Bismaark ka jeevan parichay
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Bismaark ka jeevan parichay in Hindi | राजनीतिज्ञ बिस्मार्क का जीवन परिचय | No 1 politicians bismark

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कुशल राजनीतिज्ञ बिस्मार्क -Bismaark ka jeevan parichay

Bismaark ka jeevan parichay  – बिस्मार्क अपने समय का निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ व महत्तम व्यक्ति था उसने अपनी महान् राजनीतिक योग्यता के आधार पर श्रेष्ठ राजनीतिक सफलताएँ अर्जित कीं , जिनका विश्व इतिहास पर भारी प्रभाव पड़ा . उसने जर्मनवासियों को जो चोरों की भाँति समुद्र में लुक – छिपकर व्यापार करते थे . उन्हें राष्ट्रीय झण्डा प्रदान किया . उसके प्रयासों के फलस्वरूप बर्लिन यूरोपीय राजनीति में धुरी बन गया .

राजनीतिज्ञ बिस्मार्क का जन्म कब और कहाँ हुआ? Bismaark ka jeevan parichay

Bismaark ka jeevan parichay (जन्म)- ऑटोवान बिस्मार्क स्कानहौसिन का जन्म 1 अप्रैल , 1815 को ब्रेण्डेनबर्ग के एक कुलीन घराने में हुआ । बिस्मार्क को देहाती प्राकृतिक जीवन से बहुत प्रेम था । तैराकी घुड़सवारी , शिकार तथा निशानेबाजी उनके प्रिय शौक थे । देहाती जीवन से उसका लगाव कभी नहीं छूटा , यहाँ तक कि उसके लम्बे राजनीतिक जीवन में भी देहात के आनंद उसको अपनी ओर आकृष्ट करते थे । अपने विश्वविद्यालय जीवन में वह प्रायः झगड़ों , शराबखोरी तथा अशिष्टा चार के लिए बदनाम रहा ।

विश्वद्यालयी शिक्षा के उपरान्त उसने प्रशा की सिविल सर्विस के न्याय विभाग में नौकरी कर ली , लेकिन उसका मन इस कार्य में नहीं लग पाया और वह 1839 में फिर से अपनी जमींदारी का प्रबन्ध देखने लगा । बिस्मार्क की रुचि उस समय कृषि कार्यों में अधिक थी . उसने कहा था ,

” मेरा इरादा है कि कृषि – कर्म में सफलता प्राप्त करने के बाद मैं सारा जीवन देहात में ही रहूँ और देहात में ही मरूँ . ” लेकिन बिस्मार्क के भाग्य में यह बदा नहीं था , समस्त जर्मनों का भाग्य उसी के हाथों लिखा जाना था और इसके लिए उसे यह सब छोड़ना पड़ा । शीघ्र ही वह बर्लिन की रूढ़िवादी पार्टी ( Conservative Party ) के सम्पर्क में आया और सदैव के लिए रूढ़िवादी बन गया ।

राजनीतिज्ञ बिस्मार्क का विवाह कब हुआ?

Bismaark ka jeevan parichay – 1847 में उसने अपने विवाह के साथ प्रशा की राजनीति में पदार्पण किया . संयुक्त प्रशा की संसद ( Diet ) का सदस्य कर उसने इतिहास निर्माण करना प्रारम्भ किया . बिस्मार्क प्रशा की राष्ट्रीय पताका का प्रभाव चतुर्वित विस्तार करना चाहते थे। किंतु वह यह नही चाहता था की प्रशा कि निति फ्रैंकफर्ट की फेडरल डायट ( जर्मन राज्यों की केन्द्रीय सभा ) द्वारा संचालित हो . फेडरल डायट पर आस्ट्रिया का नियंत्रण था । जर्मनी इस समय लगभग 39 छोटी – छोटी रियासतों में बँटा हुआ था ।

प्रशा इन रियासतों में सबसे बड़ा और शक्तिशाली था , जिसका शासक इस समय फ्रेडरिक विलियम प्रथम था . प्रशा तथा प्रशावादिता में उसका असीम विश्वास था । वह कहा करता था , “ हम प्रशावासी हैं और सदैव इस तथ्य पर गर्व करते रहेंगे . मैं जानता हूँ कि उस अपने देश के अधिकांश लोगों के विचारों को व्यक्त कर रहा हूँ . मैं ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूँ कि हम सदैव प्रशावासी रहें चाहे यह संविधान रहे या नष्ट हो जाए .

” बिस्मार्क ने इस आदर्श को कभी नहीं भुलाया । जब समस्त जर्मनी का एकीकरण उसकी इच्छानुसार हो गया । उस समय जर्मनी को प्रशा में मिलाया गया न कि प्रशा को जर्मनी में 1851 तक यह प्रकट हो चुका था, कि बिस्मार्क एक शक्तिशाली पुरुष है और उसमें नेतृत्व के गुण हैं ।

प्रशा के सम्राट् को भी उसने अपनी ओर आकर्षित : विलियम प्रथम

Bismaark ka jeevan parichay – प्रशा के सम्राट् को भी उसने अपनी ओर आकर्षित किया । विलियम प्रथम इस बात से प्रसन्न था कि बिस्मार्क राज सिंहासन के प्रति सच्ची निष्ठा रखता है । शीघ्र ही बिस्मार्क को फेडरल डायट में प्रशा का प्रतिनिधि बनाकर फ्रेंकफर्ट भेजा गया । बिस्मार्क को फ्रेंकफर्ट में ज्ञात हुआ कि जर्मन एकीकरण के मार्ग में दो बड़ी बाधाएँ थीं ।

एक तो आस्ट्रिया की दुराग्रहपूर्ण नीति और दूसरे जर्मनी की छोटी रियासतों का प्रशा के प्रति संदेहपूर्ण व्यवहार । अपने फ्रेंकफर्ट जीवन के प्रारम्भ से ही बिस्मार्क ने प्रशा को आस्ट्रिया के बराबर मानना शुरू कर दिया। उसने ऐसा आचरण प्रदर्शित करना शुरू किया जिससे आस्ट्रिया चिढ़े । इस सम्बन्ध में वह बारीक – से- बारीक तथ को भी नजरअंदाज नहीं करता था । यदि आस्ट्रिया प्रशा को नीचा दिखाने का प्रयास करता तो वह भी ऐसा ही करता ।

उदाहरणस्वरूप आस्ट्रिया का प्रतिनिधि थन , जोकि समिति सभाओं में सिगार पिया करता था , उसने एक – एक अवसर पर आश्चर्य के साथ देखा कि बिस्मार्क बिना कोट पहिने केवल कमीज के साथ डायट में चला आया . उसने कहा – “ बड़ी गर्मी है – कोट असह्य है ।

जर्मन एकीकरण में बिस्मार्क का योगदान


Bismaark ka jeevan parichay – ” जर्मन एकीकरण में बिस्मार्क का योगदान 1862 में प्रशा सम्राट् ने बिस्मार्क को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया . बिस्मार्क के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व प्रशा की संसद ने सैनिक शक्ति में वृद्धि के विधेयक को नामंजूर कर दिया था . फलतः सम्राट् तथा संसद के बीच गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गई . इस समय सारे देश में बिस्मार्क ही एक ऐसा व्यक्ति था जिसमें संसद के विरुद्ध सम्राट् का साथ देने की योग्यता और इच्छा थी . रूढ़िवादी बिस्मार्क को प्रधानमंत्री बनाए जाने से विरोधी संसद में और अधिक उबाल आया , किन्तु बिस्मार्क अविचलित रहे ।

रक्त एवं लौह नीति : Bismaark ka jeevan parichay

शीघ्र ही बिस्मार्क ने अपने राजनीतिक सिद्धान्त को इन शब्दों में व्यक्त किया जिन्हें बाद में पश्चिमी साहित्य में बड़ी उच्चकोटि की चीज समझा गया – “ जर्मनी प्रशा के उदारवाद की ओर नहीं देख रहा है , बल्कि जर्मनी को प्रशा की शक्ति की आवश्यकता है . आज की समस्याएँ भाषणों और प्रस्तावों से नहीं सुलझेंगी , बल्कि उनको सुलझाने के लिए रक्त और लोहे की आवश्यकता है . ” विस्मार्क ने घोषणा की कि ” युद्ध रूपी देवता ही इतिहास का निर्माण करेंगे और इसके लिए आवश्यक है।

किसी भी कीमत पर प्रशा की सैनिक शक्ति का विस्तार . ” विरोधी संसद सदस्यों ने बिस्मार्क पर वाक्य खण्डों और चुटकुलों से प्रहार करना शुरू किया . अब बिस्मार्क और संसद के बीच लड़ाई पूरी तरह ठन गई . अपने एक तगड़े विरोधी को बिस्मार्क बजट संसद शासन चलाया ।

बिस्मार्क ने प्रशा की ने कुश्ती के लिए ललकारा , किन्तु उक्त विरोधी को चुनौती स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हुई . चार वर्ष तक वह विरोधी संसद से अकेला लड़ता रहा . उसने इन चार वर्षों में  की ही सैन्य – शक्ति बढ़ाने में सफलता पायी और देखती रह गई . प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने के कुछ ही दिन पूर्व जब वह इंगलैण्ड गया तब बिस्मार्क ने कहा था , ” ज्यों ही हमारी सेना सुदृढ़ हो जाती है , हमको आस्ट्रिया के साथ अच्छी तरह से निबटना पड़ेगा ।

” सर्वसाधारण ने समझा कि बिस्मार्क झाँसा दे रहा है , किन्तु डिजरैली ने लोगों को सावधान करते हुए कहा , “ इस आदमी को गलत मत समझो , वह जो कुछ कहता है , उसे अवश्य करेगा . ” बिस्मार्क इस बात को अच्छी तरह जानता था कि जब उसे विदेश नीति में सफलता मिलेगी , तो लोग उसकी निरंकुशता को भूल जाएंगे ।

प्रशा की सैन्य शक्ति को मजबूत करने के बाद जिस प्रकार बिस्मार्क ने जर्मन एकीकरण को पूर्ण किया , उसकी भी एक रोचक कहानी है . डेनमार्क के विरुद्ध श्लेसविग हॉल्सटीन के प्रश्न पर उसने आस्ट्रिया को अपने पक्ष में कर युद्ध छेड़ दिया . यहाँ स्मरणीय है कि श्लेसविग हॉल्सटीन की अधिकांश जनता जर्मन थी . डेनमार्क इस संघर्ष में पराजित हुआ और उसे प्रशा – आस्ट्रिया के साथ 30 अक्टूबर , 1864 को वियेना की सन्धि पर हस्ताक्षर करने पड़े ।


डेनमार्क ने श्लेसविग हॉल्सटीन के साथ लाएनबर्ग का प्रदेश भी विजयी पक्षों को सौंपा . अब प्रशा व आस्ट्रिया के बीच इन प्रदेशों के बँटवारे को लेकर वाद – विवाद शुरू हो गया । बिस्मार्क तो चाहता भी यही था । जून 1866 में इस मुद्दे को लेकर तनाव इतना बढ़ा कि प्रशा ने आस्ट्रिया पर आक्रमण कर दिया ।

इस संघर्ष का फैसला सात सप्ताह के भीतर ही हो गया , सैडोवा के युद्ध में आस्ट्रिया की निर्णायक पराजय हुई . बिस्मार्क ने यह युद्ध छेड़ने से पहले ही रूस व इटली को अपने पक्ष में कर लिया । फ्रांस को यह संकेत दे दिया गया कि उसे कुछ प्रदेश दक्षिणी जर्मनी से प्राप्त हो जाएंगे . यह भी बिस्मार्क की गहरी कूटनीति थी ।

प्रशा – आस्ट्रिया संघर्ष की नींव

Bismaark ka jeevan parichay – प्रशा – आस्ट्रिया संघर्ष की नींव उसने डेनमार्क युद्ध के समय रखी और अब वह इस युद्ध के माध्यम से भावी प्रशा – फ्रांस संघर्ष की नींव रखने जा रहा था . सैडोवा युद्ध में आस्ट्रिया की पराजय के पश्चात् प्रशा सम्राट् , तो वियेना पर भी आक्रमण के लिए प्रस्तुत था , किन्तु बिस्मार्क ने बुद्धिमतापूर्वक यह अस्वीकार कर दिया । वह इस तथ्य से परिचित था कि यदि वियेना पर आक्रमण किया गया , तो अन्य यूरोपीय देश इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे और इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का कार्य अधूरा रह जाएगा ।

वस्तुतः बिस्मार्क का लक्ष्य आस्ट्रिया को जर्मन परिसंघ से बाहर निकालना था न कि इसका मान – मर्दन करना . इस युद्ध के बाद बिस्मार्क ने मेन्ज नदी के उत्तर में 21 ( इक्कीस ) जर्मन रियासतों को मिलाकर प्रशा के नेतृत्व में उत्तरी जर्मन राज्य संघ का निर्माण किया . इस प्रकार जर्मनी के एकीकरण का प्रथम चरण पूरा हुआ . आस्ट्रिया को पराजित करके बिस्मार्क ने अपनी रक्त और लौह नीति की धाक जमा दी ।

प्रशा – आस्ट्रिया युद्ध में फ्रांस


Bismaark ka jeevan parichay – प्रशा  आस्ट्रिया युद्ध में फ्रांस इस आशा से तटस्थ रहा था कि दोनों के बीच युद्ध लम्बे समय तक चलेगा और तब वह हस्तक्षेप कर फायदा उठा लेगा , लेकिन बिस्मार्क ने आस्ट्रिया को सात सप्ताहों में ही पराजित कर , तत्पश्चात् उसके साथ उदार सन्धि कर फ्रांसीसी शासक नेपोलियन तृतीय के मंसूबे खाक में मिला दिए . बिस्मार्क जानता था कि फ्रांस – प्रशा युद्ध बाद ही जर्मन एकीकरण सम्भव है , क्योंकि द . जर्मनी की रियासतों पर फ्रांस का प्रभाव था , विस्मार्क ने आगे चलकर कहा था- ” फ्रांस और प्रशा का युद्ध इतिहास के तर्क में निहित है . ” के 1870 में बिस्मार्क के कुशल मार्गदर्शन की बदौलत प्रशा ने फ्रांस को सीडान के युद्ध में पराजित किया ।

इस युद्ध के साथ ही द . जर्मनी की रियासतों पर प्रशा का अधिकार हो गया और इस प्रकार जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ . बिस्मार्क की विदेश नीति प्रो . राबर्ट्सन लिखते हैं— 18 जनवरी , 1871 को जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हुआ एवं उसी दिन लौकिक यूरोप ने बिस्मार्क युग में पदार्पण किया 1871 से 1890 तक बिस्मार्क यूरोप का भाग्य – विधाता एवं यूरोप की राजनीति का केन्द्र था । ” जर्मन एकीकरण के बाद विस्मार्क ने यूरोपीय राजनीति में फ्रांस को अकेला पटकने की नीति अपनाई और इसमें वह सफल भी रहा .

राजनीतिज्ञ बिस्मार्क के विदेश नीति के तीन प्रमुख लक्ष्य

Bismaark ka jeevan parichay – उसकी विदेश नीति के तीन प्रमुख लक्ष्य थे
( i ) फ्रांस को मित्रविहीन बनाए रखना ।
( ii ) इंगलैण्ड को यूरोपीय मामलों से अलग रखना ।
( iii ) पूर्वी समस्या में अहस्तक्षेप की नीति का पालन करना।

1871 में ही जर्मन सम्राट् विलियम प्रथम द्वारा बिस्मार्क को जर्मनी का प्रथम चांसलर नियुक्त किया गया । इसके बाद अगले बीस वर्षों तक वह जर्मनी का सर्वेसर्वा बना रहा । देश में व देश के बाहर बिस्मार्क के विरोधियों की कोई कमी नहीं थी . इसके बावजूद 1871 से 1890 तक के काल में बिस्मार्क वास्तव में महान् साहस , शक्ति , उत्साह , धैर्य और असीम स्वेच्छाचारिता का प्रतीक बना रहा , किन्तु उसके पक्ष में एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसे सम्राट् विलियम का बेरोक – टोक समर्थन प्राप्त था ।

विदेश सम्बन्धों के निर्वहन में उसने सदैव महान् योग्यता , राजनीतिज्ञता तथा कूटनीतिज्ञता का परिचय दिया . एक बार विलियम प्रथम ने कहा था , ” केवल बिस्मार्क ही ऐसा व्यक्ति है जो एकसाथ पाँच गेंदों के साथ करतब दिखा सकता है , जिनमें से कम से कम दो गेंदें सदैव हवा में रहती थीं ” . ये पाँच गेंदे थीं

आस्ट्रिया , रूस , फ्रांस , इंगलैण्ड तथा इटली . वह पाँचों देशों रूपी गेंदों के साथ मनमाने ढंग से खिलवाड़ करता था । फ्रांस को प्रायः उसने यूरोपीय राजनीति से बहिष्कृत रखा । आस्ट्रिया , इटली तथा रूस को उसने अपने पक्ष में बनाए रखने में सफलता प्राप्त की . इंगलैण्ड को भी उसने अपनी नीति के अनुरूप मामलों से तटस्थ रखने में सफलता प्राप्त की ।

बिस्मार्क का पतन

1888 में बिस्मार्क अपनी सफलताओं के चरम शिखर पर था , परन्तु दुर्भाग्यवश उसी वर्ष उसका भाग्य नक्षत्र डूबने लगा . इसी वर्ष जर्मन सम्राट् विलियम प्रथम का स्वर्गवास हो गया और उसकी जगह उसका पुत्र फ्रेडरिक विलियम ‘ कैसर ‘ द्वितीय सिंहासन पर बैठा ।

विलियम द्वितीय के अत्यधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण बिस्मार्क के साथ उसकी पटरी नहीं समय से सम्राट् की प्रत्येक राजाज्ञा पर एक ओर बिस्मार्क के बैठी विलियम प्रथम हस्ताक्षर हुआ करते थे , लेकिन जब विलियम द्वितीय ने समाजवादियों के विरुद्ध लगाये गए कानूनों को वापस लेने की घोषणा की , तो बिस्मार्क के उस पर हस्ताक्षर नहीं थे . इतना ही नहीं इस घटना के कुछ समय बाद विलियम ने अपने मंत्रियों को आज्ञा दी कि वे समस्त कागज सीधे उसके पास भेजें , बिस्मार्क के माध्यम से नहीं .

इससे दोनों के बीच तनाव बढ़ा , यह तनाव इस सीमा तक पहुँचा कि जब विलियम द्वितीय ने यह जानने की इच्छा प्रकट की कि “ उसने किसी एक मंत्री को क्या मंत्रणा दी है ? ” तो बिस्मार्क क्रोध से उबल पड़ा और उसने सम्राट् से कहा , ” उसकी आज्ञाएँ राजकुमारी के बैठने के कमरे तक ही सीमित हैं . ।

” इस घटना के कुछ ही समय बाद विस्मार्क ने त्यागपत्र दे दिया । सम्राट् ने उसका त्यागपत्र स्वीकार करके उसे कुलीन पद तथा उच्च सैनिक पद से विभूषित करना चाहा , पर बिस्मार्क ने इनकार कर दिया . उसके पतन पर इंगलैण्ड के प्रसिद्ध समाचार – पत्र पंच ( Punch ) ने एक व्यंग्य चित्र प्रकाशित किया जिसके नीचे लिखा था . ” पोतचालक का विसर्जन किया गया ” ( The Pilot was dropped ) इस घटना के विषय में प्रो . राबर्टसन ने लिखा है , ” 20 मार्च , 1890 के दिन वीर युग वास्तव में समाप्त हुआ । ” बर्लिन छोड़ने से पहले बिस्मार्क विलियम प्रथम की समाधि पर गया एवं उस पर फूल चढ़ाए ।

29 मार्च , 1890 को वह बर्लिन से अपने पैतृक घर की ओर रवाना हुआ । रेलवे स्टेशन पर उसे विदाई देने के लिए विलियम द्वितीय को छोड़कर सेनापति , मंत्रिगण , राजदूत एवं अपार जनसमूह था । प्रो . राबर्ट्सन ने इस दृश्य का वर्णन करते हुए लिखा है , ” यदि उस दिन विलियम द्वितीय प्लेटफॉर्म पर आता , तो वह जनसमूह की श्रद्धांजलि से सीख सकता था कि सम्राट् आते हैं और चले जाते हैं , लेकिन जर्मनी ही नहीं यूरोप के लिए केवल एक ही बिस्मार्क आया एवं उसके स्थान पर दूसरा नहीं आएगा . ” 1898 में बिस्मार्क बीमार पड़ा और उसी वर्ष 30 जुलाई को उसकी मृत्यु हो गई । सम्राट् विलियम द्वितीय उसके दफनाने के समय उपस्थित ” था ।

बिस्मार्क के व्यक्तित्व का मूल्यांकन | Bismaark ka jeevan parichay

Bismaark ka jeevan parichay – बिस्मार्क अपने युग का प्रतिनिधि ही नहीं वरन् उसका निर्माता था . यूरोप के एक समाचार – पत्र ने लिखा था , ” बिस्मार्क यहाँ है , वहाँ है , वह सर्वत्र है ” उसकी नीति की दुहाई देकर आज भी गुटबंदियाँ की जाती हैं । उसके समान आज भी विश्व के महान् राजनीतिज्ञ शान्ति स्थापना की बातें कहकर कूटनीतिक चालों द्वारा अपने शत्रुओं को परास्त करने में प्रयत्नशील हैं . बिस्मार्क की विशेषता थी कि एक बार नीति निर्धारित करने के बाद उससे डिगता नहीं था ।

बिस्मार्क शक्ति का उपासक था . एक बार उसने कहा था , नहीं , केवल शक्ति विस्तार के लिए राष्ट्रीय इच्छा है , जिसके लिए समस्त उपाय उचित हैं . ” एक “ नीति और कुछ जर्मन लेखक ने लिखा है कि “ उद्यत विशालता ( Defiant colossality ) बिस्मार्क के की विशेषता थी .

” बिस्मार्क की नीति एवं व्यक्तित्व के विषय में समालोचकों ने बहुत कुछ लिखा है , परन्तु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उन्नीसवीं शताब्दी में नेपोलियन बोनापार्ट के बाद उसके समान कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था , जिसमें कार्य करने , विचारने एवं दृढ़ विश्वास की इतनी शक्ति हो जितनी उसमें थीं . इसलिए उसके व्यक्तित्व का जो प्रभाव यूरोप एवं अन्य देशों पर पड़ा , वह सहज ही में मिटने वाला नहीं है ।

जर्मनी के इतिहासकार उसे फ्रेडरिक महान् , लूथर तथा काल्विन के समान महान् मानते हैं . वह राष्ट्र निर्माता एवं युग सृष्टा था . उसके पतन के यूरोपीय इतिहास का एक युग समाप्त हुआ .

निष्कर्ष – Bismaark ka jeevan parichay
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