सांकृत्यायन
जन्म9 अप्रैल , 1893
जन्म स्थानपंदहा ग्राम , जिला आजमगढ़ , उत्तर प्रदेश
माता-पिताकुलवंती- गोवर्धन पाण्डेय
बचपन का नामकेदारनाथ पाण्डेय
मृत्यु14 अप्रैल , 1963
प्रशिद्ध यात्रातिब्बत की यात्रा
पुस्तकमेरी यूरोप यात्रा ‘ मेरी लद्दाख यात्रा ‘ , ‘ तिब्बत में सवा वर्ष ‘ , ‘ रूस में पच्चीस मास
शिक्षानाना जी ने प्राम्भिक शिक्षा दिये
योगदानस्वतंत्रता सेनानी के रूप में
बच्चेपुत्र जेवा और पुत्री जया
पत्नीलीला, कमलाजी
प्रमुख पुरस्कार 1958: साहित्य अकादमी पुरस्कार 1963: पद्म भूषण
पेशा इतिहासकार, भारतबिद, दर्शनशास्त्री, बहुबिद्यावान,लेखक, निबंधकार, बिद्वान, भारतीय राष्ट्रवादी,
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राहुल सांकृत्यायन का जन्म कब और कहाँ हुआ?

rahul sankrityayan in hindi : 9 अप्रैल , 1893 को महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का जन्म पंदहा ग्राम , जिला आजमगढ़ , उत्तर प्रदेश में हुआ था । उनका बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था । बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर वह बौद्ध हो गए और महात्मा बुद्ध के पुत्र के नाम पर अपना नाम ‘ राहुल ‘ रखा तथा अपने ‘ संस्कृति ‘ गोत्र के कारण सांकृत्यायन लिखने लगे ।

rahul sankrityayan in hindi : उन्होंने श्रीलंका , वर्मा , तिब्बत , चीन , जापान , मध्य एशिया का भ्रमण किया । रूस में वे अनेक वर्षों तक भारतीय दर्शन के अध्यापक रहे । वे संस्कृत , पाली , प्राकृत , अपभ्रंश , फारसी , अंग्रेजी , तिब्बती , चीनी , रूसी आदि भाषाओं के विद्वान् थे । बौद्ध दर्शन के वे प्रख्यात पंडित एवं व्याख्याकार थे । उन्होंने बौद्ध धर्म के अनेक ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद किया । जिनमें ‘ मज्झिम निकाय ‘ , ‘ दीर्घ निकाय ‘ और ‘ विनयपिटक ‘ विशेष उल्लेखनीय हैं ।

rahul sankrityayan in hindi : घूमने की प्रवृत्ति राहुलजी में बचपन से थी । तिब्बत , नेपाल , भूटान और सिक्किम से लेकर रूस , चीन तक उन्होंने पाँच बार यात्रा की विश्व के इस पर्यटक जैसा घुमक्कड़ साहित्य- मनीषी संसार में नहीं हुआ । उनका सारा जीवन ही यायावर रहा , एक यात्री का रहा । घुमक्कड़ी की प्रेरणा केदार पाण्डेय को बाल्यकाल में अपने नाना से मिली । उनके नाना रामशरण पाठक अवकाश प्राप्त सैनिक थे और उन्होंने भारत की व्यापक यात्राएँ की थीं ।

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राहुल सांकृत्यायन और उनका परिवार

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : बालक केदार ( राहुलजी ) को नाना गोद में या बगल में बिठाकर शिकार और यात्राओं की कहानियाँ सुनाया करते थे । नाना अजन्ता , एलोरा एवं अन्य ऐतिहासिक स्थलों का सरस वर्णन करते थे । नाना के इन यात्रा – वर्णनों का केदार पर गहरा प्रभाव पड़ा । केदार के पितृगाम , कनैला के निकट के उमरपुर गाँव में बाबा परमहंस की कुटी थी । बाबा परमहंस और उनके शिष्य , हरिकरण दास के सम्पर्क में जाने पर केदार पर संस्कृत के अध्ययन का वैराग्य और घुमक्कड़ी का भूत सवार हो गया ।

केदार की घुमक्कड़ी का जीवन प्रारम्भ हो गया । गृहत्याग के लिए , अति बाल्यकाल में उनका विवाह भी प्रेरणा बना , परन्तु अपनी उस पत्नी को वह कभी स्वीकार नहीं कर सके । इस बात की कसक उन्हें सदा पीड़ा देती रही । कहते हैं कि उस परिव्यक्ता की उन्होंने यथासम्भव सहायता की । कुछ समय बाद , जब राहुलजी उस क्षेत्र में गए , तो उसकी दुर्दशा देखकर वह उसके पास ठहर भी नहीं सके । बाहर आकर उन्होंने कहा कि मेरे ही कारण इस नारी की यह दुर्दशा हुई ।

rahul sankrityayan in hindi : इसके लिए वह स्वयं को कभी क्षमा नहीं कर सके । उनका यह विवाह सन् 1904 में हुआ था । राहुलजी की दूसरी पत्नी का नाम लीला था , जो एक रूसी महिला थी । राहुलजी की तीसरी पत्नी कमलाजी हैं , जिनसे उन्हें दो संतानें हैं— पुत्र जेवा और पुत्री जया ( अव श्रीमती जया पड़हाक ) । अस्तु , सन् 1911 में 18 वर्ष की आयु में चालक केदार गृहत्याग कर छपरा पहुँचे और अगले ही वर्ष परसा मठ में महंत के उत्तराधिकारी बने । संन्यास का इनका नाम रखा गया ‘ दामोदर दास ‘ कुछ दिनों के बाद उनके पिताजी एवं परिवार के अन्य सदस्य उन्हें वापस अपने गाँव ले गए।

स्वतंत्रता संग्राम में राहुलजी  का योगदान

rahul sankrityayan in hindi : इसके बाद , स्वतंत्रता सेनानी के रूप में राहुलजी पुनः छपरा पहुंचे । उन्हें  जिला कांग्रेस का सचिव बनाया गया । पड़ोस के अमवारी का जमीदार अंग्रेजों का दलाल था । वह क्रूर एवं अत्याचारी था । अपने स्वयं सेवकों के साथ राहुलजी ने जब विरोध किया , तो जमींदार ने इन पर अपना हाथी दौड़ा दिया और महावत ने अपना जोरदार भाला राहुलजी के सिर में भोंक दिया , जिससे उनके सिर से खून की धारा फूट पड़ी ।

rahul sankrityayan in hindi : घायलावस्था में ही राहुलजी को गिरफ्तार कर अंग्रेजों ने जेल में बन्द कर दिया । इसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में राहुलजी बार – बार जेल जाते रहे । 1921 में , महात्मा गांधी ने जो सत्याग्रह आन्दोलन छपरा में चलाया था , उसमें राहुलजी ने महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया था । बाद में राहुल सांकृत्यायन ने आर्य समाज के प्रचारक के रूप में काफी समय तक काम किया ।

सन् 1930 में दामोदर साधु , बौद्ध भिक्षु बने और इनका नाम ‘ राहुल सांकृत्यायन ‘ पड़ा । बहुत लम्बे समय तक बौद्ध भिक्षु रहने के बाद , पुनः गृहस्थ जीवन में वापस आ गए और कमलाजी से विवाह कर लिया । इसी अवधि में राहुलजी कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य बने । हिन्दी के प्रश्न पर कम्युनिष्ट पार्टी से मतभेद होने के कारण , इन्होंने पार्टी छोड़ दी । इस तरह , राहुलजी के जीवन के चार प्रमुख पड़ावों- वैष्णव साधु , आर्य समाजी प्रचारक , बौद्ध भिक्षु और साम्यवादी विचारक के अनुरूप उनकी मान्यताओं के भी चार प्रमुख दौर रहे हैं ।

rahul sankrityayan in hindi :इनके जीवन की मान्यताएँ बदलती रहीं , परन्तु अपनी जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ावों में उन्हें विभिन्न मतों वाले जो कई गुरुजन , गुरुवन्धु और अनेक साथी सहयात्री मिले , उनके प्रति अपने श्रद्धाभाव या स्नेह में उन्होंने कोई परिवर्तन नहीं आने दिया । परसा मठ के उत्तरा धिकार से अलग होने के बाद में , बौद्ध एवं साम्यवादी बनने के बाद भी , वे परसा मठाधीश को आदरभाव से गुरुजी कहकर ही याद करते थे । पुराने आर्य समाज के प्रचारक साथियों से भी उनके स्नेहपूर्ण सम्बन्ध निरन्तर बने रहे ।

rahul sankrityayan in hindi :साम्यवादी दल से अलग होने के बाद भी , अपने पुराने साथियों से दिल खोलकर मिलते थे ।उन्होंने अपने साम्यवादी साथियों के स्वयं के द्वारा खींचे गए फोटो से अलग एलबम ही सजा रखा था । वस्त्रों और विचारों के चोलेको बार – बार बदलते रहने वाले राहुलजी को अपने गुरुजनों , गुरुभाइयों और संगी – साथियों से सचमुच ही भरपूर स्नेह मिला , परन्तु श्रीलंका के अपने बौद्ध उपाध्याय नामक पद धर्मानंद एक अद्भुत एवं विलक्षण चीज है ।

राहुल सांकृत्यायन का तिब्बत यात्रा और उनके श्लोक व ग्रंथ

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : महास्थविर से और अपने बौद्ध गुरुभाइयों से जो स्नेह जैसा सहयोग राहुलजी को मिला , सन् 1929 में राहुलजी की तिब्बत यात्रा सर्वाधिक साहसिक एवं सनसनीखेजपूर्ण थी , जब वह भूमिगत होकर नेपाल के रास्ते पहली बार तिब्बत की राजधानी ल्हासा पहुँचे । बहुत से लोग जब दुर्गम यात्राएँ करते हैं , तो उन पर लाखों रुपए खर्च करते हैं और उनकी सहायता के लिए सैकड़ों आदमी होते हैं , परन्तु राहुलजी के पास तो सौ रुपए भी नहीं थे , किसी व्यक्ति के पास होने की तो बात ही दूर।

rahul sankrityayan in hindi : उन्हें तो तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने तिब्बत जाने की अनुमति तक नहीं दी थी , लेकिन वह घर जाते , तो राहुल कैसे बनते ? प्राण ही पर रखकर वह ऐसे दुर्गम मार्गों पर , जिन पर मानव के चरण – चिह्न भी कभी नहीं पड़े थे , वेश बदलकर ज्ञान की खोज में निकल पड़े । यह उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और अद्भुत साहस का परिचायक है । इन यात्राओं से राहुलजी की मात्र घुमक्कड़ी वृत्ति ही संतुष्ट हुई हो , यह बात नहीं है . उन्होंने संस्कृत एवं पालि के अनेक बौद्ध ग्रंथों का , जो दो हजार वर्ष पहले लुप्त हो गए थे , उनका पता लगाया ।

rahul sankrityayan in hindi : धर्मकीर्ति , प्रज्ञाकर गुप्त , ज्ञानश्री , नागार्जुन ( प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता ) , असंग , वसुबन्धु , रत्नाकर , शान्तिरक्षित , रत्नकीर्ति और गुण प्रभु – जैसे विद्वानों के यश को अमर कर दिया । कितना परिश्रम करना पड़ा होगा ? इन ग्रंथों का उद्धार करने में पचार हजार से अधिक श्लोक उन्होंने स्वयं नकल किए और लाखों श्लोकों के फोटो लिए । वे सभी ग्रंथ ताम्र – पत्र पर लिखे थे । इन्हीं यात्राओं में वह हिन्दी साहित्य के इतिहास को पीछे ले गए । उन्होंने सरहपा नामक एक ऐसे कवि को खोज निकाला , जिसने सन् 850 में हिन्दी में दोहे लिखे थे ।

राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतांत का सारांश

राहुल सांकृत्यायन के यात्रा वृतांत का सारांश : यह सारी साहित्य – सामग्री , जिनमें अनेक मूल ग्रंथ भी हैं , इक्कीस खच्चरों पर लादकर राहुलजी भारत लाए । राहुलजी के इस अभूतपूर्व एवं प्रशंसनीय कार्य की तुलना किसी और से नहीं की जा सकती । राहुलजी द्वारा लाई गई यह सारी सामग्री पटना म्यूजियम के ‘ राहुल सेक्शन ‘ में यत्नपूर्वक संग्रहित है । राहुलजी को तिब्बत की सांस्कृतिक रत्नराशि का इतना गहरा ज्ञान था कि चीन की सरकार ने उन्हें तिब्बत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने के लिए और इस बिखरी हुई रत्नराशि को सहेजने , उसका पंजीयन और वर्गीकरण करने के लिए अपने यहाँ आमंत्रित किया ।

राहुलजी उस कार्य को करने के लिए गए भी , परन्तु बीमार हो जाने के कारण बिना किए ही वापस आ गए । राहुलजी ( उस समय स्वामी दामोदर साधु ) पहली बार 1927 में विद्यालंकार महाविद्यालय ( श्रीलंका ) आए थे और वहाँ 19 मास रहकर उन्होंने अध्ययन अध्यापन का काम किया था । तिब्बत की पहली उपरोक्त यात्रा ( 1929-30 ) के बाद वह पुनः श्रीलंका पहुँचे ।

rahul sankrityayan in hindi : श्रीलंका की अपनी पहली यात्रा पर राहुलजी लिखते हैं , मेरे आने की खबर बौद्ध विहार के प्रधान श्री धर्मानन्द नायक महास्थविर के पास पहुँच गई और कितने ही अध्यापक तथा विद्यार्थी भिक्षु वहाँ जमा हो गए । मैने महास्थविर को विनम्र भाव से प्रणाम किया । उन्होंने संस्कृत में मार्ग की कुशलता के बारे में पूछा । पहले ही दर्शन के समय महास्थविर के ओठों तक परिसीमित हास , आँखों में स्नेह की चमक और मधुर भाषण ने मेरे दिल से स्थान की अपरिचितता को दूर कर दिया ।

rahul sankrityayan in hindi : तिब्बत से लौटने के बाद विद्यालंकार बिहार में नायकपाद धर्मानंदजी के उपाध्यायत्व में राहुलजी की जून , 1930 में प्रज्या हुई और कांडी में एक भव्य समारोह में उपसम्पदा , अब दामोदर साधु भिक्षु ‘ राहुल सांकृत्यायन ‘ थे । भारत में ही राहुलजी के साथ स्वार्थी भारतीय विद्वानों ने कदम – कदम पर धोखा दिया । सन् 1955 में दो महानुभाव वाराणसी से एक विशेष प्रस्ताव लेकर राहुलजी से मिले । प्रस्ताव लाने वाले व्यक्ति थे ।  डॉ . राजवली पाण्डेय और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी . प्रस्ताव यही था कि काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से हिन्दी में विश्वकोश प्रकाशन की योजना है ।

rahul sankrityayan in hindi : उस कार्य में प्रधान संपादक का भार राहुलजी को ग्रहण करना होगा । राहुलजी ने अपनी स्वीकृति दे दी । उन दिनों राहुलजी मसूरी में सपरिवार रहते थे । विश्वकोष निर्माण से सम्बन्धित सामग्रियों को एकत्रित करने में वह जुट गए । अंग्रेजी भाषा के विश्वकोषों को पुस्तकालय से लाकर अध्ययन करने लगे । कोश में देने के लिए विभिन्न विषयों पर विद्वानों से लिखवाने के लिए उन्होंने लेखकों की नामावली भी तैयार कर ली । कौन सहायक या उपसम्पादक होगा ? इसके बारे में सोच लिया । विश्वकोष निर्माण के लिए इन्होंने स्वयं को पूरी तरह तैयार कर लिया ।

राहुल सांकृत्यायन के खिलाफ राजनेतिक षड्यंत्र और नियुक्ति पत्र

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : कोश के लिए धन भारत सरकार दे रही थी । नागरी प्रचारिणी सभा के प्रमुख अधिकारी थे केन्द्रीय गृहमंत्री पं . गोविन्दवल्लभ पंत और प्रधान सम्पादक की नियुक्ति का अधिकार इन्हीं के हाथ में था । राहुलजी के प्रधान सम्पादक होने की बात चारों ओर फैल चुकी थी और सब जगह से इस सम्बन्ध में पत्र भी आने लगे । राहुलजी दो वर्ष तक अधर में लटके रहे , लेकिन नियुक्ति पत्र नहीं आया , राहुलजी के विरुद्ध सर्पषड्यंत्र चलाया गया और राजनीतिक दाव – पेंच के द्वारा इस पद पर डॉ . भगवत शरण उपाध्याय ने अपनी नियुक्ति करवा ली ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : इस तरह राहुलजी के साथ धोखा हुआ और इस घटिया खेल से वह खिन्न हो गए । इसी समय उन्हें चीन से बुलावा आया और वह चीन चले गए । उसी समय तिब्बत में उथल – पुथल मच गई और वह तिब्बत नहीं जा सके । चीन में उन्हें श्रीलंका से नियुक्ति पत्र आया । यह है कि 1959 में भारत के राष्ट्रपति डॉ . राजेन्द्र प्रसाद ने विद्यालंकार विश्व विद्यालय का उद्घाटन किया । नए विश्वविद्यालय को योग्य महाचार्यों की आवश्यकता थी । वह अपने महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को कैसे भूल सकता था ?

उसने राहुलजी को अपने दर्शन विभाग के महाचार्य ( अध्यक्ष ) के पद पर आसीन किया । पूरे 26 साल बाद राहुलजी पुनः श्रीलंका पधारे थे । राहुलजी की ‘ जीवन – यात्रा ‘ पाँच खण्डों में कुल 2770 पृष्ठों में प्रकाशित हुई । राहुलजी के इस ग्रंथ में राहुलजी के बारे में कम , मगर दूसरे के बारे में , परिवेश के बारे में अधिक जानकारी मिलती है । राहुलजी के कई प्रकाशनों की चर्चा इस लेख में पहले ही की जा चुकी है ।

राहुल सांकृत्यायन के पुस्तकें और ग्रन्थ

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : इनकी कुछ अन्य पुस्तकें हैं- चीन में क्या देखा , रूस में पच्चीस मास , सोवियत भूमि , सोवियत मध्य एशिया , मेरी लद्दाख यात्रा , श्रीलंका , तिब्बत में सवा वर्ष , मेरी तिब्बत यात्रा , यात्रा के पन्ने , महामानव बुद्ध , घुमक्कड़ स्वामी , सिंघल घुमक्कड़ जयवर्धन । सन् 1932 में राहुलजी यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा पर गए थे । जिसका वर्णन ‘ मेरी यूरोप यात्रा ‘ ग्रन्थ में है।

‘ जापान ‘ नामक ग्रंथ में भिक्षु राहुल की 1935 में सिंगापुर , हांगकांग , जापान , कोरिया , मंचूरिया , सोवियत संघ और ईरान की यात्रा का वर्णन है । ईरान के इतिहास और वहाँ यात्राओं के बारे में एक और ग्रन्थ भी है ।

अन्य ऋषियों की तरह , हिमालय ने राहुलजी को भी बहुत आकर्षित किया । लम्बे समय तक मसूरी और कालिम्पोंग ( दार्जिलिंग ) में निवास करने के अतिरिक्त , राहुलजी ने विशाल हिमालय की व्यापक यात्रा की । हिमालय – यात्रा के बारे में राहुलजी के प्रकाशित ग्रंथ हैं गढ़वाल , कुमायूँ , किन्नर देश , और नेपाल इनके अतिरिक्त हिमालय के बारे में राहुलजी के अप्रकाशित है और भी कई ग्रंथ अब भी अप्रकाशित हैं ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay :इनका एक अन्य ग्रंथ ‘ आजमगढ़ की पुराकथा ‘ भी राहुलजी के आत्मकथा ग्रंथ हैं- बचपन की स्मृतियाँ , अतीत से वर्तमान मेरे असहयोग के साथी और जिनका मैं कृतज्ञ हूँ ।

विज्ञान के उच्च कोटि के जिन ग्रंथों की रचना राहुलजी ने की , उनमें प्रमुख हैं-

विश्व की रूपरेखा ( एस्ट्रोनॉमी ) ,
मानव समाज ,
वैज्ञानिक भौतिकवाद और दर्शन – दिग्दर्शन ।

राहुलजी ने निम्न शब्दकोशों की भी रचना की –

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शासन शब्दकोश ,
जीव रसायन शब्दकोश और
शरीर शब्दकोश ।


राहुलजी की कुछ अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ

धारा ,
मध्य एशिया का इतिहास ,
दोहाकोश ,
घुमक्कड़शास्त्र ..
हिन्दी काव्य धारा ,
अपभ्रंश काव्यधारा ,
संस्कृत काव्यधारा ,
पालि काव्यधारा ,
प्राकृत काव्य  राहुलजी की कुछ अन्य महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay : बुद्धचर्या , बौद्ध – संस्कृति , घुमक्कड़शास्त्र , हुआ , अधिक विवेचित हुआ और अधिकांश ने उनके कथा – साहित्य पर ही डॉक्ट्रेट की उपाधि राहुलजी की कृतियों में से बहुत कम बाजार में उपलब्ध हैं । अधिकांश का तो पुनर्मुद्रण पाई है । इस तरह हम देखते हैं कि कर्म ही राहुलजी के जीवन की वास्तविक सिद्धि , उनका सबसे बड़ा सुख था ।

राहुल सांकृत्यायन का मृत्यु कब हुआ?

rahul sankrityayan in hindi :उसी कर्म की धुरी पर उनके जीवन का चक्र घूमता था — सरल , आडम्बरमुक्त , अनुशासित कर्म – तत्पर जीवन न कहीं आलस्य न प्रमाद न अहंकार । बच्चों जैसा स्वभाव , वैसी ही सरल मुस्कान । उनके भीतर क्रोध तो था ही नहीं । यह स्थिति 11 दिसम्बर , 1961 तक रही , जब उन्हें ‘ स्कृति लोप ‘ का आघात हुआ और वह सब कुछ भूल गए ।

कुछ भी याद नहीं रहा । यह कारुणिम दशा जीवन के अन्तिम क्षण तक बनी रही । 14 अप्रैल , 1963 को वह दिवंगत हुए , किन्तु वह अपनी कृतियों के कारण सदैव स्मरण किए जाएंगे ।

राहुल के जीवन की प्रमुख घटनाएँ

  • 9 अप्रैल , 1893 – ग्राम पंदहा , जिला आजमगढ़ , उत्तर प्रदेश में , ननिहाल में जन्म , पिता श्री गोवर्धन पाण्डे , माँ कुलवंती देवी . चार भाई और एक बहन के बीच में सबसे बड़े जन्म नाम – केदार पाण्डे ।
  • 1912-13 – परसा मठ में साधु और संभावित मठाधीश ।
  • 1913-14 – दक्षिण भारत की यात्रा ।
  • 1922- बक्सर जेल में छह मास , जिला कांग्रेस के सचिव ।
  • 1923-25 हजारीबाग जेल में श्रीलंका में संस्कृत अध्यापक , बौद्ध साहित्य का अध्ययन ।
  • 1929-30:- तिब्बत में सवा वर्ष ।
  • 1932-33:-इंगलैण्ड और यूरोप में ।
  • 1934-तिब्बत की दूसरी यात्रा ।
  • 1935- जापान , कोरिया , मंचूरिया , सोवियत रूस और ईरान की यात्रा ।
  • 1936-तिब्बत की तीसरी यात्रा ।
  • 1937-सोवियत रूस की दूसरी यात्रा ।
  • 1938-तिब्बत की चौथी यात्रा । पुत्र ईगोर का जन्म ।
  • 1939-अमवारी में किसान सत्याग्रह और जेल ।
  • 1940-42– हजारीबाग जेल और देवली बंदी कैंप में ।
  • 1943- चौंतीस वर्ष बाद अपने जन्म ग्राम में वापस । प्रथम पत्नी मिलने के लिए आईं । उत्तराखण्ड की यात्रा ।
  • 1944-47:- सोवियत रूस में लेनिनग्राद में प्रोफेसर ।
  • 1947-48– हिन्दी साहित्य सम्मेलन , इलाहाबाद के बंबई अधिवेशन के अध्यक्ष ।
  • 1950- में मसूरी में एक मकान खरीदा , जो बाद में बेच दिया ।
  • 1954-पुत्री जया का जन्म ।
  • 1955- पुत्र जेता का जन्म
  • 1958- चीन के गणवादी जनतंत्र में साढ़े चार मास ।
  • 1959-61 दिसम्बर – श्रीलंका में दर्शन के प्रोफेसर ।
  • 1961 – स्मृति – नाश ।
  • 1962-63– सोवियत रूस में सात महीने इलाज ।
  • 1963- मृत्यु ।


राहुल सांकृत्यायन को मिले सम्मान

  1. महापण्डित– काशी पण्डित सभा ।
  2. त्रिपिटकाचार्य – विद्यालंकार परिवेण , श्रीलंका ।
  3. साहित्य वाचस्पति – हिंदी साहित्य सम्मेलन , इलाहाबाद ।
  4. डी . लिट् ( मानद ) – भागलपुर यूनीवर्सिटी , भागलपुर ।
  5. डी . लिट् ( मानद ) – विद्यालंकार यूनीवर्सिटी , श्रीलंका ।
  6. पद्मभूषण- भारत सरकार ।

rahul sankrityayan ka jeevan parichay:- FAQ

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को कितने भाषा आता था?

राहुलजी 36 भाषाओं के ज्ञाता थे और उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकों की रचना की ।

राहुल सांकृत्यायन के आने वाले विषयों के नाम बताये!

उपन्यास , कहानी , नाटक , जीवनी , यात्रा वर्णन , कोश , दर्शन , इतिहास , विज्ञान कोई भी विषय उनसे नहीं छूटा ।