Kumar Gandharva biography in hindi
Kumar Gandharva biography in hindi

Kumar Gandharva biography in hindi | कुमार गन्धर्व जीवन परिचय | kumar gandharva songs,

कुमार गन्धर्व जीवन परिचय

Kumar Gandharva biography  : जो स्वच्छन्दता समाज सुधार की दृष्टि से कवीर में हिन्दी कविता की दृष्टि से महाकवि निराला में और धार्मिक दृष्टि से रजनीश में अवलोकित होती है , वैसी ही स्वच्छन्दता संगीत की दृष्टि से कुमार गन्धर्व में थी । कुमार गन्धर्व ने संगीत को सामन्ती रूढ़ियों के पाश से मुक्त कर उसे परम्परा और घराने की जकड़न से मुक्त किया । संगीत जगत् में उनका महत्व श्रोताओं को आकर्षित करने के कारण नहीं , अपितु इसी विशिष्ट योगदान के कारण था ।

Kumar Gandharva biography : वह जरूरत के मुताबिक पुरानी लीक से हटकर नवीनता को अधिक महत्व देते थे । गायकी के मृतप्रायः तत्वों को उखाड़ने का उन्होंने आजीवन प्रयास किया गायन पर वर्ग विशेष की बपौती को उन्होंने अस्वीकार कर दिया था । उन्होंने संगीत के क्षेत्र में परम्पराओं को अस्वीकार कर दिया । वह राग का अपने ढंग से गाते थे । उनमें अपने ढंग से ही उतार – चढ़ाव करते थे । वह प्रायः कहा करते थे कि जिस तरह आधुनिक कवि कविता करते समय किसी छन्द के बन्धन में नहीं रहता और चित्रकार की चित्र निर्माण के समय बन्धनमुक्त रहता है ।


कुमार गन्धर्व का जन्म कब और कहाँ हुआ?

कुमार गन्धर्व जीवन परिचय  : उसी प्रकार संगीत को भी आवरणमुक्त रखना समय की आवश्यकता है , इसलिए संगीतज्ञ को भी पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए । शास्त्रीय संगीत के इस पुरोधा का जन्म 8 अप्रैल , 1924 को कर्नाटक के बेलगाँव जिले में सुलेभावी में हुआ था । बचपन में उनका नाम शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकालीमठ था ।

कोमकाली नाम पड़ने का कारण उनके परिवार का कोमकाली मठ से जुड़ा होना था । कोमकाली मठ शैव उपासना से सम्बन्धित था । मठाधीश परिवार से सम्बन्धित होने के कारण मठों में उनका आवागमन होता रहता था । जब वह केवल 6 वर्ष के थे , तभी तत्कालीन शास्त्रीय संगीत के स्तम्भ अब्दुल्ला करीम खाँ , उस्ताद सयाज खाँ , पं . ओंकारनाथ , सवाई गन्धर्व , बड़े गुलाम अली तथा केसरबाई के गायन की हू – ब – हू नकल करने लगे थे ।

Kumar Gandharva biography : जब वह अब्दुल्ला करीम खाँ की ‘ पिया बिन नाहीं , आवत चैन ‘ गाते थे , तो यह अन्तर कर पाना सम्भव नहीं था कि यह आवाज अब्दुल्ला करीम की है या बालक कुमार गन्धर्व की । कुमार गन्धर्व नाम पड़ने के बारे में यह कहा जाता है कि जब वह 6 वर्ष के थे , तो मठ के एक पुरोहित स्वामी शिवयोगी उनका एक गीत सुनकर मंत्रमुग्ध हो उठे और बात बात में उनके मुख से कुमार गन्धर्व निकल पड़ा और कालान्तर में वह इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। संगीत की दुनिया में कुछ कर गुजरने की अभिलाषा ने उन्हें कर्नाटक से बम्बई पहुँचा दिया ।

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नामकुमार गन्धर्व
जन्म8 अप्रैल , 1924
जन्म स्थानकर्नाटक के बेलगाँव जिले में सुलेभावी
मृत्यु12 जनवरी , 1992
मृत्यु स्थानउम्र (67) देवास, भारत
बचपन का नामसिद्धरामैया कोमकालीमठ
माता-पिता का धर्मशिव धर्म के
कार्यकाल1934-1992
सम्मानपद्म भूषण ,पद्म विभूषण,अली खाँ पुरस्कार देने
उपाधिविक्रम विश्वविद्यालय से उन्हें डी . लिटू . की मानद उपाधि
प्रसिद्धभारतीय शास्त्रीय संगीत ,हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
कार्यसंगीत का निर्माण करना
पुस्तकअनूपराग विलास
गुरुपं . बी . आर . देवधर
Kumar Gandharva biography in hindi

कुमार गन्धर्व  का शिक्षा और बीमारी

Kumar Gandharva biography in hindi :जहाँ पर  पं . बी . आर . देवधर ने उनकी विलक्षणता से प्रभावित होकर उन्हें 11 वर्ष तक संगीत की विधिवत् शिक्षा दी। गुरु के आदेश के कारण ही भिण्डी बाजार घराने की सुप्रसिद्ध गायिका श्रीमती अंजनीबाई मालपेकर से भी उन्होंने संगीत सीखना शुरू किया  । उन्होंने नीलकान्त बुवा से भी शिक्षा ग्रहण की । शास्त्रीय गायकों की नकल से संगीत की दुनिया में उनका प्रवेश उन्हें एक ऐसे साध्य पर ले गया , जहाँ शास्त्रीय संगीत , लोक संगीत से मिलकर शिखर पर पहुंच गया ।

Kumar Gandharva biography : वर्ष 1947 से 1952 तक फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त रहने के कारण उनके जीवन के ये वर्ष उनके लिए विशेष दुःखदायी रहे । वर्ष 1948 में स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से मालवा जाकर  देवास में बस गए । देवास में उनके एक शिष्य डॉक्टर तथा धर्मपत्नी भानुमती की सेवा से वह स्वस्थ हो गए । देवास में इस अवधि में उन्होंने मालवा के लोकगीतों एवं धुनों का अध्ययन किया । देवास में पड़ा उनका कदम उन्हें संगीत की यह ऊँचाई प्रदान करेगा , सम्भवतः इसकी कल्पना भी उन्होंने न की होगी ।

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कुमार गन्धर्व का योगदान और लेखन कार्य

Kumar Gandharva biography : यहाँ पर उन्होंने लगभग 250 धुने और 11 नए राग तैयार किए । नए रागों में राग मालवती मधसुरजा , लग्न – गन्धार , सहेली , तोड़ी , बेहद भैरव , गांधी मल्हार और संजरी अत्यधिक प्रसिद्ध हैं , देवास को संगीत का केन्द्र बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1956 में उन्होंने वहाँ पर ‘ कुमार संगीत अकादमी ‘ की स्थापना की तथा अपने नए रागों को अमर करने की दृष्टि से वर्ष 1965 में रागों पर आधारित अनूपराग विलासनामक पुस्तक भी लिखी । वह किसी परम्परा के अनुयायी नहीं थे ।

Kumar Gandharva biography : समय के साथ परम्परा को तोड़ने के पक्षधर थे तथा नई परम्पराओं को जन्म देने का प्रयास करते थे । नई परम्परा के सृजन जैसी विशिष्टता के कारण वह अपने समय के अधिकांश महान् गायकों से पृथक् दिखलाई पड़ते थे । वह नव सृजन के हिमायती , क्रान्तिकारी कवि कबीर को अपने सबसे निकट मानते थे और इसी कारण उन्होंने कबीर के ही पद सबसे अधिक गाए ।

कुमार गन्धर्व के पसंदिता कवि कौन थे?

Kumar Gandharva biography in hindi : कबीर की तरह ही दुनिया की परवाह किए बिना वह अपना पथ प्रशस्त करते रहे । उनकी इस प्रवृत्ति के कारण कुछ लोगों ने उन्हें ‘ विद्रोही संगीतज्ञ ‘ और ‘ संगीत के विरोधी ‘ संज्ञा से अभिहीत किया , तो कुछ लोगों ने उन्हें ‘ साहसी एवं क्रान्तिकारी संगीतज्ञ ‘ कहा । कुछ लोगों के अनुसार वह परम्परा , राग विरोधी थे । वह राग नहीं , सप्तक गाते थे ।

हिन्दुस्तानी शैली में कर्नाटक संगीत गाते थे , किन्तु राग के उतार – चढ़ाव से श्रोता को बेवकूफ बनाते थे । संगीतशास्त्र का शास्त्रत्व समाप्त करने की खाकर ही वह इस क्षेत्र में प्रविष्ट हुए थे । वह विरोधियों के इन आरोपों पर रंचमात्र ध्यान दिए बिना अपने पथ पर अग्रसर रहे और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा , किन्तु जब हम उनके बारे में गम्भीरता से विचार करते हैं , तो ये सब आरोप अनर्गल प्रतीत होते हैं ।

यदि किसी बनी बनाई लीक पर न चलना दोष है , तो वह दोषी थे , किन्तु , चूँकि नवसृजन की क्षमता सबमें नहीं होती , इसलिए अक्षम्य लोगों ने उन पर इस प्रकार के आरोप लगाए । उनके बचपन के साथी राहुल वारपुते ने उनका सटीक मूल्यांकन करते हुए लिखा है , “ कुमार गन्धर्व के गायन से ही हम सबने यह जाना कि शास्त्रीय संगीत लोकसंगीत के मानसरोवर से ही निकलता है ।

कुमार गन्धर्व का मृत्यु कब हुआ?



Kumar Gandharva biography : उनके संगीत की सबसे बड़ी विशेषता स्वरों और रागों की शुद्धि नहीं , बल्कि उनमें संगीत की जड़ों का उपस्थित होना है । ” उन्होंने अपने समय के अभिजात्य संगीत को परिवर्तित कर जन – संगीत का निर्माण किया । संगीत जगत् में अपने इन योगदानों से चर्चित कुमार गन्धर्व के सांसारिक जीवन का अन्त 12 जनवरी , 1992 को हुआ ।

कुमार गन्धर्व इस दुनिया से चले गए , किन्तु विरासत में दुनिया को शास्त्रीय संगीत की विपुल सम्पदा दे गए हैं । उनके द्वारा प्रदत्त अक्षय पूँजी से संगीत की दुनिया सदैव मण्डित होती रहेगी । उनके निधन पर साहित्य और संगीत का आदर करने वाले तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ . शंकरदयाल शर्मा ने अपने शोक संदेश में यह कहा था कि ” कुमार गन्धर्व ने भारतीय संगीत , विशेषकर संत कबीर के पदों को अमर कर दिया ।

निष्कर्ष तथा कुमार गन्धर्व का सम्मान

Kumar Gandharva biography : उनका संगीत भारतीय संस्कृति और भक्ति संगीत का अनुपम संगम है । वह महान् कलाकार अपने द्वारा छोड़ी गई विरासत से अपनी उपस्थिति का आभास इस दुनिया को सदा कराता रहेगा । अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमार गन्धर्व एक बार कुछ सुन लेते थे , तो उन्हें याद हो जाता था जिसके कारण हर घराने की बारीकियों से वह भिन्न थे । मालवा के लोक संगीत का भी उन पर अच्छा प्रभाव था ।

इन सबने संगीत की दुनिया में उन्हें जो ऊँचाई प्रदान की , उसे कुछ लोगों द्वारा अस्वीकार करने पर भी उसका महत्व कम नहीं होता । कबीर , सूर , तुलसी और मीरा पर उन्होंने जो कार्य किया है , उसके लिए इतिहास उन्हें भुला नहीं सकता । कुछ घराने के लोगों को छोड़कर संगीत के संसार ने उन्हें जो प्यार दिया , वह अकथ्य है । सरकार ने भी उनके मूल्यांकन में कंजूसी नहीं दिखाई ।

Kumar Gandharva biography : भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से अलंकृत किया , तो मध्य प्रदेश सरकार ने कालिदास सम्मान से उन्हें सुशोभित किया । वर्ष 1973 में विक्रम विश्वविद्यालय से उन्हें डी . लिटू . की मानद उपाधि भी मिली थी । उन्हें हाफिज अली खाँ पुरस्कार देने की घोषणा भी हो चुकी है । यद्यपि वह किसी सम्मान या उपाधि के अभिलाषी नहीं थे ,
किन्तु किसी प्रकार का सम्मान ऐसी विभूतियों को देना सम्मान को ही आदर देना है । संगीत में नवसृजन के पक्षधर सचमुच वह शास्त्रीय संगीत के कबीर थे जिन्हें शास्त्रीय संगीत कभी भुला नहीं सकता । निःस्सन्देह उनके निधन से शास्त्रीय संगीत को अपूर्णीय क्षति हुई है ।

कुमार गंधर्व गीत | kumar gandharva songs

  • सुनता है गुरु ज्ञानी – कबीर
  • अवधूत, कुदरत की गत न्यारी – कबीर
  • जिनी जिनी बिनी चड़रिया – निर्गुण भजन
  • कबीर भजन राग कल्याण
  • आपके बुलावा और नैना ना माने मोरा और पिया बसेरा घर आलि
  • ये टू मैन लेरीतराना टीन
  • उथी उथी गोपाल
  • रूणानुबंधच्यये हो रे श्याम और बउआ बनी अयो – पं.कुमार गंधर्व
  • बेगी पियाको मोरा इटानो संदेसा और चतुरंग गानो गुना सब मिल्का
  • अवधूत युगन युगन हम योगी
  • उड़ जाएगा हंस अकेला
  • निर्भय निर्गुण रे गाऊंगा
  • भर – ऐसो कैसो आयो
  • चैती भूप – नी मोरी का – पं कुमार गंधर्व
  • अवधूत गगन घट – भजन – पं.  कुमार गंधर्व
  • गुरुजी म्हाने दार लागे
  • गुरा तो जिनाउ कलंदर केशव

FAQ

किसने कुमार संगीत अकादमी की स्थापना किया?

कुमार गन्धर्व जी ने।

कुमार गन्धर्व जी ने कुमार संगीत अकादमी कब स्थापित किया?

1956

कुमार गन्धर्व को कुमार गन्धर्व नाम किसने दिया और क्यों?

पुरोहित स्वामी शिवयोगी उनका एक गीत सुनकर मंत्रमुग्ध हो उठे और बात बात में उनके मुख से कुमार गन्धर्व निकल पड़ा और कालान्तर में वह इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।