Madanlal Dhingra jiwan parichay
Madanlal Dhingra jiwan parichay


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Madanlal Dhingra : अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा

जिस आजादी का आस्वाद आज हम प्राप्त कर रहे हैं वह अनेकानेक परम देशभक्तों के असीम बलिदान एवं काफी जद्दोजहद का ही परिणाम है और इन्हीं असंख्य परम देशभक्त बलिदानियों में से एक प्रमुख बलिदानी थे – मदनलाल धींगरा .

अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा  का जन्म कहाँ हुआ था?

Madanlal Dhingra jiwan parichay – भारत की स्वतंत्रता हेतु अपने प्राण न्यौछावर कर देने वाले भारत – भारती के इस अमर सपूत का जन्म अमृतसर ( पंजाब ) के एक सम्पन्न खत्री परिवार में हुआ था । पंजाब विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् उच्च शिक्षा की प्राप्ति हेतु वे इंगलैण्ड गए । उनके माता – पिता की इच्छा थी कि वे उच्च शिक्षित होनहार बालक बनकर घर वापस आएं , परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था । धीं

गरा लंदन की गगनचुम्बी इमारतों एवं कोलाहलपूर्ण परिवेश में कुछ और ही सोच रहे थे । भारत में अंग्रेजों के व्यापक अत्याचारों के विरुद्ध कार्य करने की भावना उनके हृदय में उमड़ जाती थी । वे वीर सावरकर द्वारा लंदन में स्थापित इण्डिया हाउस में आने – जाने लगे , फलतः खुफिया विभाग उनके पीछे पड़ गया ।

वहाँ की खुफिया पुलिस की रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि धींगरा घण्टों अकेले बैठकर फूलों का निरीक्षण किया करते थे । ऐसी दशा में वहाँ की खुफिया पुलिस के अनुसार वे या तो , कवि थे अथवा क्रांतिकारी . कर्जन वायली उन दिनों ‘ इण्डिया हाउस ‘ निवासी भारतीयों की जासूसी करता था । उसने देशभक्तों की नाक में दम कर रखा था ।

उसी के संकेत पर लन्दन इंजीनियरिंग कॉलेज के अंग्रेज छात्रों ने मदनलाल धींगरा के कोट में लगा शहीदों की स्मृति का प्रतीक स्वरूप वैज नोच लेने का दुष्प्रयास किया था । इस प्रयास में अंग्रेज छात्र यद्यपि रहे , परन्तु मातृभूमि के इस महान् सपूत ने इस अपमान का बदला लेने का दृढ़ कर लिया ।

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महान् क्रांतिकारी विनायक सावरकर से भेंट


Madanlal Dhingra : संयोग से इसी दौरान उनकी भेंट महान् क्रांतिकारी विनायक दामोदर असफल निश्चय सावरकर से हुई । सावरकर से अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा , “ मैं शीघ्र ही अपने राष्ट्र की स्वत्रंतता हेतु अपने जीवन की आहुति देना चाहता हूँ , परन्तु मेरी आहुति विदेशियों का तख्त उलटने हेतु क्रांति चाहती है मुझे शस्त्र उठाने की आज्ञा प्रदान कीजिए ” और उपर्युक्त घटना का उल्लेख करते हुए उनके ( वीर सावरकर ) समक्ष यह प्रण किया ,

” मैं इस दुष्ट कर्जन वायली को मौत के घाट उतार दूँगा , जिसने मेरे राष्ट्र के क्रांति के प्रतीक को मेरे कोट से अलग करने का आदेश दिया ।” सावरकर को ऐसे ही वीर युवकों की आवश्यकता थी । उन्होंने मदनलाल के नेत्रों में दहकते अंगारों के दृष्टिगत उनके धैर्य , साहस , सहनशीलता एवं दृढ़ता के परीक्षण हेतु उन्हें अपने हाथ पृथ्वी पर जमा देने का आदेश दिया और ऐसा होते ही उन्होंने उनके हाथ पर लोहे का मोटा सुआ चुभाते हुए हाथ के आर – पार पहुँचा दिया ।

धींगरा की मुखाकृति पर कोई विपरीत चिह्न नहीं था । उनकी दृढ़ता और आत्मबल को देखकर वीर सावरकर आश्चर्यचकित हो उठे । परीक्षा समाप्त हो चुकी थी । गुरु एवं शिष्य दोनों एक – दूसरे से मिलकर प्रेम – विभोर हो उठे । इन्हीं दिनों भारत में कई क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई । इससे मदनलाल के सीने में आक्रोश एवं प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी , लेकिन कर्जन वायली को मारने का उनका संकल्प एक ऐसी भीष्म प्रतिज्ञा थी , जिसे पूरा करने हेतु उन्होंने एक क्रमबद्ध रणनीति बनाई ।

नाम मदनलाल ढींगरा
जन्म18 सितंबर 1883
जन्म स्थानअमृतसर ( पंजाब )
कर्जन वायली को गोली 8 जून , 1909 मारे
पिता का नाम दित्तामल
धर्महिन्दू
उच्च शिक्षाइंग्लैण्ड
मदनलाल को जीवन यापनश्रमिक, तांगा-चालक, क्लर्क
मृत्यु स्थानपेंटविले जेल, लन्दन uk
मृत्यु / फांसी17 अगस्त 1909
Madanlal Dhingra jiwan parichay
Madanlal Dhingra : कर्जन वायली को मारने की भीष्म प्रतिज्ञा


Madanlal Dhingra : 26 जनवरी , 1909 में उन्होंने ‘ गमेज ‘ कम्पनी से लन्दन में ही कोल्ट रिवाल्वर खरीदा और ‘ मोले ‘ नामक एक अंग्रेज से निशानेबाजी सीखने लगे । उनके प्रत्येक निशाने में कर्जन वायली का चेहरा रहता था । अतिशीघ्र वे एक पक्के निशानेबाज बन गये ।

अपनी कूट योजना के तहत् उन्होंने न केवल भारतीयों को अंग्रेज भक्त एवं भारत के प्रति गद्दार बनाने वाली संस्था ‘ इण्डियन नेशनल एसोसिएशन ‘ की सचिव एमा जोसेफाइन से , अपितु अपने लक्ष्य कर्जन वायली से भी मित्रता स्थापित कर ली । भारत मंत्री के अंगरक्षक कर्जन वायली के बारे में कहा जाता था कि वह भारत मंत्री से भी अधिक क्रूर है और उसी की नीति के कारण देशभक्त भारतीयों का अधिक दमन किया है जा रहा है । इसी कारण से धींगरा ने भारत मंत्री की अपेक्षा वायली को ही अपने उद्देश्य की पूर्ति का लक्ष्य बनाया ।

मदनलाल ने निश्चय किया कि वे 8 जून , 1909 को कर्जन वायली को मौत के घाट उतार देंगे , परन्तु 8 जून को ही गोरी सरकार के काले चेहरे का एक और घिनौना कृत्य सामने आया।

काले पानी की सजा | इण्डियन नेशनल एसोसिएशन

Madanlal Dhingra jiwan parichay : राजद्रोह और देशभक्ति से अनुप्राणित कविताएँ रचने के जुर्म में विनायक सावरकर के भाई गणेश विनायक सावरकर की सम्पूर्ण सम्पत्ति को जब्त कर अंग्रेज सरकार ने उन्हें काले पानी की सजा दे दी । इससे उनके हृदय में प्रतिशोध की भावना अत्यन्त तीव्र हो गई , परन्तु इस आघात के कारण वे कर्जन वायली को उस दिन दण्ड देने में सफल नहीं हो सके ।

इस घटना के पश्चात् शीघ्र ही मदनलाल धींगरा के उदास नेत्रों में अचानक चमक , तब उत्पन्न हो गई । जब उन्हें ज्ञात हुआ कि 1 जुलाई , 1909 को ‘ इण्डियन नेशनल एसोसिएशन ‘ के वार्षिकोत्सव में कर्जन वायली भी सम्मिलित हो रहा है । उन्होंने निश्चय किया कि यही उचित अवसर है , जब वह अपने प्रण को पूर्ण कर सकते हैं ।

1 जुलाई की संध्या को वे निशानेवाजी के क्लब में उपस्थित हुए और वहाँ जमकर अभ्यास किया । उस दिन उनके सभी निशाने अचूक रहे . क्लब से लौटकर मदनलाल ने सूट पहनकर अपने सिर पर आसमानी रंग का साफा बाँधा . आँखों पर काले रंग का चश्मा , कोट की दोनों जेबों में भरे हुए रिवाल्वर ,साथ में दो चाकू भी रख लिए ।

देश के शत्रु को धराशायी करने के उद्देश्य से यह जाँवाज क्रान्तिकारी लंदन के इम्पीरियल हाउस पहुँच गया । जहाँ जहाँगीर हॉल में इण्डियन नेशनल  एसोसिएशन का वार्षिकोत्सव सम्पन्न हो रहा था का ” वहाँ वार्षिक अधिवेशन के सिलसिले में अत्यधिक चहल – पहल थी।
 

Madanlal Dhingra : इस सुअवसर पर समारोह में अधिकांश व्यक्ति आमंत्रित थे। जिसमें भारत मंत्री लॉर्ड मार्ले राजनीतिक अंगरक्षक सर कर्जन वायली भी भाग लेने हेतु सपत्नीक पधारा था । सर्वत्र हास्य एवं प्रसन्नता का वातावरण था । सबकी आँखें रंगारंग कार्यक्रमों पर जमी थीं । लेकिन मदनलाल धींगरा की आँखें अपने लक्ष्य कर्जन वायली को ढूँढ़ रही थीं , कर्जन वायली रात्रि 10 बजे समारोह में उपस्थित हुआ ।


Madanlal Dhingra jiwan parichay
मदनलाल और कर्जन वायली की मित्रता :Madanlal Dhingra jiwan parichay

Madanlal Dhingra jiwan parichay : मदनलाल ने उससे पहले से ही मित्रता गाँठ रखी थी । इस बात का लाभ उठाते हुए वे कर्जन वायली के अत्यन्त निकट पहुँच गए । इस समय संघ के वार्षिकोत्सव का कार्यक्रम सानन्द समाप्त होने वाला था और सभी अतिथि हँसी – खुशी के साथ वापस जाने लगे थे , तभी मदनलाल ने कर्जन वायली के कान में कुछ कहने हेतु संकेत किया ।

अपनी मौत से बेखबर मदान्ध कर्जन वायली ने अपना कान मदनलाल धींगरा के मुँह की ओर सटा दिया . अपना खौलता खून शांत करने हेतु मदनलाल धींगरा के पास इससे बेहतरीन मौका और क्या हो सकता था ? उन्होंने अपनी जेब से रिवाल्वर निकालकर कर्जन वायली के सीने से सटा दिया और ताबड़तोड़ तीन गोलियाँ उसके सीने में उतार दीं । अचानक धाँय – धाँय की ध्वनि से हॉल का समस्त वातावरण अशांत हो उठा और लोग अपनी जान बचाने हेतु इधर – उधर भागने लगे . मदनलाल इस पर भी शांत नहीं हुए ।

उन्होंने जमीन पर छटपटाते हुए कर्जन वायली के चेहरे को रिवाल्वर की तीन गोलियों से विकृत कर दिया । इतने में ही उसका शैडो ‘ कावसजी लालक्का ‘ नाम का भारतीय पारसी , मदनलाल को दबोचने के लिए आगे बढ़ा , लेकिन इन नरसिंह ने उस गद्दार के सीने में भी रिवाल्वर की आखिरी गोली उतार दी । भारत माँ के इस सपूत की प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी थी । थोड़ी ही देर में यह समाचार तेजी से फैल गया कि कर्जन वायली की हत्या एक भारतीय ने कर दी ।

चतुर्दिक यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि ऐसा कौनसा वीर , निडर एवं उत्साही भारतीय है जिसने लंदन में आकर एक अंग्रेज की और वह भी भारत मंत्री के अंगरक्षक की हत्या कर डालने की हिम्मत की ? किस माई के लाल ने ऐसा किया है और उसका उद्देश्य क्या था ? उन्होंने ( मदनलाल धींगरा ) यह कार्य मुख्य रूप से गणेश विनायक सावरकर को आजन्म काला पानी तथा कन्हाई लाल दत्त को फाँसी की सजा दिए जाने का अविलम्व प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से किया था ।


अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा की गिरफ्तारी – Madanlal Dhingra


Madanlal Dhingra jiwan parichay : उन्होंने अपने हाथ उठा दिए और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया । इस कठिन बेला में भी यह वीर शान्त होकर मुस्करा रहा था । यहाँ तक कि जब डॉक्टर ने उनका चेकअप किया , तो उनकी धड़कनों और नाड़ी की गति सामान्य पाकर एवं इस क्रान्तिकारी की दिलेरी देखकर स्वयं डॉक्टर के ही हाथ – पाँव काँपने लगे थे । अगले दिन लंदन के सभी समाचार पत्र कर्जन वायली की हत्या के समाचारों से भरे पड़े थे ।

भारत ही नहीं , वरन् विदेश स्थित भारतीय क्रांतिकारियों में मदनलाल धींगरा के इस लोमहर्षक एवं हैरतअंगेज कारनामे से प्रसन्नता की एक लहर दौड़ गई । कहाँ तो अन्य क्रांतिकारियों के पिताओं की भाँति मदनलाल के पिता का भी सीना गर्व से ऊँचा उठ जाता ,

लेकिन अंग्रेज परस्त डॉ . साहिब दत्ता ने अपना बयान लन्दन भेजा कि मैं मदनलाल को अपने पुत्र के रूप में अस्वीकार करता हूँ , उसने मेरे नाम को कलंकित किया है । इस प्रकार का कायराना वयान उनके अंग्रेज ने भी दिया , ” मदनलाल ने बहुत बड़ा गुनाह किया है , मेरा उससे कोई सम्बन्ध नहीं है . ” लेकिन , परिवार वालों की इन कायराना वातों से क्या होता है ।

माँ ने अपने इस महान् सपूत को अपने आँचल में छुपा लिया था । मदनलाल जैसी संतान पैदा करके भारत माता की कोख धन्य हो उठी थी । सर्वत्र मदनलाल धींगरा पर अदालत में मुकदमा चलाया गया । मामला चलने से धींगरा के इस कार्य का विरोध होने लगा । लन्दन में आयोजित विपिन पाल की अध्यक्षता में इस कार्य की निन्दा करने के लिए सभा आहूत की गई , लेकिन सम्बन्धित सभा में वीर सावरकर ने प्रस्ताव पास होने से पूर्व खड़े होकर उच्च स्वरों में कहना प्रारम्भ किया ।

” धींगरा का मामला विचाराधीन है , इसलिए धींगरा की किसी प्रकार से निन्दा न की जाय , क्योंकि उससे मुकदमे पर प्रभाव पड़ेगा । ” सावरकर अभी वोल ही रहे थे कि एक अंग्रेज ने उन्हें एक घूँसा लगाया और बोला , “ जरा अंग्रेजी घूँसे का मजा ले लो , देखो कैसा ठीक बैठता है ।

” अभी अंग्रेज यह बात कह ही रहा था कि एक भारतीय ने उस अंग्रेज की खोपड़ी पर एक डंडा लगाते हुए कहा ‘ जरा इसका मजा ले लो . यह हिन्दुस्तान का डंडा है । इतना होने पर सभा में भगदड़ मच गई और कोई प्रस्ताव पास न हो सका । इस मामले की प्राथमिक सुनवाई 10 जुलाई , 1909 को ‘ वेस्ट मिनिस्टर पुलिस कोर्ट में हुई ।

Madanlal Dhingra का बयान मे क्या कहा?

पुलिस कोर्ट में धींगरा ने अपने बयान में कहा , “ व्यक्तिगत वचाव हेतु मुझे कुछ नहीं कहना है , परन्तु मेरा कार्य न्यायपूर्ण है , यह सिद्ध करने हेतु मुझे कुछ कहना है । अपने प्रकरण में मुझे यही कहना है कि मुझे पकड़ने कैद करने एवं फाँसी की सजा देने का अधिकार ब्रिटिश अदालत को है , ऐसा मैं नहीं मानता ।

इसीलिए मैंने अपने बचाव हेतु कोई वकील खड़ा नहीं किया . ” ओल्ड वेली के प्रसिद्ध कोर्ट में इसकी जाँच हुई और 23 जुलाई को यह मामला सेशन कोर्ट को सौंप दिया गया । इससे पूर्व 22 जुलाई को जेल में वीर सावरकर ने मदनलाल से भेंट की  यह एक ऐतिहासिक मौन मिलन था । 23 जुलाई को मुख्य न्यायाधीश के सम्मुख मामला चला . जूरी ने अपने निर्णय में कहा कि हत्या जानबूझ कर की गई है ।

अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा का जज को बयान


Madanlal Dhingra jiwan parichay : अतएव मदनलाल दोषी हैं , किन्तु जज ने अपना निर्णय सुनाने के पूर्व मदनलाल से पूछा , ‘ तुझे कुछ कहना है ? ‘ तब मदनलाल ने जो बयान दिया , वह इस प्रकार है ” ओह ! मुझे कुछ नहीं कहना है . ऐसा प्रश्न मुझसे पूछने का तुमको अधिकार है . यह बात मुझे मान्य नहीं . यह वात मैं तुमसे पहले ही कह चुका हूँ . जो तुम चाहो , मेरा कर सकते हो . तुम्हारी इच्छा हो , तो तुम मुझे फाँसी पर लटका सकते हो , परन्तु तुम्हारा यह कार्य पूर्णरूप से गैर कानूनी होगा , लेकिन मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं , आज गोरे लोग सर्वशक्तिमान हैं ,

परन्तु ध्यान रखो – कभी तुम्हारा संध्याकाल आएगा , उस समय यदि हम् सत्ताधीश और सवल हुए , और कुछ नहीं कहना है , ” , तो हमारी जो इच्छा होगी , वही तुम्हारा करेंगे । इससे अधिक मुझे ” ” मैंने उस दिन एक अंग्रेज को जान से मार देने की चेष्टा की थी वह मुझे स्वीकार है , किन्तु यह सव इसलिए था कि अंग्रेज सरकार जिस पशुता से भारतीय देशभक्तों को प्राण दण्ड देती । उसका एक छोटा – सा बदला ले सकूँ , इसमें न किसी की सलाह की आवश्यकता थी और न किसी से पूछने की जरूरत ।

अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा की अंतिम इच्छा क्या थी?


Madanlal Dhingra : मेरी अन्तरात्मा ने मुझे अपना कर्तव्यपालन करने हेतु उत्साहित किया और मैंने कर डाला . ” अन्त में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई . स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर अपनी रक्तांजलि अर्पित करने वाले इस नौजवान से जब जेल के अधिकारियों ने पूछा कि तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है ? तब उन्होंने दहाड़ते हुए कहा , “ मेरी इच्छा यही है कि मैं बार – बार इसी मातृभूति में जन्म लेता रहूँ और कर्जन वायलियों को मार – मारकर फाँसी के फन्दे पर चढ़ता रहूँ और तव तक ऐसा होता रहे , जब तक कि मानवता की सेवा व ईश्वर के गौरव हेतु मातृभूमि को स्वतन्त्र न करा लूँ ।

अमर शहीद क्रांतिवीर मदनलाल धींगरा की मृत्यु कैसे हुई?

Madanlal Dhingra : ” 17 अगस्त , 1909 को उन्हें फाँसी दी जानी थी . 1 अगस्त को उन्होंने अपना वक्तव्य दिया , जो अगले दिन लन्दन के प्रमुख समाचार पत्र ‘ द डेली न्यूज ‘ की सुर्खियाँ बन गया – “ हिन्दू होने के नाते मैं यह विश्वास करता हूँ कि मेरे देश के प्रति किया गया अपराध ईश्वर का अपमान है । मेरी मातृभूमि का कार्य ही भगवान राम का कार्य है ।

मातृभूमि की सेवा ही भगवान श्रीकृष्ण की सेवा है । मुझ जैसे धनहीन और बुद्धिहीन व्यक्ति के पास अपने रक्त के अतिरिक्त मातृभूमि को समर्पित करने हेतु और क्या था ? इसी कारण मैं मातृदेवी पर अपनी रक्तांजलि अर्पित कर रहा हूँ । ” – 17 अगस्त , 1909 की प्रातः बेला आयी और मदनलाल सूर्य की प्रथम किरणों के प्रस्फुटन के साथ ही सोकर जागे ।

Madanlal Dhingra jiwan parichay : यह भौतिक संसार की आपकी आखिरी नींद थी । उन्होंने सुन्दर पोशाक पहनी और नाश्ता करके लन्दन की ‘ पैंटोन विले ‘ जेल के फाँसी के तख्त पर निर्भय प्रसन्न मुख होकर पहुँचे । उस समय उन्होंने कहा था – “ मेरे जैसा धनहीन और कम पढ़ा – लिखा आदमी इस देश ( भारत ) के लिए और कर ही क्या सकता है ? सिवाय इसके कि अपना प्राण दे दे . ” और फिर मृत्युपाश चुपचाप अपने गले में डाल ली । उनकी लाश जेल में ही दफना दी गई ।

मृत्यु से पूर्व धींगरा की तीन इच्छाएँ | Madanlal Dhingra jiwan parichay

मृत्यु से पूर्व धींगरा ने तीन इच्छाएँ प्रकट की थीं-

” मेरी अंत्येष्टि संस्कार हिन्दू रीति से किया जाए ,

मेरे शव को कोई अहिन्दू और मेरे सम्बन्धी स्पर्श न करें और

मेरे कमरे में बची पुस्तकों और कपड़ों को नीलाम करने से जो धनराशि प्राप्त हो , उसे लन्दन स्थिति राष्ट्रीय निधि में दे दी जाए . ” अदालत ने उनकी ये इच्छाएँ अमान्य कर दी थीं ।

Madanlal Dhingra jiwan parichay : निष्कर्ष

Madanlal Dhingra भारत के एक महान क्रांतिकारी थे। Madanlal Dhingra का नाम भारत मे वर्सो तक याद किया जायेगा। Madanlal Dhingra jiwan parichay हम भारत वाशी कभी नही भूल सकते है। ये वे महान स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने देश के लिए मर मिटने से पीछे नही हटे। Madanlal Dhingra की याद हम सभी देशवासियों को आयेगी।

Madanlal Dhingra से जुड़े कुछ सवाल?

मदनलाल धींगरा को फांसी कब हुई?

17 अगस्त 1909

मदनलाल धींगरा का जन्म कब हुआ?

18 सितंबर 1883

मदनलाल धींगरा का स्मारक कहाँ है?

स्मारक : अजमेर में रेलवे स्टेशन के ठीक सामने है।

कर्नल वायली कौन था?

कर्ज़न वायली केसी सीवीओ एक ब्रिटिश भारतीय सेना अधिकारी थे,