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डॉ . रामकुमार वर्मा का जीवन परिचय

dr ramkumar verma : सम्पादक , लेखक , डॉ . रामकुमार वर्मा जैसे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार किसी भी भाषा में बहुत कम ही मिलते हैं । कवि , नाटककार , आलोचक , निबन्धकार , उपन्यासकार , एकांकीकार , र्शनिक , अध्यापक , अभिनेता आदि विविध रूपों में उन्होंने हिन्दी साहित्य की जिस प्रकार से सेवा की है , वह गौरवपूर्ण एवं स्तुत्य है ।

dr ramkumar verma : डॉ . वर्मा का कृतित्व एवं व्यक्तित्व दोनों ही महान् हैं — ‘ को बड़ छोट कहत अपराधू ‘ की स्थिति है । डॉ . वर्मा का जन्म 15 सितम्बर , 1905 को मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुआ था । इनके पूज्य पिता श्री लक्ष्मी प्रसाद डिप्टी कलेक्टर थे । इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में नागपुर में हुई थी । हिन्दी की शिक्षा इन्होंने अपनी माता श्रीमती राजरानी देवी से प्राप्त की । श्रीमती राजरानी सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं कवयित्री थीं ।

डॉ . रामकुमार वर्मा जीवनी

नामडॉ . रामकुमार वर्मा
जन्म 15 सितम्बर , 1905
जन्म स्थानमध्य प्रदेश के सागर जिले में
मृत्यु1990
माता-पिताश्रीमती राजरानी देवी – लक्ष्मी प्रसाद
कार्य‘एकलव्य’, ‘रेशमी ताई’, ‘पृथ्वीराज की आँखे’, ‘जौहर’, ‘सप्त किरन’, ‘कौमुदी महोत्सव’, ‘दीपदान’
पुरस्कार पद्मभूषण 1963 साहित्य और शिक्षा
काव्यसंत रैदास तथा ओ अहिल्या प्रमुख रूप
शिक्षा एम ए (हिन्दी), नागपुर विश्वविद्यालय से पीएच डी
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dr ramkumar verma biography

डॉ . रामकुमार वर्मा के सम्मान व पुरस्कार

dr ramkumar verma : डॉ . वर्मा बाल्यकाल से ही मेधावी थे । उन्होंने 1929 ई . में हिन्दी की एम.ए. परीक्षा में पूरे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे । डॉ . वर्मा को उनकी साहित्य सेवा के लिए समय – समय पर सम्मानित भी किया गया । उन्हें 1920 में नागरी काव्य पुरस्कार , 1929 में हॉलैण्ड स्वर्ण पदक , 1936 में ‘ चित्ररेखा ‘ पर देव पुरस्कार , 1936 में ‘ चन्द्रकिरण ‘ पर चक्रधर पुरस्कार , 1947 में केन्द्रीय शासन नाटक पुरस्कार , 1950 में उत्तर प्रदेश संस्थान पुरस्कार , 1960 एवं 1970 में कालिदास पुरस्कार तथा 1963 में पद्म भूषण से सम्मा किया गया ।

डॉ . वर्मा छायावाद के अन्तिम स्तम्भों में से एक प्रमुख कृती थे। प्रसाद , पंत , निराला और महादेवी के साथ – साथ आपने भी दलितोत्थान हेतु स्तुत्य प्रयास किया । आपकी मुख्य भावभूमि प्रणय है । प्रकृति के सुन्दर चित्र भी वर्माजी की रचनाओं में संगृहीत हैं । रहस्य और अध्यात्म की पृष्ठभूमि में आपने सुन्दर गीत भी प्रस्तुत किए हैं ।

dr ramkumar verma biography : जलि ‘ ( 1930 ) , ‘ रूपराशि ‘ ( 1931 ) और चित्ररेखा ( 1935 ) में उनकी रहस्यवादी स्वर धारा करुणा से प्लावित हुई । चन्द्रकिरण और जौहर में भी यही स्वर मुखरित हुआ है । वास्तव में चित्ररेखा वर्माजी की साधना का सफलतम रूप है । चित्ररेखा के कारण ही वर्माजी रहस्यवादी माने जाने लगे थे । इस कृति में प्राकृतिक सुषमा , अध्यात्म , प्रणय – आस्था और जीवन के प्रति शोधपूर्ण दृष्टि का सुलझा हुआ रूप दृष्टिगोचर होता है । ‘ एकलव्य ‘ वर्माजी का सर्वाधिक प्रसिद्ध महाकाव्य है ।

dr ramkumar verma biography : एकलव्य में उन्होंने उपेक्षित शुद्र प्रतिभा के आदर्श को रेखांकित किया है । गुरु द्रोणाचार्य की क्रीत विचारधारा के कारण एकलव्य की धनुर्विद्या नष्ट हो गई । गुरु का आदर्श वेतनभोगी होने के कारण नैतिकता की मीमा से बाहर हो गया है । नागरिक संस्कृति सदैव स्वार्थ पर आधारित होती है , उसकी शब्दावली में दोहरा अर्थ होता है , जिसे समझना कठिन होता है । वह राजनीति से प्रेरित होती है , भावनाओं से नहीं  एकलव्य तो शिष्य धर्म का पालन करता जा रहा है ।

dr ramkumar verma : उसे उच्च वर्ग की दुरंगी चाल में भावुकता नहीं दिखाई दे रही है । गुरु के लिए ‘ सर्वस्व का अर्पण ‘ उसका आदर्श वन वया है । शिष्य की शिष्यता धन्यवाद की अधिकारिणी है ।

अन्य पढ़े-

डॉ . वर्मा के अन्य प्रमुख काव्यों

dr ramkumar verma: डॉ . वर्मा के अन्य प्रमुख काव्यों में चित्तौड़ की चिता ,
उत्तरायण ,
संत रैदास तथा
ओ अहिल्या प्रमुख रूप से उल्लेखीय हैं ।

डॉ . रामकुमार वर्मा के स्वर प्रमुख एकांकी

  • dr ramkumar verma biography : वर्माजी एकांकी कला के प्रवर्तक और सम्राट् माने जाते हैं 
  • पृथ्वीराज की आँखें ,
  • रेशमी टाई ,
  • चारुमित्रा ,
  • शिवाजी ,
  • विभूति ,
  • सप्तकिरण ,
  • कौमुदी महोत्सव ,
  • ध्रुवतारिका ,
  • रम्यरास ,
  • रूपरंग ,
  • रजत रश्मि ,
  • ऋतुराज ,
  • दीपदान ,
  • इन्द्रधनुष ,
  • रिमझिम ,
  • पाँचजन्य मयूर पंख ,
  • जौहर की ज्योति और इतिहास के स्वर प्रमुख एकांकी संग्रह है।

वर्माजी के नाटकों की सूची

dr ramkumar verma biography : वर्माजी के नाटकों में सत्य का स्वप्न ,
विजय पर्व ,
कौमुदी महोत्सव ,
अशोक ,
महाराणा प्रताप ,
पृथ्वी का स्वर्ग ,
अग्नि शिखा ,
जयवर्धमान तथा कर्मवीर उल्लेखनीय हैं ।

वर्माजी ने अपनी पौराणिक , ऐतिहासिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकांकियों में ऐसे नवीन आदर्शों की स्थापना की है , जो जीवन की व्यावहारिकता से ओत – प्रोत होकर नैतिक दृष्टि से जनमानस के लिए कल्याणप्रद हैं ।

इस प्रकार अपने आदर्शवाद में वे अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं । उनमें उच्चकोटि की राष्ट्रीय भावना है । सांस्कृतिक दृष्टि से वह अपने क्षेत्र में प्रसाद और प्रेमचन्द के समकक्ष रखे जा सकते हैं । वर्माजी कलुष के भीतर से पवित्रता , दैत्य के भीतर से शालीनता , वासना के भीतर से आत्म – संयम एवं क्षुद्रता के भीतर से महानता का अन्वेषण करने में समर्थ हुए हैं और यह सब उन्होंने विभिन्न परिस्थितियों में पात्रों के संघर्ष के माध्यम से स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है ।

डॉ . रामकुमार वर्मा के स्वरो कि विशेषता

dr ramkumar verma : आधुनिक सभ्य समाज का प्रेम , दंभ , ईर्ष्या , संदेह और असंतोष उनकी एकांकी के प्रमुख अंग हैं । चारित्रिक द्वन्द्व वर्माजी की एकांकियों का प्राण है । उनकी एकांकियों का संघर्ष और आंतरिक द्वन्द्व अन्ततः शान्त रस में बदल जाता है । वर्माजी के पात्र स्वाभाविक हैं और घटनाओं के प्रवाह में अपना विकास स्वयं करने वाले हैं । पात्रों के कथोपकथन भी स्वाभाविक , सारगर्भित , मार्मिक , नाटकीय और भावव्यंजक हैं ।

dr ramkumar verma biography in hindi  : जहाँ पात्र सुशिक्षित हैं ( प्रायः सुशिक्षित ही हैं ) वहाँ वार्तालाप की भाषा भी सुरुचिपूर्ण है । वर्माजी स्वयं एक कुशल अभिनेता थे , अतः उन्होंने रंगमंच की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति की है . एक ही दृश्य में घटनाओं का उत्थान और पतन , कौतूहलजनक आवेगों का चरम सीमा में विस्फोट , पात्रों के मनोविकारों का क्रमिक परिवर्तन और उसकी नियताप्ति अधिकांश पात्र मिलती है ।

वर्माजी की नाट्यकला पर पाश्चात्य नाटककारी तथा इब्सन , मेंटरलिंक आदि का प्रभाव है , किन्तु अपने मनोवेगों की अभिव्यक्ति में वे सर्वथा मौलिक और भारतीय हैं । वर्माजी एक सफल आलोचक और निबन्धकार थे । कबीर का रहस्यवाद , साहित्य समा लोचना , हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास , हिन्दी साहित्य की रूपरेखा , एकांकी कला , साहित्यशास्त्र , साहित्य चिंतन उनकी आलोचना शक्ति के सशक्त प्रमाण हैं ।

वर्माजी के सम्पादन कार्य के सूची

  • dr ramkumar verma : उन्होंने आलोचनात्मक निबन्ध भी लिखे हैं जो ‘ विचार – दर्शन ‘ और ‘ अनुशीलन ‘ मेंसंगृहीत हैं । वर्माजी ने सम्पादन का भी कार्य किया है ।
  • ‘ हिन्दी गीतिकाव्य ‘ , ‘
  • कबीर पदावली ‘ ,
  • ‘ आठ एकांकी नाटक ‘
  • आधुनिक हिन्दी काव्य ‘ ,
  • वृहत् सन्त कबीर ‘ और ‘ संक्षिप्त संत कबीर ‘
  • उन्हीं के द्वारा सम्पादित ( ग्रन्थ ) हैं ।

dr ramkumar verma : इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘ माँ का हृदय ‘ नामक उपन्यास और रहस्यवादी भावना से ओत – प्रोत गद्यकाव्य का भी सृजन किया है । वर्माजी विषयानुकूल भाषा और शैली का निर्माण करने में दक्ष थे ।

उनकी भाषा के दो रूप थे-


( 1 ) व्यावहारिक और
( 2 ) साहित्यिक ।

व्यावहारिक भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ – साथ फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं । जबकि साहित्यिक भाषा में उर्दू व फारसी के शब्दों का प्रायः बहिष्कार किया गया है ।

वर्माजी की काव्य शैली भी दो प्रकार की है –

( 1 ) इतिवृत्तात्मक और (ii) गीतात्मक , किन्तु उन्होंने अपने गद्य साहित्य में कई प्रकार की शैलियों का प्रयोग किया है । अपनी एकांकियों में विषयानुरूप कहीं भावात्मक , कहीं विश्लेषणात्मक , कहीं अलंकारिक , कहीं पर परिचयात्मक और कहीं व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है ।

निबन्धों में उनकी शैली दो प्रकार की है –

(1)विचारात्मक और(2)आलोचनात्मक । इससे स्पष्ट है कि भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार था । वर्माजी अत्यन्त सहृदय और विनोदप्रिय थे । राष्ट्रभाषा हिन्दी से उन्हें अगाध प्रेम था और वे इसके विकास हेतु निरन्तर प्रयत्नशील रहे । हम सब यदि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के उनके उद्देश्य सफल हुए , तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी- हम सब कब तक यह सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे , भविष्य ही बताएगा ।

FAQ

डॉ रामकुमार वर्मा की एक रचना का नाम लिखिए ?

अंजलि’, ‘अभिशाप’, ‘निशीथ’, ‘जौहर’, ‘चित्तौड़ की चिता’ आदि।

डॉ . रामकुमार वर्मा को पद्मभूषण कब मिला?

1963