munshi premchand ki kahani
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मुंशी प्रेमचंद की कहानी

munshi premchand ki kahani : विषय – प्रवेश कथा साहित्य का प्रत्येक पाठक सामान्य रूप से और हिन्दी साहित्य का प्रत्येक पाठक विशेष रूप से हिन्दी उपन्यास के सम्राट् प्रेमचन्द के नाम से अवश्य परिचित होना चाहिए । यद्यपि हिन्दी में उपन्यास विधा का प्रवर्तन भारतेन्दु युग में ही हो गया था , तथापि उसको समाज के साथ जोड़ने का कार्य प्रेमचन्द ( मुंशी प्रेमचन्द ) ने किया । उन्होंने अपने परिवेश का , देशकाल का यथार्थ एवं सजीव चित्रण किया ।

munshi premchand ki kahani : व्यक्ति , समाज और देश तीनों उनके हृदय में विराजते थे । प्रेमचन्द ने तीनों से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन पूरी गहराई के साथ किया । विशेषता यह रही कि समस्याओं के समाधान की ओर इंगित करके उन्होंने पाठकों को उस दिशा में सोचने के लिए विवश भी किया ।

मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय

munshi premchand ka jeevan parichay : – जीवन – परिचय प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई , 1887 ई . को काशी ( वाराणसी ) के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था । आपका संस्कारकृत अथवा वास्तविक नाम धनपत राय था । आपके पिताश्री का नाम अजाबराय तथा माता का नाम आनंदी देवी था । आपके पिता डाकखाने में ₹ 7 मासिक पाते थे ।

premchand jeevan parichay in hindi : – बालक धनपतराय की अवस्था जब 8 वर्ष की थी , तभी माताश्री का स्वर्गवास हो गया । पिताश्री ने दूसरी शादी कर ली । फलतः प्रेमचन्द को गरीबी के साथ विमाता के कोप के अभिशाप भोगने पड़े।13 वर्ष की आयु में आपका नाम मिशन स्कूल के छठे दर्जे में लिखाया गया ।

थोड़े दिनों इनकी प्रारम्भिक पढ़ाई घर पर ही हुई । एक मौलवी साहब आपको उर्दू पढ़ाया करते पास कर लिया । इसके पूर्व इनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया था और 15 वर्ष की अवस्था बाद आपने अपनी पढ़ाई का खर्च चलाने के लिए ट्यूशन आदि की और किसी प्रकार बी.ए. में विवाह भी हो गया था । उनका वैवाहिक जीवन दुःखी हो गया ।

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नाममुंशी प्रेमचन्द
वास्तविक नामधनपत राय
जन्म31 जुलाई , 1887 ई
जन्म स्थानकाशी ( वाराणसी ) के निकट लमही नामक गाँव
मृत्यु8 अक्टूबर , 1936
मृत्यु स्थान(उम्र 56) वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत
माता-पिताआनंदी-अजाबराय
बच्चेश्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी
कार्यलेखक
शिक्षामिशन स्कूल,
भाषाटकसाली एवं लोकप्रिय हिन्दी
प्रमुख उपन्यास गोदान,प्रतिज्ञा,कायाकल्प,निर्मला,सेवासदन
कार्यकाल1887-1936 ई0
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मुंशी प्रेमचन्द का आरंभि जीवन

munshi premchand ka jeevan parichay : प्रेमचन्द ने पत्नी का त्याग करके दूसरा विवाह विधवा शिवरानी से कर लिया । शिवरानी उनकी अद्भुत जीवन संगिनी सिद्ध हुई । जीविका विद्याध्ययन के समय में प्रेमचन्द ट्यूशन करते थे । बाद में ₹ 18 माह पर सरकारी अध्यापक हुए और तरक्की करते हुए इन्सपेक्टर के पद पर पहुँच गए , परन्तु वह सरकारी नौकरी इन्हें छोड़नी पड़ी । गांधीजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन में वह कूद पड़े ।

इसके बाद उन्होंने सम्पादन के क्षेत्र में प्रवेश किया । उन्होंने मर्यादा माधुरी , जागरण और हंस का सम्पादन किया । कुछ समय के लिए प्रेमचन्द फिल्मी जगत में काम करने के लिए बम्बई गए थे , परन्तु स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया और वह वापस वाराणसी आ गए । जहाँ उन्होंने अपना प्रेस लगा रखा था । उन्होंने पूर्ववत् ‘ हंस ‘ का सम्पादन आरम्भ कर दिया । यह सन् 1931 की बात है ।

munshi premchand ki kahani : लम्बी बीमारी के बाद अंतिम घड़ी तक जीवन से संघर्ष करते हुए प्रेमचन्द 8 अक्टूबर , 1936 को इस संसार से विदा हुए । कहते हैं कि अंतिम घड़ी तक वह ‘ हंस ‘ के लिए चिन्तित थे और उसके लिए लिखते रहे थे । प्रेमचन्द की साहित्य – साधना प्रेमचन्द उन साहित्यकारों में से हैं , जो साहित्यकार होने के साथ – साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे । आपने कानपुर से प्रकाशित होने वाले एक मासिक – पत्र में उपनाम प्रेमचन्द से ‘ रफ्तारे जमाना ‘ शीर्षक स्तम्भ में नियमित रूप से लिखना आरम्भ किया ।

इस स्तम्भ में वह संवैधानिक सुधार , तुर्की व रूस में होने वाली क्रांति जैसे सामयिक विषयों पर टिप्पणियों लिखा करते थे ।

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प्रेमचन्द द्वारा लिखित पहली कहानी

munshi premchand ki kahani : प्रेमचन्द द्वारा लिखित पहली कहानी है- ‘ दुनिया का सबसे अनमोल रत्न ‘ , यह कहानी उर्दू में लिखित है और उनके ‘ पूनम ‘ नामक कहानी – संग्रह में प्रकाशित हुई है । यह कहानी लिखकर प्रेमचन्द ने दुनिया को यह बताया कि मातृभूमि की सेवा में बहाए गए खून की एक एक बूँद संसार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तु होती है । सन् 1908 में उनकी कहानी ‘ सोजे वतन ‘ प्रकाशित हुई ।

munshi premchand ki kahani : उसके कारण प्रेमचन्द को सरकारी नौकरी छोड़ देनी पड़ी । प्रेमचन्द का कृतित्व बहुआयामी है और इनकी साहित्य साधना अपने आप में पूर्ण है ।
( क ) उपन्यास– सेवासदन , निर्मला , गवन , कर्मभूमि , रंगभूमि , कायाकल्प , प्रतिज्ञा , उन्होंने गद्य की प्रायः समस्त विधाओं का स्पर्श किया , यथा प्रेमाश्रय , वरदान और गोदान ।

( ख ) कहानी– प्रेमचन्द ने सैकड़ों कहानियाँ लिखीं । उनके कई कहानी – संग्रह प्रकाशित प्रसिद्ध कहानी संग्रह ये हैं- सप्तसरोज , नवनिधि , प्रेम – पचीसी , प्रेमपूर्णिमा , प्रेमद्वादशी , प्रेम – तीर्थ , प्रेम – पीयूष , प्रेम – कुंज , पंच प्रसून , सप्त प्रसून , मानसरोवर ( आठ भागों में ) प्रेम प्रतिमा , प्रेम – सरोवर आदि ।

( ग ) नाटक – संग्राम , कर्बला , रूठी रानी तथा प्रेम की वेदी ।
( घ ) निबन्ध – कुछ विचार , कलम , तलवार और न्याय ।
( ङ ) जीवन चरित्र – दुर्गादास मौ . शेखसादी आदि ।
( च ) कालोपयोगी कृतियाँ– टॉलस्टाय की कहानियाँ , जंगल की कहानियाँ , कुत्ते की कहानी , मनमोहक आदि ।

( छ ) अनुवाद – सृष्टि का प्रारम्भ , फिसाने , आजाद , अहंकार , हड़ताल , चाँदी की डिविया तथा न्याय । प्रेमचन्द ने यद्यपि गद्य की विभिन्न विधाओं पर लेखनी चलाई , तथापि उनकी प्रसिद्धि एक कथाकार , उपन्यासकार एवं कहानीकार के रूप में है ।

मुंशी प्रेमचन्द की साहित्य साधना

munshi premchand ka jeevan parichay : प्रेमचन्द ने अपने साहित्य के माध्यम से भारत के दलित एवं उपेक्षित वर्गों को वाणी प्रदान की प्रेमचन्द वस्तुतः समूचे मानवतावादी साहित्यकार थे । इनके कथा साहित्य के विषय में डॉ . हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि ” प्रेमचन्द शताब्दियों से पददलित , अपमानित और उपेक्षित कृषकों की आवाज थे ।” पर्दे में कैद , पद – पद पर लांछित और असहाय नारी जाति की महिमा के वह जबर्दस्त वकील थे ; गरीबों और बेकसों के महत्व के प्रचारक थे ।

अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार – विचार , भाषा – भाव , रहन – सहन , आशा – आकांक्षा , दुख – सुख और सूझ – बूझ जानना चाहते हैं , तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता , झोंपड़ियों से लेकर महलों , खोमचे वालों से लेकर बैंकों , गाँव से लेकर धारा – सभाओं तक आपको इतने कौशलपूर्वक और प्रमाणिक भाव से अन्य कोई नहीं ले जा सकता है ।

munshi premchand ki kahani : प्रेमचन्द ने अपनी कला को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर मर्मों को उद्घाटित करने वाली साधना बनाया । उनके उपन्यास भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सटीक भाष्य हैं और उत्तरी भारत के ग्रामीण वातावर के सवाक् चित्र ।

मुंशी प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यास

munshi premchand ki kahani : प्रेमचन्द ने दो प्रकार के उपन्यास लिखे हैं – राजनीतिक और सामाजिक । इनमें समग्र रूप से भारतीय जीवन की बहुमुखी समस्याएँ चित्रित की हैं । उनके ‘ प्रेमा ’ और ‘ वरदान ’ उन दिनों के उपन्यास हैं , जब वह नवावराय के नाम से उर्दू में लिखा करते थे ।’ सेवासदन ‘ उनका कलात्मक दृष्टि से प्रथम प्रौढ़ उपन्यास है , जिसमें मध्य वर्ग के विडम्बनामय जीवन का चित्र है ।

प्रेमाश्रय ‘ में ग्राम्य जीवन की समस्याओं का विशाल चित्रण है ।’ सेवा सदन ‘ में वेश्याओं की समस्या है , तो ‘ प्रेमाश्रय ‘ में किसानों की ।’ रंगभूमि ‘ इनका सबसे बड़ा उपन्यास है और इसमें शासक वर्ग के अत्याचारों की समस्या है । ‘ कर्मभूमि ‘ राजनीतिक उपन्यास है , जिसमें जनता की साम्राज्य विरोधी भावना है ।

premchand jeevan parichay in hindi : ‘ प्रतिज्ञा ‘ की समस्या विधवा – विवाह से सम्बद्ध है । ‘ गवन ‘ में प्रेमचन्द ने भूषणों की लालसा के दुष्परिणामों को दर्शाया है ।’ कायाकल्प ‘ उनकी उपन्यास परम्परा के विपरीत योगाभ्यास , पुनर्जन्मवाद आदि विषयों से सम्बद्ध है और यह उनका सबसे हल्का उपन्यास है ।’ निर्मला ‘ में अनमेल विवाह के दुष्परिणामों और विमाता की समस्याओं का चित्रण है । ‘ गोदान ‘ प्रेमचन्द का ही नहीं , वरनू हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है ।

गोदान ‘ में किसान और मजदूर के शोषण की करुण कथा है। गोदान और निर्मला को छोड़कर बाकी उपन्यासों में प्रेमचन्द आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रहे हैं , वह समस्या को उठाकर गांधीवादी ढंग से कोई न कोई उसका समाधान प्रस्तुत कर देते हैं , किन्तु निर्मला और गोदान में एकदम यथार्थवादी दृष्टिगोचर होते हैं ।

munshi premchand ki kahani : कदाचित् यहाँ तक पहुँचते – पहुँचते गांधीवाद से उनकी आस्था उठ गई थी । इन उपन्यासों में केवल समस्या है , समाधान नहीं है । गोदान का होरी दुःख में जन्मा , दुःख में पला और दुःख में मरा । गोदान सर्वथा एक यथार्थ । वादी उपन्यास है । हिन्दी के आलोचकों ने प्रेमचन्द की विषय – व्यापकता और तलस्पर्शिनी चरित्र – चित्रण की सूक्ष्मता की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए उन्हें उपन्यास सम्राट् कहा है ।

प्रेमचन्द की उपन्यास कला की सामान्य विशेषताएँ और प्रेमचन्द की भाषा

premchand jeevan parichay in hindi : प्रेमचन्द की यह सुनिश्चित मान्यता थी कि जब देश आजाद होगा , तभी किसानों और अन्य लोगों की गरीबी दूर होगी तथा भारत तभी समृद्ध होगा , जब भारत के किसान की गरीबी दूर होगी । इसी लक्ष्य को लेकर उन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों द्वारा देशभक्ति का प्रचार किया और आजादी का अलख जगाया । प्रेमचन्द के कथा साहित्य में गांधीवाद और गांधी युग मुखर हैं ।

munshi premchand ki kahani :  वह डॉ . पट्टाभिसीतारमैय्या की प्रसद्धि पुस्तक “ The History of the Indian National Congress ‘ के समानान्तर गांधी युग का कलात्मक इतिहास है । प्रेमचन्द ने जन – साधारण के जीवन की सामान्य परिस्थितियों , मनोवृत्तियों एवं समस्याओं का मार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है । प्रेमचन्द की मनोवैज्ञानिकता किताबी न होकर अनुभव एवं निरीक्षण पर आधारित है ।

प्रेमचन्द की भाषा सामान्यतः टकसाली एवं लोकप्रिय हिन्दी मानी जाती है । उनकी भाषा शैली अत्यन्त सरल , स्वाभाविक एवं रोचक है । उनकी भाषा वस्तुतः भारतीय जनता की है , जो पाठक के हृदय को उद्वेलित करने में पूर्णतः समर्थ है । मुहावरों एवं लोक लोकोक्तियों के समावेश के कारण भाषा की अभिव्यंजनाशक्ति में चार चाँद लग गए हैं , तो वह उपन्यास सम्राट् हैं । उनकी समस्त कथा – साहित्य सोद्देश्य एवं मानवीय गुणोयेव है ।

समाज – सुधारक प्रेमचन्द

munshi premchand ka jeevan parichay : प्रेमचन्द के उपन्यास और उनकी कहानियाँ सामाजिक एवं सोद्देश्य हैं । वह एक गम्भीर विचारक एवं चिन्तनशील व्यक्ति थे । उन्होंने उत्तरी भारत के समाज की विभिन्न समस्याओं पर अपने गम्भीर विचार प्रकट किए हैं । उन्होंने बाल – विवाह , बेमेल विवाह , विधवा – विवाह , नारी – शिक्षा आदि अनेक सामाजिक समस्याओं को अपनी कृतियों में उठाया है और उनके समाधान प्रस्तुत करके अपने को एक सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया है । उनके उपन्यास ‘ सेवा सदन ‘ एवं ‘ निर्मला ‘ नारी समस्या से सम्बद्ध यथार्थ के उपन्यास हैं ।

अपने कई उपन्यासों में उन्होंने अछूतों के आर्थिक शोषण के लिए ठेकेदारों , पंडे – पुरोहितों आदि को आड़े हाथों लिया है । सामाजिक संकीर्णताओं के विरोध में प्रेमचन्द ने बहुत ही सशक्त एवं बुलंद आवाज उठाई । प्रेमचन्द ने धार्मिक अंध – विश्वासों के विरुद्ध भी खूब लिखा । ‘ रंगभूमि ‘ में प्रेमचन्द कहते हैं कि ” जहाँ धर्म से व्यापार में सहायता मिलती है , वहाँ धर्म ग्राह्य है और जहाँ धर्म व्यापार के आड़े आता है , वहाँ त्याज्य है । ” अथवा धर्म तो व्यापार का शृंगार है ।।उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मोपजीवी और धार्मिक रूढ़ियाँ सामाजिक विकास में बाधक हैं ।

premchand jeevan parichay in hindi :  ‘ कायाकल्प ‘ में प्रेमचन्द ने हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर गहरा आघात किया है । उनका यह कथन दृष्टव्य है – “ यदि हिन्दू – मुस्लिम समस्या को हल नहीं किया गया , तो स्वराज का कोई अर्थ नहीं होगा ।

उपसंहार

munshi premchand ki kahani : मुंशी प्रेमचन्द के आगमन हिन्दी उपन्यास साहित्य की रिक्तता की पूर्ति सही अर्थों में हुई । वस्तुतः वह हिन्दी के प्रथम मौलिक एवं युग प्रवर्तक उपन्यासकार थे । प्रेमचन्द उपन्यास जगत् में एक ऐसे केन्द्र बिन्दु थे , जिसमें भारतीय एवं पाश्चात्य उपन्यास कला का सामंजस्य दिखाई देता है ।

प्रेमचन्द ने कला और जीवन का संतुलित सामंजस्य प्रस्तुत किया । उन्होंने अपनी मौलिक , प्रौढ़ एवं गरिमामयी कृतियों द्वारा हिन्दी साहित्य में उपन्यास परम्परा का प्रवर्तन ही नहीं किया , अपितु अपनी श्रेष्ठ एवं कालजयी कृतियों द्वारा हिन्दी साहित्य का मस्तक भी ऊँचा किया ।

munshi premchand ki kahani : हिन्दी कथा साहित्य को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय प्रेमचन्द को प्राप्त है । प्रेमचन्द के सम्पूर्ण साहित्य में आदर्श और यथार्थ का संगम है , परन्तु उनका झुकाव आदर्श की ओर अधिक है । आदर्शवादी विचारों के पोषक के रूप में प्रेमचन्द ने समाज को अनेक शुभ संदेश दिए हैं ।

अन्त में यही कहा जाएगा कि प्रेमचन्दजी नवयुग के निर्माता एवं भाषा के सृष्टा थे । कथाकार के रूप में उनकी श्रेष्ठता का मूल्यांकन करते हुए कुछ विद्वान् प्रेमचन्द को गोर्की की संज्ञा देते हैं और अन्य लोग ग्रामीण वातावरण के चित्रण की उनकी क्षमा को लक्ष्य करके उन्हें अंग्रेजी के कथाकार हार्डी के रूप में देखते हैं । हमारी राय में तो प्रेमचन्द केवल प्रेमचन्द थे । वह एक लोकनायक कलाकार के रूप में अमर हैं।

munshi premchand ki kahani – FAQ

मुंशी प्रेमचन्द के कितनी पत्नियां थी?

दो पत्निया ( दूसरी पत्नी – विधवा शिवरानी )

मुंशी प्रेमचन्द का भाषा शैली क्या हैं?

टकसाली एवं लोकप्रिय हिन्दी

प्रेमचन्द द्वारा लिखित पहली कहानी का नाम क्या है?

दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

प्रेमचन्द का जन्म कब हुआ था?

31 जुलाई , 1887 ई

प्रेमचंद की अंतिम कहानी कौन सी है?

मंगलसूत्र