jaishankar prasad ka jivan parichay
jaishankar prasad ka jivan parichay

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जयशंकर प्रसाद सामान्य परिचय –

jaishankar prasad ka jivan parichay : प्रसादजी ने अपनी आत्म कथा में अपने जीवन की कथा और व्यथा दोनों की अभिव्यक्ति बहुत ही मार्मिक ढंग से की है , यथा छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ । क्या यह अच्छी नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ । सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा । अभी समय भी नहीं , थकी सोई है मेरी मौन व्यथा ॥

jaishankar prasad ka jivan parichay : प्रसादजी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ , जहाँ ‘ सोने के कटोरे में दूध – भात खाते हैं ‘ वाली लोकोक्ति चरितार्थ होती है। 47 वर्ष के छोटे से जीवन में उन्होंने जो अनेक बड़े – बड़े काम किए , उनकी कथा सचमुच बहुत बड़ी है , उनके ऊपर जो विपत्तियाँ पड़ीं , उनकी चर्चा जितनी कम की जाए , उतना ही अच्छा है ।

जयशंकर प्रसाद का जन्म कब और कहां हुआ?

jaishankar prasad ka jivan parichay : सन् 1890 में काशी के प्रसिद्ध सुँधनी साहु के परिवार में जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ । आपके पिताश्री का नाम श्री देवकी प्रसाद था और माता जी का श्रीमती मुन्नी देवी था। लगभग 11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य रचना आरम्भ कर दी थी । 17 वर्ष की अवस्था तक इनके पिता , माता व बड़े भाई का देहान्त हो गया और परिवार का समस्त उत्तरदायित्व इनके सुकुमार कन्धों पर आ गया ।

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय चार्ट

जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली और रचनाएँ

नामजयशंकर प्रसाद
जन्मसन् 1890
मृत्यु स्थान(उम्र 47) वाराणसी, भारत
जन्म स्थानकाशी के प्रसिद्ध सुँधनी साहु के परिवार में
मृत्यु14 नवम्बर , 1937
माता-पिताबाबू देवकी प्रसाद-श्रीमती मुन्नी देवी
रचनाएँआँसू ’ ‘ कामायनी ‘
योगदानकवि के रूप में
कार्यकाल1920 से सन् 1936
शिक्षाकाशी में क्वींस कालेज
प्रसिद्धि छायावाद के श्रेष्ठ कवि के रूप में
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jaishankar prasad ka jivan parichay : गुरुवर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए एवं अनेकानेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त 14 नवम्बर , 1937 को आपका देहावसान हुआ। काव्य सम्पदा- प्रसादजी की रचनाएँ सन् 1907-08 में सामयिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं । ये रचनाएँ ब्रज भाषा की पुरानी शैली में थीं । जिनका संग्रह ‘ चित्राधार ‘ में हुआ । सन् 1913 में वह खड़ी बोली में लिखने लगे ।

प्रसादजी ने पद्य और गद्य दोनों में साधिकार रचनाएँ लिखीं । उनका वर्गीकरण इस प्रकार
( क ) काव्य – ( 7 ) कानन कुसुम , प्रेम पथिक , महाराणा का महत्व , झरना , आँसू , लहर और कामायनी ( महाकाव्य ) ।

( ख ) नाटक – इन्होंने कुल मिलाकर 13 नाटक लिखे . इनके प्रसिद्ध नाटक ये हैं चन्द्रगुप्त , स्कन्दगुप्त , अजातशत्रु , जनमेजय का नागयज्ञ , कामना और ध्रुवस्वामिनी ।

( ग ) उपन्यास ( 3 ) कंकाल , तितली और इरावती ।

( घ ) कहानी- प्रसादजी की विविध कहानियों के पाँच संग्रह हैं- छाया , प्रतिध्वनि , आकाशदीप , आँधी और इन्द्रजाल ।

( ङ ) निबन्ध- प्रसादजी ने साहित्य के विविध विषयों से सम्बन्धित निबन्ध लिखे जिनका संग्रह है – काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध ।

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प्रसाद- छायावाद के श्रेष्ठ कवि –

jaishankar prasad ka jivan parichay : छायावाद हिन्दी कविता के क्षेत्र का एक आन्दोलन है जिसकी अवधि सन् 1920 से सन् 1936 तक मानी जाती है । छायावाद एक आदर्शवादी काव्यधारा है , जिसमें वैयक्तिकता , रहस्यात्मकता , प्रेम , सौन्दर्य तथा स्वच्छन्दतावाद की सबल अभिव्यक्ति हुई है। संगीतात्मकता , ध्वन्यात्मकता , कोमलकान्त पद – विन्यास , लाक्षणिकता , मानवीकरण तथा प्रतीकात्मकता इसके कला पक्ष की विशेषताएँ हैं ।

‘ प्रसाद ‘ के अतिरिक्त छायावाद के प्रमुख कवि हैं-
  • सुमित्रानन्दन पंत ,
  • सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘ निराला ‘ तथा
  • महादेवी वर्मा ,
  • डॉ . रामकुमार वर्मा तथा
  • ‘ दिनकर ‘ ने भी छायावादी प्रवृत्ति की रचनाएँ प्रस्तुत की ।

jaishankar prasad ka jivan parichay : ‘ प्रसादजी ’ छायावाद के जन्मदाता मान जाते हैं । प्रसादजी की ‘ आँसू ‘ नाम की कृति के साथ हिन्दी में छायावाद का जन्म हुआ ।
आँसू का प्रतिपाद्य है – विप्रलम्भ शृंगार , प्रियतम के वियोग की पीड़ा वियोग के समय आँसू बनकर वर्षा की भाँति उमड़ पड़ती है जो घनीभूत पीड़ा थी स्मृति भी नभ में छाई । दुर्दिन में आँसू बन कर वह आज बरसने आई ॥

jaishankar prasad ka jivan parichay : प्रसादजी के काव्य में छायावाद अपने पूर्ण प्रकर्ष पर दिखाई देता है , यथा – सौन्दर्य निरूपण एवं शृंगार भावना , प्रकृति प्रेम , मानवतावाद , प्रेम भावना , आत्माभिव्यक्ति , प्रकृति पर चेतना का आरोप , वेदना और निराशा का स्वर , देश – प्रेम की अभिव्यक्ति , अमांसल सौन्दर्य का वर्णन , तत्व – चिन्तन , आधुनिक बौद्धिकता , कल्पना का प्राचुर्य रहस्यवाद की मार्मिक अभिव्यक्ति अन्यत्र इंगित छायावाद की कलागत विशेषताएँ अपने तथा उत्कृष्टतम् रूप में इनके काव्य में उभरी हुई दिखाई देती हैं ।

jaishankar prasad ka jivan parichay : ” ‘ छायावाद ‘ के प्रबल आलोचक पं . रामचन्द्र शुक्ल ने भी विकास किया । ‘ हिन्दी साहित्य का इतिहास ‘ में प्रसाद की छायावादी शैली की दाद दी है , ” प्रसादजी में ऐसी मधुमयी प्रतिभा और ऐसी जागरूक भावुकता अवश्य थी कि उन्होंने इस पद्धति का अपने ढंग पर बहुत ही मनोरम ‘ आँसू ’ से लेकर ‘ कामायनी ‘ तक

प्रसाद की शृंगार – भावना का विश्लेषण प्रस्तुत हुए शुक्लजी ने कहा है कि ” इस प्रकार लहर में में हम प्रसादजी को वर्तमान और अतीत जीवन की प्रकृत ठोस भूमि पर अपनी कल्पना ठहराने का प्रयास करते पाते हैं । ” और अन्त करते में वह कहते हैं कि “ इस प्रकार प्रसादजी प्रवन्ध – क्षेत्र में भी छायावाद की चित्र प्रधान और लाक्षणिक शैली की सफलता की आशा बँधा गए हैं ।

जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ का विशेषता

jaishankar prasad ka jivan parichay :  ” ‘ आँसू ‘ मानवीय विरह का एक प्रबन्ध काव्य है । इसमें स्मृतिजन्य मनोदशा एवं प्रियतम के अलौकिक रूप सौन्दर्य का मार्मिक वर्णन किया गया है । ‘ लहर ‘ आत्मपरक प्रगीत मुक्तक है जिसमें कई प्रकार की कविताओं का संग्रह है ।

प्रकृति के रमणीय पक्ष को लेकर सुन्दर और मधुर रूपकमय यह गीत ‘ लहर ‘ में संग्रहीत है बीती विभावरी जागरी । अम्बर पनघट में डुवो रही ।। तारा – घट ऊषा नागरी आदि । ‘ प्रसाद ‘ की सर्वाधिक महत्वपूर्ण काव्य रचना है- कामायनी महाकाव्य , जिसमें प्रतीकात्मक शैली पर मानव चेतना के विकास का काव्यमय निरूपण किया गया है । आचार्य शुक्ल के शब्दों में , ” यह काव्य बड़ी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से पूर्ण है ।

इसके विचारात्मक आधार के अनुसार श्रद्धा या रागात्मिकता वृत्ति ही मनुष्य को इस जीवन में शांतिमय आनन्द का अनुभव कराती है । वहीं उसे आनन्द धाम तक पहुँचाती है , जबकि इड़ा या बुद्धि आनंद से दूर भगाती है । ” अन्त में कवि ने इच्छा , कर्म और ज्ञान तीनों के सामंजस्य पर बल दिया है , यथा ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है । इच्छा पूरी क्यों हो मन की ? एक दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना जीवन की । गद्यकार प्रसाद गद्यकार प्रसाद की सर्वाधिक ख्याति नाटककार के रूप में है ।

जयशंकर प्रसाद का देश प्रेम

jaishankar prasad ka jivan parichay : उन्होंने गुप्तकालीन भारत को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत करके गांधीवादी अहिंसामूलक देशभक्ति का संदेश दिया है। साथ ही अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों का सफल चित्रण किया है । नारी की स्वतन्त्रता एवं महिमा पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है ।

प्रत्येक नाटक का संचालन सूत्र किसी नारी पात्र के ही हाथ में रहता है । उपन्यास और कहानियों में भी सामाजिक भावना का प्राधान्य है । उनमें दाम्पत्य प्रेम के आदर्श रूप का चित्रण किया गया है । उनके निवन्ध विचारात्मक एवं चिन्तन प्रधान हैं जिनके माध्यम से प्रसाद ने काव्य और काव्य – रूपों के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं ।

उपसंहार

jaishankar prasad ka jivan parichay उपसंहार– पद्य और गद्य सभी रचनाओं में उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित हिन्दी है । उनकी शैली आलंकारिक एवं साहित्यिक है । कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी गद्य – रचनाओं में भी उनका छायावादी कवि हृदय झाँकता हुआ दिखाई देता है । मानवीय भावों और आदर्शों में उदात्तवृत्ति का सृजन विश्व – कल्याण के प्रति उनकी विशाल – हृदयता क सूचक है ।

jaishankar prasad ka jivan parichay : हिन्दी साहित्य के लिए प्रसाद की यह बहुत बड़ी देन है . ‘ प्रसाद ‘ की रचनाओं में छायावाद पूर्ण प्रौढ़ता , शालीनता , गुरुता और गम्भीरता को प्राप्त दिखाई देता है । अपनी विशिष्ट कल्पना शक्ति , मौलिक अनुभूति एवं नूतन अभिव्यक्ति पद्धति के फलस्वरूप प्रसाद छायावादी काव्य धारा में मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित है ।

FAQ

जयशंकर प्रसाद की माता का नाम क्या था?

माता श्रीमती मुन्नी देवी

जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली क्या थी?

ब्रज भाषा की पुरानी शैली और सन् 1913 में वह खड़ी बोली में लिखने लगे ।

जयशंकर प्रसाद का जन्म कहां हुआ ?

काशी के प्रसिद्ध सुँधनी साहु के परिवार में

जयशंकर प्रसाद ने कब से काव्य लिखना आरंभ किया?

11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य रचना आरम्भ कर दी थी