ishwar chandra vidyasagar in hindi
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ishwar chandra vidyasagar paragraph : ईश्वर चंद्र विद्यासागर आधुनिक भारत के पहले शिक्षाविद थे।  वह देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर सांख्यिकी के पहले संग्रहकर्ता थे, लड़कियों की साक्षरता की वकालत करने वाले पहले और अर्थव्यवस्था पर शिक्षा के प्रभाव को मापने के लिए सर्वेक्षण करने वाले पहले व्यक्ति थे। 

उन्हें भारत में पहले स्कूल भवन, देश में पहला पेशेवर स्कूली शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान और देश में पहला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, विद्यासागर कॉलेज का श्रेय भी दिया जाता है।  उन्हें अक्सर भारत में आधुनिक शिक्षा के पिता के रूप में जाना जाता है, और देश में शिक्षा प्रणाली को काफी हद तक उनकी दृष्टि और प्रयासों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

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पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर  का पेशा क्या- क्या था?


ishwar chandra vidyasagar in hindi:  ईश्वर चंद्र विद्यासागर एक भारतीय चिकित्सक, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के संस्थापक थे।  वह सामाजिक न्याय के कट्टर समर्थक थे और उन्होंने अपने चिकित्सा ज्ञान और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल गरीबों और दलितों की सेवा के लिए किया। 

उन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने काम के माध्यम से, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में आम आदमी के स्वास्थ्य में सुधार के प्रयासों के लिए जाना जाता है।  उन्होंने महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की भी वकालत की और लैंगिक समानता के प्रबल समर्थक थे।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर आधुनिक भारत के पहले शिक्षाविद् थे।  वह देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर सांख्यिकी के पहले संग्रहकर्ता थे, लड़कियों की साक्षरता की वकालत करने वाले पहले और अर्थव्यवस्था पर शिक्षा के प्रभाव को मापने के लिए सर्वेक्षण करने वाले पहले व्यक्ति थे। 

उन्हें भारत में पहले स्कूल भवन, देश में पहला पेशेवर स्कूली शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान और देश में पहला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, विद्यासागर कॉलेज का श्रेय भी दिया जाता है।  उन्हें अक्सर भारत में आधुनिक शिक्षा के पिता के रूप में जाना जाता है, और देश में शिक्षा प्रणाली को काफी हद तक उनकी दृष्टि और प्रयासों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की भेंट श्री रामकृष्ण परमहंस से कब हुई?

ishwar chandra vidyasagar in hindi  : यह बात पं . ईश्वरचन्द्र के लिए एक महान् उपलब्धि थी कि स्वयं श्री रामकृष्ण परमहंस ने भी उन्हें ‘ विद्यासागर ‘ की उपाधि से सुशोभित किया था । 5 अगस्त , 1882 को पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की भेंट श्री रामकृष्ण परमहंस से हुई । उन्हें देखते ही देखते परमहंसजी ने कहा –

“ वाह ! आज तो आखिरकार मैं महासागर में आ ही गया । इससे पहले मैंने केवल नहर , दलदल और नदी को ही देखा था , पर आज महासागर से मेरी मुलाकात हो गयी । ” पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी काफी विनोदप्रिय थे । उन्होंने भी मजाक से कहा , थोड़ा – सा खारा पानी भी साथ ले जाइए । ‘ “ तो फिर ” ” रामकृष्ण परमहंस ने तुरन्त मुस्करा कर जवाब दिया , “ ओह ! खारा पानी कैसे ? नहीं ! खारा पानी नहीं हो सकता । आप तो अज्ञान के समुद्र नहीं हो । आप विद्या के सागर हो , गाढ़े दूध का महासागर हो ।

ishwar chandra vidyasagar paragraph | ishwar chandra vidyasagar in hindi
नामईश्वरचन्द्र विद्यासागर
जन्म26 सितम्बर , 1820
जन्म स्थानपश्चिम बंगाल के मेदनीपुर जिले के वीरसिंह
माता-पिता भगवती देवी, ठाकुरदास बन्धोपाध्याय ( बनर्जी )
पुस्तकबेताल पंचारिमसती,बांग्लार इतिहास
सदस्यएशियाटिक सोसायटी
पढाईकलकत्ता
मृत्यु29 जुलाई , 1891
मृत्यु के कारणहृदयरोग
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पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?


ishwar chandra vidyasagar in hindi : “ ज्ञान का सागर , विद्यासागर का जन्म 26 सितम्बर , 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर जिले के वीरसिंह ( वीरसिंघा ) नामक गाँव में हुआ था । माता भगवती देवी तथा पिता ठाकुरदास बन्धोपाध्याय ( बनर्जी ) की वे पहली सन्तान थे । विद्यासागर उनकी उपाधि थी ।

इस शब्द का अर्थ है ‘ ज्ञान का सागर ‘ । उनकी असाधारण विद्या तथा उपलब्धियों को देखते हुए ही संस्कृत महाविद्यालय ने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी थी । बाद यह उपाधि समाप्त हो गई थी । वैसे अब भी जब हम विद्यासागर कहते हैं जब उसका अर्थ केवल पं . ईश्वरचन्द्र वन्धोपाध्याय की उपाधि से ही होता है । हालांकि उसके बाद भी संस्कृत महाविद्यालय के कुछ छात्रों को यह उपाधि दी गई थी ।

(ishwar chandra vidyasagar in hindi)परन्तु विद्यासागर के नाम लोकप्रियता मिली । केवल पं . ईश्वरचन्द्र को ही पाँच वर्ष की आयु में ही उन्हें गाँव की पाठशाला में पढ़ाई के लिए भेजा गया । पाठशाला की पढ़ाई उन्होंने मात्र तीन वर्ष में ही पूरी कर ली । उनके शिक्षकों के लिए यह एक आश्चर्य की बात थी । अतः पाठशाला के शिक्षकों ने यही सलाह दी कि बालक ईश्वरचन्द्र को अंग्रेजी शिक्षा के लिए कलकत्ता भेजा जाए ।

पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर पढाई के लिए कहाँ गये?

ishwar chandra vidyasagar in hindi : वीरसिंघा से कलकत्ता की दूरी 60 किमी थी । इस दूरी को बीच रास्ते में पत्थरों पर पैदल चलकर पार करते अंकित अंकों को मात्र पढ़ते हुए तीन दिन में हुए ही उन्होंने वे कलकत्ता पहुँचे । इसी अंग्रेजी के अंकों को सीख लिया । कलकत्ता पहुँचने से पहले ही अंग्रेजी के अंकों में इतनी दक्षता हासिल कर ली कि सभी आश्चर्यचकित रह गए । प्रारम्भ में एक पाठशाला में बंगाली माध्यम से तीन माह तक उन्होंने पढ़ाई की ।

उसके वाद यह प्रश्न उठा कि उन्हें किस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए ? अंग्रेजी या संस्कृत की , परन्तु आखिरकार उन्हें संस्कृत महाविद्यालय में ही दाखिल कराया गया । इस कॉलेज में संस्कृत तथा अंग्रेजी दोनों ही प्रकार के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी , जबकि हिन्दू कॉलेज में केवल पश्चिमी शिक्षा ही दी जाती थी ।

अतः हिन्दू कॉलेज में उन्हें दाखिल नहीं कराया गया । जून , 1829 से दिसम्बर , 1841 तक ईश्वरचन्द्र संस्कृत कॉलेज के ही विद्यार्थी रहे । अपनी पढ़ाई या इस अवधि में पं . ईश्वरचन्द्र ने अनेक विशिष्टताएँ प्राप्त कर लीं । ढेर सारे पुरस्कार तथा छात्रवृत्तियाँ भी प्राप्त की । उन्होंने भारतीय साहित्य के विभिन्न पक्षों जैसे व्याकरण , काव्यशास्त्र , दर्शन- वेद वेदान्त , न्याय – शास्त्र , खगोलशास्त्र , कर्मकाण्ड – विधि तथा साहित्य के विभिन्न आयामों का गहन अध्ययन किया ।

पाठ्यक्रमों के अन्त में त्रैमासिक परीक्षाएँ होती थीं । स्मृति को छोड़कर सभी विषयों में ईश्वरचन्द्र ने प्रथम स्थान प्राप्त किया । स्मृति में भी उन्हें दूसरा स्थान मिला।

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हिन्दू विधि अधिकारी पद के लिए ईश्वरचन्द्र विद्यासागर  को कब चुना गया?

ishwar chandra vidyasagar in hindi : 1 अप्रैल , 1839 में उन्हें हिन्दू विधि अधिकारी के पद के लिए चुन लिया गया । उनका प्रमुख काम था विभिन्न न्यायालयों से सम्बद्ध यूरोपीय न्यायाधीशों के समक्ष हिन्दू कानून को स्पष्ट करना , परन्तु जब तक संस्कृत कॉलेज में उनका अध्ययन पूरा नहीं हुआ था । अतः पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्होंने नौकरी का प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया ।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का विवाह कब और किसके साथ हुआ?

ishwar chandra vidyasagar in hindi : इसी छात्र जीवन के दौरान उनका विवाह 14 वर्ष की आयु में दीनोमयी देवी से हो गया । पढ़ाई पूरी करने के एक माह के अन्दर ही ईश्वरचन्द्र की नियुक्ति कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज के मुख्य पंडित के रूप में हो गई । लगभग 4 साल तक ईश्वरचन्द्र ने इस कॉलेज में 50 रुपए मासिक वेतन पर बांग्ला अध्यापक का काम किया ।

इसी बीच उन्होंने अंग्रेजी भाषा के अपने ज्ञान को और आगे बढ़ाया । ईश्वरचन्द्र ने अप्रैल 1846 में , संस्कृत कॉलेज के सहायक सचिव का कार्यभार सँभाल लिया । अपने ही कॉलेज में नियुक्ति होने से विद्यासागर काफी प्रसन्नचित्त हो गए ।

फोर्ट विलियम कॉलेज में उनके द्वारा खाली किए गए पद पर उनके छोटे भाई की नियुक्ति की गई । जब संस्कृत कॉलेज में उनके आवेदन पत्र को फोर्ट विलियम कॉलेज के सचिव ने अग्रसारित किया , तो उसमें यह बात भी लिख दी कि , ” मेरी समझ में विद्यासागर के पास असाधारण शैक्षिक योग्यताएँ हैं ।

वे अत्यन्त परिश्रमी , बेहतर प्रबन्धक , बुद्धिमान तथा चरित्रवान् भी हैं । ” उन्होंने , संस्कृत कॉलेज में कार्य करते हुए , अंग्रेजी शिक्षा के साथ – साथ संस्कृत शिक्षा की उपयोगिता पर एक नोट तैयार किया ।

ishwar chandra vidyasagar in hindi : इससे विद्यार्थियों को शैक्षिक सत्र में तैयारी के लिए काफी सहायता मिली । परन्तु कॉलेज के सचिव रूशोमी दत्ता ने उनकी मेहनत पर पानी फेरते हुए उनकी योजना को नामंजूर कर दिया । फलस्वरूप उन्होंने संस्कृत कॉलेज से त्यागपत्र दे दिया । उन्होंने संस्कृत कॉलेज में लगभग 1 साल नौकरी की तथा स्वाभिमान को ठेस पहुँचते ही तुरन्त पद छोड़ दिया ।

इसके लिए हालांकि उन्हें आर्थिक समस्या का भी सामना करना पड़ा । लगभग डेढ़ वर्ष वे बेरोजगार रहे । इसी बीच उन्होंने संस्कृत प्रेम तथा बांग्ला कितावों वे प्रतिष्ठान उनकी आय का प्रमुख स्रोत भी बने रहे , परन्तु इस आय का उपयोग उन्होंने का प्रकाशन किया । बाद में इन दोनों प्रतिष्ठानों की स्थिति अच्छी हुई विकास के साथ – साथ समाजसेवी संस्थाओं को चलाने के लिए ही किया ।

बेताल पंचारिमसती और बांग्लार इतिहास नामक पुस्तक किसने लिखा था?

ishwar chandra vidyasagar in hindi  : ईश्वरचन्द्र ने इसी अवधि में ‘ बेताल पंचारिमसती ‘ नामक पुस्तक की रचना की  फोर्ट विलियम कॉलेज में यह पुस्तक बांग्ला की पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है । उसके बाद उन्होंने ‘ बांग्लार इतिहास ‘ ( बंगाल का इतिहास ) नामक पुस्तक की रचना की भारत में नवयुवकों के लिए यह एक आदर्श पुस्तक थी । फोर्ट विलियम कॉलेज में ही मार्च 1849 में ईश्वरचन्द्र की नियुक्ति फोर्ट विलियम कॉलेज के हेडराइटर तथा खजांची के पद पर हुई ।

उसके बाद दिसम्बर 1950 मे , पुनः संस्कृत कॉलेज में ही उन्हें बुलाया गया । अब संस्कृत साहित्य के प्राध्यापक के पद पर काम करते हुए उन्होंने संस्कृत कॉलेज की कार्यप्रणाली पर एक रिपोर्ट तैयार की । इस रिपोर्ट में उन्होंने सुधार के भी कई उपायों का सुझाव दिया ।

जनवरी 1851 में उन्हें ₹ 150 मासिक वेतन पर इसी कॉलेज के आचार्य पद पर नियुक्ति दी गई । साथ ही उन्हें कॉलेज के सभी मामलों पर पूरे अधिकार भी प्रदान किए गए । ईश्वरचन्द्र ने 1853 में , अपने पैतृक गाँव वीरसिंघा में एक निःशुल्क विद्यालय की स्थापना की । उन्हें 1854 में परीक्षक बोर्ड की सदस्यता दी गई । सन् 1855 में उन्हें अतिरिक्त स्कूल निरीक्षक नियुक्त किया गया ।

उन्होंने 1855 में कलकत्ता में नॉर्मल स्कूल की भी स्थापना की। अध्यापकों को मॉडल स्कूलों के लिए प्रशिक्षित करने के लिए बाद में ऐसे और स्कूलों की स्थापना उन्होंने अपने अधीन दूसरे जिलों में भी की । उन्होंने स्त्रियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1849 में कलकत्ता फीमेल स्कूल की स्थापना की । एक दयालु समाजसेवी अंग्रेज बेथुन ने इस स्कूल को संरक्षण प्रदान किया तथा ईश्वरचन्द्र ने सचिव की भूमिका निभाई ।

ईश्वरचन्द्र ने अपने अधीन जिलों में 35 विद्यालयों की शुरूआत की । कन्याओं के प्रति माता – पिता के कर्त्तव्यों का सही निर्वाह करवाने के लिए उन्होंने इन घोड़ा – गाड़ियों पर , मनुस्मृति का एक व्याख्यान लिखवा दिया , जिनका प्रयोग छात्राओं को घर से स्कूल लाने – ले जाने के लिए किया जाता था । उस वाक्य का मूल अर्थ यही था कि , “ कन्या के पालन – पोषण तथा शिक्षा – दीक्षा में भी समान दृष्टिकोण का पालन किया जाना चाहिए ।

पं . ईश्वरचन्द्र के समाज सुधारक रूप का सबसे उल्लेखनीय पक्ष क्या है?

ishwar chandra vidyasagar paragraph : ” पं . ईश्वरचन्द्र के समाज सुधारक रूप का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि उन्होंने • विधवा विवाह को सामाजिक मान्यता दिलाने में अन्ततः सफलता हासिल कर ली . विधवाओं की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। फलस्वरूप समाज में विधवाओं की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई । तत्कालीन समाज में महिलाओं की शोचनीय स्थिति पर उन्होंने तीक्ष्ण प्रहार किए ।

पं . ईश्वरचन्द्र ने अपने प्रयासों के पीछे भारतीय धर्म संहिताओं के उद्धरणों का भी जोर दिया तथा पाराशर संहिता का उल्लेख करते हुए विधवा विवाह के प्रस्ताव की सामाजिक । मान्यता की पुष्टि की . जिसके अनुसार कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में महिलाओं के लिए • पुनर्विवाह की अनुमति दी गई थी । पाँच दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में किसी भी महिला को दूसरा पति धारण करने का प्रावधान पाराशर संहिता में किया गया है , जब पति पागल हो गया हो , मर गया हो , संन्यास ले चुका हो , नपुंसक या जाति से बहिष्कृत हो चुका हो ।

सन् 1856 में ( ishwar chandra vidyasagar in hindi )पं . ईश्वरचन्द्र की अथक चेष्टा का परिणाम यह हुआ कि विधवा विवाह को कानूनी वैधता प्राप्त हो गई । उन्होंने कई विधवाओं का स्वयं पुनर्विवाह करवाया तथा पानी की तरह स्वयं अपना धन भी खर्च किया । यहाँ तक कि स्वयं उनके पुत्र ने भी एक विधवा से ही विवाह किया । पंडितजी के बाद में बहु विवाह समाप्त करने के लिए अंग्रेजी सरकार को एक याचिका पेश की , परन्तु विदेशी सरकार ने उनकी चेष्टा पर विशेष ध्यान नहीं दिया तथा याचिका की अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई ,

परन्तु सामाजिक सुधार के लिए उन्होंने निम्नलिखित उपलब्धियाँ अवश्य हासिल कर लीं
( 1 ) हिन्दू पारिवारिक वार्षिक कोष की स्थापना – इस प्रयास के अन्तर्गत किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिमाह एक निश्चित राशि जमा कराने पर उसकी मृत्यु के बाद उसके परिवार को न्यूनतम वित्तीय सहायता सुनिश्चित की जाती थी ।
( 2 ) मैट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन की स्थापना – इस संस्था के द्वारा सामान्य खर्च पर अंग्रेजी भाषा की शिक्षा प्रदान की जाती थी . साथ में यह भी ध्यान रखा जाता था कि इस शिक्षा के परिणामस्वरूप भारतीय संस्कृति की भी कोई क्षति न हो ।

ishwar chandra vidyasagar in hindi : इसके अन्तर्गत पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों ही संस्कृतियों की अच्छी बातों को उजागर करते हुए शिक्षा का प्रसार किया जाता था । बाद में इस संस्था का नाम विद्यासागर इन्स्टीट्यूट रख दिया गया । परन्तु पंडित ईश्वरचन्द्र की उपलब्धियों में से बांग्ला साहित्य तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका महान् योगदान भी उल्लेखनीय है ।

कविगुरू रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने पंडितजी के प्रति श्रद्धांजलि

ishwar chandra vidyasagar paragraph : कविगुरू रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने पंडितजी के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए विद्यासागर की महान् उपलब्धियों की एक छोटी सूची तैयार की , जोकि इस प्रकार थी


( 1 ) बांग्ला भाषा के सम्पूर्ण विकास में विद्यासागर का ही सर्वाधिक योगदान रहा ।
( 2 ) आधुनिक बांग्ला गद्य साहित्य के सबसे पहले रचनात्मक कलाकार स्वयं विद्यासागर ही रहे ।
( 3 ) बांग्ला साहित्य के वे पहले गद्य लेखक थे जिन्होंने इस भाषा में विराम चिह्नों ( जैसे विराम , अर्द्ध – विराम आदि ) के प्रयोग की शुरूआत की ।
( 4 ) विद्यासागर की वजह से ही भाषा की स्थिरता समाप्त होकर उसमें गतिशीलता आई ।
( 5 ) विधासागर ने ही वांग्ला साहित्य को संस्कृत प्रधान होने की मजबूरी ( या बेड़ियों ) से मुक्ति दिलाई । पं . ईश्वरचन्द्र की मौलिक लेखन की सूची कोई लम्बी भी नहीं थी ।
इसका मुख्य कारण भी यही था कि उन्होंने ज्यादातर अनुवाद , समीक्षाएँ तथा पाठ्य पुस्तकों पर लेखन कार्य किया ।

विद्यासागर की प्रमुख साहित्यिक कृतियों– ishwar chandra vidyasagar in hindi

ishwar chandra vidyasagar paragraph : विद्यासागर की प्रमुख साहित्यिक कृतियों में ‘ शकुन्तला ‘ , ‘ सीतार वनवास ‘ ( सीता का वनवास ) , भ्रान्ति विलास ( शेक्सपीयर की कॉमेडी ऑफ ऐरर्स का बांग्ला अनुवाद ) , ‘ वर्ण परिचय ‘ ( बांग्ला भाषा की वर्णमाला का ज्ञान ) , ‘ कथामाला ‘ ( कहानी संग्रह ) , ‘ चरितावली ‘ ( जीवनियाँ ) तथा ‘ आख्यान मंजरी ‘ ( कथा पुष्प ) आदि उल्लेखनीय हैं ।

पत्रकार के रूप में लिखे गये पत्र -ishwar chandra vidyasagar in hindi


ishwar chandra vidyasagar paragraph : इतना ही नहीं पत्रकार के रूप में उन्होंने ‘ सर्वशुभकारी ‘ , ‘ सोमप्रकाश ‘ तथा ‘ हिन्दू पैट्रियाट ‘ आदि पत्रिकाओं से लेखक , सम्पादक तथा संरक्षक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई ।

सबसे बड़ी बात , जोकि उनकी विभूति के विषय में विशेषतौर पर उल्लेखनीय यह है कि परोपकार तथा धर्मार्थ में की गई। उनकी हर भूमिका प्रायः सफल रही तथा उस जमाने में ऐसा दूसरा उदाहरण ढूँढ़ना भी मुश्किल काम ही रहा । एक बार पूरे बंगाल में भीषण अकाल पड़ा ।

उन्होंने मेदनीपुर तथा हुगली जिलों में लंगर ( निःशुल्क भोजन ) की व्यवस्था की यह लंगर लगभग तीन – चार माह तक चला , जोकि मुख्यतया उनकी चेष्टा से संचालित किया गया ।

इसी प्रकार एक बार वर्दमान जिले में मलेरिया रोग महामारी के रूप में फैल गया । विद्यासागर ने रोगियों की निःशुल्क चिकित्सा के लिए धर्मार्थ चिकित्सालय की स्थापना की । अपने परोपकारी स्वभाव तथा उदार व्यवहार के कारण उस समय वे पूरे समाज में ही लोकप्रिय हो चुके थे ।

यहाँ तक कि उनकी आय का बहुत बड़ा भाग निर्धनों , विद्यार्थियों , विधवाओं , अनाथों तथा दूसरे जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए खर्च होता था । सबसे मार्मिक उदाहरण तो यह भी रहा कि ठंड में ग्राहकों के लिए कलकत्ता की सड़कों पर घूमती हुई वेश्याओं को उन्होंने रुपए देते हुए कहा- “ माताओ ! यह लो रुपए । जाओ अपने घर जाओ । ठंड में इंतजार मत करो “।

पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर  एशियाटिक सोसायटी के सदस्य कब बने?


ishwar chandra vidyasagar paragraph : उनकी समाज सुधारक की भूमिका से प्रेरित होकर 1864 में एशियाटिक सोसायटी ( लंदन ) ने उन्हें अपनी संस्था का मानद सदस्य बनाया । उसके बाद 1880 में उन्हें सी .आई.ई. ( कॉम्पेनियन ऑफ इंडियन ऐम्पायर ) की उपाधि प्रदान की गई , परन्तु वे स्वयं यह उपाधि प्राप्त करने नहीं गए । पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्हें 1883 में अपना सदस्य बना लिया ।

पं . ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के मृत्यु का क्या कारण था?


ishwar chandra vidyasagar in hindi : 29 जुलाई , 1891 को मानवतावादी इस सच्चे , समाजसेवी का हृदयरोग के कारण स्वर्गवास हो गया । उनकी मृत्यु पर गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत ही मार्मिक टिप्पणी की थी कि “ उनके चरित्र की सबसे गौरवशाली विशेषता न ही उनकी करुणा थी तथा न ही उनकी विद्वता थी , बल्कि समझौता न करने वाला पौरुष तथा मानवीय श्रेष्ठता ही उनकी प्रधान विशेषता थी ।

” यह बात सच है कि वर्तमान स्वाधीन भारत की शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्होंने एक आधार स्तम्भ पराधीन भारत में ही रख दिया था । इस दृष्टिकोण से भारत माता लिए की सन्तानों को शिक्षित तथा सभ्य बनाने की जो ज्योति उन्होंने प्रज्ज्वलित की थी , उसकी चमक आज भी बनी हुई है तथा फैलती ही जा रही है ।

सही अर्थों में उन्होंने भारत भूमि की महान् विभूतियों में से प्रमुख विभूति की भूमिका बखूबी निभाने में कोई कमी नहीं रहने दी । आज भी सारा देश उनका आभारी है ।

निष्कर्ष :ishwar chandra vidyasagar in hindi

ishwar chandra vidyasagar in hindi :आज हमने इस article मे ishwar chandra vidyasagar in hindi biography को पढ़ा है। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के शहास और वीरता को इस blog ke जरिये जाना है।( ishwar chandra vidyasagar in hindi ) पं . ईश्वरचन्द्र के समाज सुधारक के रूप मे हम भारत वासियो के लिए अपना योगदान दिया।

हम Ishwar Chandra Vidyasagar को कभी भूल नही सकते है। ishwar chandra vidyasagar in hindi मे हमने ishwar chandra vidyasagar paragraph , biography को समझा है।

विद्यासागर की प्रमुख साहित्यिक कृतियों के नाम क्या है?

बेताल पंचारिमसती, बांग्लार इतिहास

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के माता-पिता का क्या नाम था?

माता -भगवती देवी
पिता -ठाकुरदास बन्धोपाध्याय ( बनर्जी )

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के मृत्यु का क्या कारण था?

हृदयरोग