Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay
Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay

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मैथिलीशरण गुप्त सामान्य परिचय –

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : आधुनिक काल के हिन्दी कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है । वह हमारे राष्ट्रीय कवि हैं । मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव ( जिला झाँसी , उत्तर प्रदेश ) में सन् 1883 में हुआ । आपके पिताजी का नाम सेठ रामचरण था , जो एक सम्पन्न वैश्य थे ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : मैथिलीशरण गुप्त को काव्य प्रतिभा पैतृक सम्पत्ति अथवा विरासत के रूप में प्राप्त हुई । आपके पिता श्री ‘ कलकलता ‘ उपनाम से कविता किया करते थे । आपके अनुज सियारामशरण गुप्त भी हिन्दी के जाने – माने साहित्यकार , कवि व गद्यकार थे । मैथिलीशरण गुप्त को बचपन से ही कविता करने का शौक था । प्रारम्भ में वह ब्रजभाषा में कविता करते थे , परन्तु बाद में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाववश वह खड़ी बोली में कविता करने लगे ।

Maithilisharan Gupta biography : गुप्तजी ने अपनी सुमधुर रचनाओं द्वारा इस आरोप को झुठला दिया कि खड़ी बोली अपनी खड़खड़ाहट के कारण कविता की भाषा नहीं बन सकती है । गुप्तजी की सरस कविता ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रज भाषा के समान खड़ी बोली में भी सरस एवं कर्णप्रिय कविता लिखी जा सकती है ।

सन् 1906 से गुप्तजी की कविताएँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका ‘ सरस्वती ‘ में प्रकाशित होने लगी थी । पूर्ण आयु एवं अनेक मान – सम्मान प्राप्त करने के उपरान्त आप सन् 1964 में स्वर्गवासी हुए। आपने अपने पीछे भरा – पूरा परिवार छोड़ा ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay chart
नाममैथिलीशरण गुप्त
जन्म1883
जन्म स्थानचिरगाँव ( जिला झाँसी , उत्तर प्रदेश )
मृत्यु1964
मृत्यु स्थान
माता-पिता कशीवाई-सेठ रामचरण
उपाधिराष्ट्रकवि (गाँधी जी के द्वारा)
कार्यकाव्य रचनाएँ,व्यवसाय कवि, अनुवादक,नाटककार, राजनेता
प्रसिद्धिकवि के रूप में
शिक्षाचिरगाँव, मिडिल के मैकडोनल हाई स्कूल
रचनाएँभारत – भारती,विरहणी ब्रजांगना , प्लासी का युद्ध और मेघनाद वध
ग्रंथों की संख्या52
भाषाब्रजभाषा
मृत्यु आयु 78 वर्ष
सम्मान हिन्दुस्तान अकादमी पुरस्कार (1935) मंगलाप्रसाद पुरस्कार हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा (1937)साहित्यवाचस्पति (1946) पद्मभूषण (1954)
Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay
मैथिलीशरण गुप्त का काव्य और विशेषता

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : सर्वप्रथम सन् 1909 में उनका एक छोटा – सा प्रवन्ध काव्य ‘ रंग में भंग प्रकाशित हुआ । उसके बाद , तो आपके छोटे – बड़े ग्रन्थ बराबर प्रकाशित होते रहे , जिनकी कुल संख्या 52 है । इनमें मौलिक काव्य – कृतियों के अलावा इनकी अनुदित रचनाएँ भी हैं ।

आपन ‘ मधुप ‘ उपनाम से विरहणी ब्रजांगना , प्लासी का युद्ध और मेघनाद वध नामक बंगला काव्य कृतियों का पद्यानुवाद किया । संस्कृत के कुछ नाटकों का भी अनुवाद किया तथा उमर खय्याम की रुवाइयों का हिन्दी रूपान्तर किया।  पंचवटो , द्वापर , वैतालिक , अनघ , नहुष , सिद्धराज , विकट भट तथा विष्णुप्रिया . गुप्तजी की प्रसिद्ध काव्य – कृतियाँ हैं । भारत – भारती , जयद्रथ वध , साकेत , यशोधरा ,

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मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि  के रूप में-

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : राष्ट्रीय भावना और भारतीय संस्कृति के प्रति अविचल निष्ठा आपकी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं । गुप्तजी कहीं भी हों , कुछ भी लिख रहे हों , ये दोनों भाव सर्वत्र मुखरित हैं , गुप्तजी की प्रथम राष्ट्रीय रचना है । ‘ भारत – भारती ‘ , जो सन् 1912 में प्रकाशित हुई ।  उसके द्वारा गुप्तजी ने देशवासियों का ध्यान भारत के अतीत के गौरव एवं वर्तमान की दुर्दशा की ओर आकृष्ट करके पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त होने की प्रेरणा प्रदान की । उसके बाद ‘ वैतालिक ‘ के गीतों द्वारा आपने एक सच्चे वैतालिक के रूप में भारतवासियों की मोह निद्रा भंग की और उन्हें प्रगति की ओर उन्मुख किया ।


Maithilisharan Gupta biography : राष्ट्रीयता द्वारा समस्त रचनाओं के ओतप्रोत होने के कारण सन् 1936 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गुप्तजी को ‘ राष्ट्रकवि ‘ की उपाधि से विभूषित किया । काशी में आयोजित एक भव्य समारोह में उपाधि प्रदान करते हुए बापू ने कहा था कि वह राष्ट्र के कवि हैं , उसी प्रकार , जिस प्रकार राष्ट्र के बनाने से मैं महात्मा बन गया हूँ ।

मैथिलीशरण गुप्त का काव्य – सौष्ठव

काव्य – सौष्ठव – आचार्य पं . रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में गुप्तजी की रचनाओं के भीतर तीन अवस्थाएँ लक्षित होती हैं । प्रथम अवस्था भाषा की सफाई की है , जिसमें खड़ी बोली के पद्यों की मसृण – बंध रचना हमारे सामने आती है । ‘ सरस्वती ‘ में प्रकाशित अधिकांश कविताएँ तथा ‘ भारत – भारती ‘ इस काल की रचनाओं के उदाहरण हैं , ये रचनाएँ काव्य प्रेमियों को कुछ गद्यवत रूखी और इतिवृत्तात्मक लगती हैं ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : इनमें सरस कोमल पदावली की कमी भी खटकती थी । बात यह है कि यह खड़ी बोली के परिमार्जन का काल था । इसके अनन्तर गुप्तजी ने बंग भाषा की कविताओं का अनुशीलन तथा मधुसूदन दत्त रचित ब्राजांगना , मेघनाद वध आदि का अनुवाद भी किया । इससे इनकी पदावली में बहुत सरसता और कोमलता आई ।

भारत भारती ‘ और ‘ वैतालिक ‘ के बीच की रचनाएँ इसी दूसरी अवस्था के उदाहरणस्वरूप ली जा सकती हैं । इसके उपरान्त ‘ छायावाद ‘ कही जाने वाली कविताओं का चलन हुआ और गुप्तजी का कुछ झुकाव प्रगीत मुक्तकों ( Lyrics ) और अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्र्य की ओर भी हो जाता है । इस झुकाव का आभास ‘ साकेत ‘ और ‘ यशोधरा ‘ में भी पाया जाता है ।

गुप्तजी की काव्य – प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है –

Maithilisharan Gupta biography : गुप्तजी की काव्य – प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य – प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति , समाज के दलित , शोषित , पतित एवं निम्न वर्ग की समानता एवं प्रतिष्ठा के लिए गुप्तजी की यह पुकार सुनिए उत्पन्न हो तुम प्रभु पदों से जो सभी का ध्येय है । तुम हो सहोदर सुरसरी के चरित जिसके योग्य है ।

Maithilisharan Gupta biography :  ‘ द्वापर ‘ में गुप्तजी ने नारी की महत्ता का प्रतिपादन किया है तथा ‘ यशोधरा ‘ में उसकी दुर्दशा पर आँसू बहाए अवला जीवन , हाय ! तुम्हारी यही कहानी । आँचल में है दूध और आँखों में पानी ।।

Maithilisharan Gupta biography :  ‘ पंचवटी ‘ में वह पशु – जगत् को विकास क्रम में मनुष्य का छोटा भाई कहते हैं । मैं मनुष्यता को सुरत्व की सीढ़ी भी कह सकता हूँ , किन्तु पतित को पशु कहना भी कभी नहीं सह सकता हूँ ॥ गुप्तजी जगत् और जीवन के व्यक्त क्षेत्र में महत्व और सौन्दर्य का दर्शन करने वाले तथा अपने प्रभु राम को लोक के बीच अधिष्ठित करने वाले कवि हैं । यद्यपि गुप्तजी श्रीराम के भक्त थे , तथापि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा गौतम बुद्ध के प्रति भी पूर्ण आदर भाव व्यक्त किया है ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : गुप्तजी ने विभिन्न काव्यों में भारत के अतीत का गौरवगान गाया है तथा पौराणिक एवं ऐतिहासिक विभूतियों का ही मुख्यतः अंकन किया है । इसी कारण उनकी प्रवृत्ति प्रायः प्रबन्ध काव्य – रचना की ओर रही । ‘ साकेत ‘ और ‘ यशोधराइनके प्रसिद्ध प्रबन्ध काव्य हैं , गुप्तजी के समस्य काव्य – सृजन की एक विशिष्ट उपलब्धि यह है कि उनकी विभिन्न रचनाओं में कुछ ऐसे मनोरम गीत उभरे हैं , जो पाठक एवं श्रोता को बहुत समय तक याद बने रहते हैं , इन गीतों में पर्याप्त तन्मयता पाई जाती है ।

एक उदाहरण देखिए सौ बार धन्य वह जिस जननी ने है तथा एक लाल की माई , जना भरत – सा भाई ! यह सच है तो लौट चलो घर भैया अपराधिन है तात तुम्हारी मैया । आदि ( आठवाँ सर्ग , साकेत ) आचार्य द्विवेदी के प्रभाव के कारण गुप्तजी शृंगार – वर्णन में बहुत सावधान रहे हैं । उनका शृंगार – वर्णन तुलसी के समान मर्यादित और सीमित रहा है । यथा रुदन का हँसना ही तो गान । गा – गा कर रोती है , मेरी हृत्तन्त्री की तान  छेड़ो न वे लता के छाले , उड़ जाएगी धूल ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : हलके हाथों प्रभु के अर्पण कर दो उसके फूल ॥ पहले आँखों में थे , मानस में कूद मग्न प्रिय अब थे । छींटे वही उड़े थे , बड़े – बड़े अश्रु वे कब थे ? एक समालोचक के शब्दों में , “ आधुनिककाल के कवियों में गुप्तजी का क्षेत्र सबसे अधिक व्यापक एवं विस्तृत रहा है । उन्होंने अपने युग की लगभग सभी काव्यधाराओं शैलियों , धार्मिक – सांस्कृतिक समस्याओं तथा समस्त विषयों एवं काव्य – रूपों को अपनाया है । पी कारण उन्हें युग का प्रतिनिधि और राष्ट्रकवि कहा जाता रहा है । उन्होंने काव्य के प्राचीन

मैथिलीशरण गुप्त के कुछ काव्य रचनाएँ

Maithilisharan Gupta biography : विषयों को द्विवेदीयुगीन नैतिकता का जामा पहनाकर नए मानवतावादी रूप में प्रस्तुत किया , राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित होकर देश के अतीत का गौरवगान किया और देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ , ग्लानि और आक्रोश प्रकट किया । कवीन्द्र रबीन्द्र ने मानवतावाद से प्रभावित हो करुणा , त्याग आदि के गीत गाए ।

सूरदास की गोपियाँ वियोग में कहती हैं कि –
मधुवन ! तुम कत रहत हरे ?
बिरह – वियोग स्यामसुन्दर के काहे न उकाठि परे ?

पर गुप्तजी की उर्मिला कहती हैं कि –
रह चिर दिन तू हरी भरी ,
बढ़ , सुख से बढ़ सृष्टि सुन्दरी ।

गांधीवाद का प्रभाव ग्रहण कर उन्होंने साम्प्रदायिक एकता , सत्य और अहिंसा का प्रतिपादन किया । यथा –

जय कबीर , नानक , दादू का , बापू का वाणी- विश्राम
नव – नव रूप पुराण पुरुष उन लीलाधाम राम का नाम

गांधीजी द्वारा प्रवर्तित सत्याग्रह की प्रशंसा करते हुए कवि ने लिखा है कि

सत्याग्रह है कवच हमारा , कर देखो कोई भी वार ।
हार मानकर शत्रु स्वयं ही यहाँ करेंगे मित्राचार |

गणतन्त्र की पद्धति के प्रति उनका विश्वास देखिए

वे ही हम , जो बुद्धि निधान ,
करते हैं गणतन्त्र – विधान ॥

गुप्तजी की यह एक बहुत बड़ी विशेषता रही कि वह अपने समय की परिवर्तित होती रहने वाली परिस्थितियों के प्रति बहुत जागरूक रहते थे और उनके अनुसार बदलती हुई भावनाओं के अनुरूप काव्य – सृजन करते चलते थे । इसी कारण उनके काव्य में भारतेन्दु युग , द्विवेदी युग तथा छायावाद के युग के काव्य की अधिकांश विशेषताएँ मिल जाती हैं ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : इतना ही नहीं , उनके काव्य में प्रगतिवाद की छाया तथा ‘ नई कविता ‘ के प्रवाह को गति प्रदान करने वाली कतिपय रचनाएँ भी मिल जाती हैं । पं . रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में , ” भारतेन्दु के समय से स्वदे प्रेम की भावना जिस रूप में चली आ रही थी , उसका विकास ‘ भारत – भारती ‘ में मिलता है । ” प्राचीन के प्रति पूज्य भाव व्यक्त करने वाले भारतेन्दुकालीन स्वदेश – प्रेम की यह अभिव्यक्ति देखिए

क्षत्रिय ! सुनो अब तो कुयश की कालिमा को मेंट दो ।
निज देश को जीवन सहित तन मन तथा धन भेंट दो ।
वैश्यों ! सुनो व्यापार सारा मिट चुका है देश का ।
सव धन विदेशी हर रहे हैं , पार है क्या क्लेश का ।

( भारत – भारती )

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay: प्रकृति वर्णन की काव्य परम्परा में जितनी शैलियाँ प्रचलित हैं , उन सब पर गुप्तजी ने प्रकृति के वर्णन लिखे हैं , छायावादी शैली पर प्रकृति के मानवीकृत आलंकारिक रूप का यह  वर्णन दृष्टव्य है-

सखि , नील , नभस्सर से उतरा यह हंस अहा तरता तरता । अब तारक मौक्तिक शेष नहीं निकला जिनको चरता चरता । अपने हिमबिन्दु बचे तब भी चलता उनको धरता धरता ।
गड़ जाएँ न कंटक भूतल के , कर डाल रहा डरता डरता ।

प्रकृति – वर्णन में आधुनिक ढंग की ध्वन्यात्मकता देखिए-

सखि , निरख नदी की धारा
ढलमल ढलमल चंचल अंचल , झलमल झलमल तारा ।
निर्मल जल अंतस्थल भरके , उछल उछल कर छल – छल करके ।
थल – थल तरके कल कल घर के बिखराती है पारा ।

उपसंहार


Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : इधर राजनीतिक आन्दोलनों ने जो रूप धारण किया , उसका पूरा आभास गुप्तजी की पिछली रचनाओं में मिलता है। सत्याग्रह , अहिंसा , मनुष्यत्ववाद , विश्व – प्रेम , किसानों और श्रम – जीवियों के प्रति प्रेम एवं सम्मान आदि सबकी झलक हम पाते हैं ।

Maithilisharan Gupta biography : कहने का तात्पर्य यह है कि गुप्तजी के काव्य में हमें धर्म , समाज , राजनीति तथा साहित्य प्रत्येक प्रकार की युगानुकूलता के दर्शन होते हैं । कार्ल मार्क्स के लोक कल्याणकारी सहानुभूति व्यक्त की है विचारों का विवेचन करते हुए गुप्तजी ने मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद के प्रति भी अपनी धन रूपी फल का परिश्रम ही मूल है ।

Maithilisharan Gupta biography : किन्तु श्रमिकों को फल मिलता है कितना पूँजीपतियों को नहीं है जूठन भी जितना । महानता का रहस्य – गुप्तजी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं । प्रतिक्रिया का प्रदर्शन अथवा मद में झूमने जैसी प्रवृत्तियों से वे कोसों दूर दिखाई देते हैं ।

Maithilisharan Gupta ka jiwan parichay : सब प्रकार की उच्चता एवं श्रेष्ठता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त था . प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों के दर्शन इनके काव्य में पग – पग पर होते हैं . अपनी कालानुसारिणी प्रतिभा के कारण ही गुप्तजी युग के प्रतिनिधि कवि एवं राष्ट्रकवि कहे जाते थे।

FAQ

मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य में स्थान क्या है?

रामैथिलीशरण गुप्त का साहित्य में राष्ट्रकवि का सम्मान जनक स्थान हैं। रष्ट्रीयता द्वारा समस्त रचनाओं के ओतप्रोत होने के कारण सन् 1936 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने गुप्तजी को ‘ राष्ट्रकवि ‘ की उपाधि से विभूषित किया ।

मैथिलीशरण गुप्त का परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं का वर्णन कीजिए

आधुनिक काल के हिन्दी कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है । वह हमारे राष्ट्रीय कवि हैं । मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव ( जिला झाँसी , उत्तर प्रदेश ) में सन् 1883 में हुआ । आपके पिताजी का नाम सेठ रामचरण था , जो एक सम्पन्न वैश्य थे । गुप्तजी की काव्य – प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य – प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति , समाज के दलित , शोषित , पतित एवं निम्न वर्ग की समानता एवं प्रतिष्ठा के लिए गुप्तजी की यह पुकार सुनिए उत्पन्न हो तुम प्रभु पदों से जो सभी का ध्येय है ।

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य की मूल संवेदना क्या है ?

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य की मूल संसंवेदना -आचार्य पं . रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में गुप्तजी की रचनाओं के भीतर अवस्थाएँ लक्षित होती हैं । अवस्था भाषा की सफाई की है , जिसमें खड़ी बोली के पद्यों की मसृण – बंध रचना हमारे सामने आती है । ‘ सरस्वती ‘ में प्रकाशित अधिकांश कविताएँ तथा ‘ भारत – भारती ‘ इस काल की रचनाओं के उदाहरण हैं , ये रचनाएँ काव्य प्रेमियों को कुछ गद्यवत रूखी और इतिवृत्तात्मक लगती हैं ।

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं बताये।

साकेत ‘ और ‘ यशोधरा ‘ इनके प्रसिद्ध प्रबन्ध काव्य हैं ,

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म स्थान बताये।

चिरगाँव ( जिला झाँसी , उत्तर प्रदेश )

मैथिलीशरण गुप्त की 6 कविता बताये।

1.साकेत
2.यशोधरा
3.भारत – भारती,
4.विरहणी ब्रजांगना ,
5.प्लासी का युद्ध और
6.मेघनाद वध

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय और रचनाएँ बताये।

परिचय-आधुनिक काल के हिन्दी कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है । वह हमारे राष्ट्रीय कवि हैं । मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव ( जिला झाँसी , उत्तर प्रदेश ) में सन् 1883 में हुआ । आपके पिताजी का नाम सेठ रामचरण था , जो एक सम्पन्न वैश्य थे ।
रचनाएँ-साकेत ” यशोधरा ‘ भारत – भारती,विरहणी ब्रजांगना , प्लासी का युद्ध और मेघनाद वध