bhartendu harishchandra ka jeevan parichay
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bhartendu ka jivan parichay | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay | भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन परिचय

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा भारतेन्दु युग की स्थापना


bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : आधुनिक हिन्दी साहित्य के युग निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र उन महान् लेखकों में से हैं । जो जिस समय इतिहास में होते हैं । उसी समय इतिहास भी बदल रहे होते हैं । भारतेन्दु एक सतत् जागरूक एवं कालदृष्टा साहित्यकार थे ।( bhartendu harishchandra ka jeevan parichay) हिन्दी साहित्य और भारतीय समाज में नवजागरण की चेतना जगाकर उन्होंने ऐसी गतिशील परम्परा का निर्माण किया । जो अनेक संदर्भों में आज भी प्रासंगिक है । अपने समकालीन लेखकों को साथ लेकर उन्होंने हिन्दी साहित्य में एक नए युग की आधारशिला रखी जिसे हम ‘ भारतेन्दु युग ‘ के नाम से जानते हैं ।

इस युग में साहित्य और समाज को लेकर जितनी चिन्ता , सक्रियता और संघर्ष भारतेन्दु तथा उसके समकालीन लेखकों में दिखाई पड़ता है । उतना सम्भवतः किसी अन्य युग में नहीं । डॉ . रामविलास शर्मा के शब्दों में , “ हम निःसंकोच यह कह सकते हैं कि वास्तव में ऐसा सजीव और चेतन युग एक ही बार आया है ।( bhartendu harishchandra ka jeevan parichay )


भारतेन्दु युग की पृष्ठभूमि | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : हिन्दी नवजागरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भूमिका पर अध्ययन – विश्लेषण से पूर्व तत्कालीन राजनीतिक , सामाजिक व आर्थिक स्थिति का परिचय प्रासंगिक होगा .
1. राजनीतिक स्थिति – सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद राजनीतिक दृष्टि से भारतेन्दु का समय एक हताशा का समय था । किन्तु इस हताशा के कारण राजनीतिक चेतना बिलकुल मन्द नहीं हुई थी ।

विद्रोह के बाद सम्पूर्ण भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश बन गया था । विजय से गर्वोन्नत ब्रिटिश शासक , , आर्थिक , शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में नई नई नीतियाँ लागू कर रहे थे . समय के साथ अंग्रेजों का शोषण , दमन और स्वार्थपूर्ण नीतियाँ • जितनी ही बढ़ती गईं , उतनी ही तेजी से देश में राष्ट्रीयता की चेतना भी बढ़ती गई । (bhartendu harishchandra ka jeevan parichay)

2. सामाजिक स्थिति- पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव , यातायात के साधनों का प्रसार तथा • मुद्रण कला के प्रचार – प्रसार के कारण समाज में एक अतिरिक्त सक्रियता लक्षित हो रही थी . ब्रह्म समाज , प्रार्थन समाज , आर्य समाज जैसी संस्थाएँ प्राचीन धर्म की नई – नई व्याख्याएँ कर उसे आधुनिक संदर्भ दे रही थीं । छूआछूत , प्रातिप्रथा , बालविवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध हो रहा था । साथ ही स्त्री शिक्षा , विधवा विवाह , स्त्री – पुरुष की भी इन संस्थाओं का विशेष आग्रह लक्षित हो रहा था ।

इसके साथ ही राष्ट्रीयता का नवोन्मेष भी इस युग की विशेष उपलब्धि थी , जिसने समाज के सभी वर्गों को एक स्वतन्त्र राष्ट्र की दिशा में सोचने को विवश किया । (bhartendu harishchandra ka jeevan parichay )भारतेन्दु के साहित्य में राष्ट्रीयता का यह नवोन्मेष विविध रूपों में मुखर रूप से दिखाई पड़ता है .

3. आर्थिक समय एवं हस्तकलाओं की स्थिति– आर्थिक दृष्टि से 18 वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध तक हिन्दी प्रदेश विकसित अवस्था में था । गाँव अपने आप में स्वतः पूर्ण आर्थिक इकाई थे . कृषकों की स्थिति महत्वपूर्ण थी ।

किन्तु जुलाहों , बढ़ई , लोहार , कुम्हार आदि का भी उल्लेखनीय स्थान था . हस्तकला पर आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग – धन्धों की दृष्टि से हिन्दी प्रदेश के कई नगर दूर – दूर तक प्रसिद्ध हो चुके थे . रत्नजड़ित आभूषणों , बारीक सूती रेशमी वस्त्रों , हाथी दाँत की मीनाकारी , वस्त्रों की रंगाई के अतिरिक्त काष्ठकला तथा वास्तुकला में भारत अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका था । अंग्रेजों की नीति आर्थिक सुधारों की कम , आर्थिक शोषण की अधिक थी , क्योंकि उन्होंने इस देश को आर्थिक उपनिवेश ही माना था ।

अतः औद्योगिक क्रान्ति के बाद अंग्रेजों की साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियों के चलते देश की आर्थिक स्थिति क्रमशः दयनीय होती गई ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay

नामभारतेन्दु हरिश्चन्द्र
जन्म9 सितम्‍बर, 1850
पितागोपालचन्द्र उपनाम ‘गिरधर
व्यवसाय कवि लेखक,रंगकर्मी, देशहितचिन्तक पत्रकार
राष्ट्रीयताभारतीय
शिक्षाघर पर ही हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला का अध्ययन
मृत्यु6 जनवरी, 1885
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लघु एवं कुटीर उद्योग – धन्धे सिमटने लगे और उनकी जगह कल कारखानों ने ले ली । हस्तकला की वस्तुओं से अधिक मशीन निर्मित वस्तुओं का महत्व बढ़ गया . यहाँ का कच्चा माल विदेश जाने लगा और विदेशी माल की देश में खपत बढ़ गई . इस तरह देश का धन विदेश जाने लगा . बार – बार पड़ने वाले दुर्भिक्ष ने भी देश को आर्थिक दृष्टि से कमजोर किया . कर बोझ , अकाल , महामारी तथा महाजनी शोषण की भयंकरता का उल्लेख भारतेन्दु ने अनेक स्थलों पर किया है . भारतेन्दु के समय तक अंग्रेज सामन्तीय व्यवस्था से आगे पूँजीवादी व्यवस्था अपना चुके थे ।

: इस तरह भारतेन्दु का समय राजनीतिक दृष्टि से राष्ट्रीयता के नवोन्मेष का समय था। अनेक आर्थिक सुधारों के बावजूद मध्यम तथा निम्न वर्ग विशेषकर कृषक वर्ग शोषण , अत्याचार और दमन से त्रस्त था ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay: सामाजिक दृष्टि से तत्कालीन समाज पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार – प्रसार तथा सुधारवादी आन्दोलन के कारण मध्यकालीन मूल्यों को त्यागते हुए आधुनिक मूल्यों की ओर धीरे – धीरे बढ़ रहा था . ऐसे संक्रमण के समय में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी साहित्य को मध्यकालीन चेतना से मुक्त कर पुनर्जागरण की नई चेतना से जोड़ा । 

हिन्दी कविता में प्राचीन और नवीन का सुन्दर सामंजस्य  : bhartendu harishchandra ka jeevan parichay


bhartendu harishchandra ka jeevan parichay: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मूलतः कवि थे । उनके सम्पूर्ण काव्य में प्राचीन और नवीन का सुन्दर समन्वय लक्षित होता है . उनकी ब्रजभाषा की कविताओं में प्राचीन काव्य प्रवृत्तियों का स्पष्ट अनुसरण दिखाई पड़ता है , तो खड़ी बोली हिन्दी कविताओं में नवीन काव्यधारा के प्रवर्तन का श्रेय भी उन्हीं को है . राजभक्त होते हुए भी वे देशभक्त थे . दास्यभाव की भक्ति के साथ ही उन्होंने माधुर्यभाव की भी अभिव्यक्ति की इतिवृत्तात्मक काव्य शैली के साथ ही उनके

काव्य में हास्य – व्यंग्य का पैनापन भी विद्यमान है . काव्य रचना के लिए ब्रजभाषा को उत्तम मानते हुए भी उन्होंने खड़ी बोली में ‘ दशरथ – विलाप ‘ जैसी कविताएँ लिखी . भारतेन्दु की काव्य रचनाओं को प्राचीन और नवीन – दो वर्गों में रखा जा सकता है । प्राचीन वर्ग की कविताएँ ब्रजभाषा में हैं और इनमें प्रायः भक्ति और शृंगार विषयक मध्यकालीन काव्य प्रवृत्तियों का ही अनुसरण किया गया है ।

भारतेन्दु स्वयं वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित थे . राधा – कृष्ण के प्रति उनकी समर्पण भावना निम्नलिखित पंक्तियों में देखी जा सकती हैं हम तौ श्रीवल्लभ को जानौ । सेवत वल्लभ – पद पंकज को , वल्लभ ही को ध्यानौ ।

माँगौ तो गुपाल सों , न माँगौ तो रीझौ तो गुपाल ही पै , खीझौ तो गुपाल ही सौ । गुपाल इस तरह उनके ब्रजभाषा काव्य में कृष्ण भक्ति की तन्मयता अपनी पूरी तरह सरसता के साथ विद्यमान हैं ।

भारतेन्दु की नवीन वर्ग की कविताएँ | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : भारतेन्दु की नवीन वर्ग की कविताएँ प्रायः खड़ी बोली आधुनिक नवजागरण को प्रतिध्वनित करती है . इनमें देशभक्ति , स्वभाषा , स्वराज और राष्ट्रीय चेतना प्रमुख हैं . कहीं अतीत के प्रेरणादायी प्रसंगों से , तो कहीं व्यंग्योक्तियों के हैं , उनकी विषयवस्तु माध्यम से भारतेन्दु ने युवा पीढ़ी को पुनर्जागरण का मंत्र दिया है . ‘ डूबत भारत नाथ बेगि जागो , अब जागो ‘ जैसे उद्बोधनों में उनकी प्रखर राष्ट्रीय चेतना को देखा जा सकता है . चूरन अमले सब जो खावै ।

दूनी रिश्वत तुरन्त पचावैं ॥ चूरन साहब लोग जो खाता ।
सारा हिन्द हजम कर जाता ॥ चूरन पुलिस वाले खाते । सव कानून हजम कर जाते ॥

व्यंग्य भारतेन्दु की कविताओं की प्रमुख शक्ति है . अंग्रेजी शासन , सामाजिक अन्धविश्वास और रूढ़ियों पर व्यंग्य करने के लिए उन्होंने काव्य शैली के नए – नए प्रयोग किए ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay :अमीर खुसरो की मुकरियों की तर्ज पर अंग्रेजी शासन पर लिखी एक व्यंग्योक्ति दृष्टव्य भीतर – भीतर सब रस चूसै । हँसि – हँसि के तन – मन धन मूसै । जाहिर बातन में अति तेज । क्यों सखि साजन , नहिं अंग्रेज | चूरन वाले की लोकप्रिय व्यंग्योक्तियाँ अंग्रेजी शासन पर कितना गहरा व्यंग्य करती

वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों के संदर्भ में भारतेन्दु की व्यंग्योक्तियाँ आज भी कितनी प्रासांगिक लगती हैं . बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि भारतेन्दु ‘ रसा ‘ उपनाम से उर्दू में शायरी भी करते थे . इस तरह उनका काव्य प्राचीन और नवीन काव्य प्रवृत्तियों का ही सुन्दर समन्वय नहीं है , बल्कि उसमें भाषा और शैलीगत विविधता का भी संगम दिखाई पड़ता है ।

वस्तुतः भारतेन्दु हिन्दी साहित्य में एक युग – सन्धि के चरित नायक थे । युग – सन्धि पर रहकर युग परिवर्तन का श्रेय भी उन्हीं को जाता है . विशेषतः ” काव्य के क्षेत्र में उनकी तुलना उस महान् साहित्यिक संगम से की गई है जहाँ लगभग सभी साहित्य धाराएँ मिलकर एक नवीन धारा को जन्म देती हैं , जो फैलते फैलते जीवन के प्रत्येक कोने को स्पर्श करने लगती हैं ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay: ” हिन्दी गद्य के प्रवर्त्तक भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य की परम्परा तीन शाखाओं में विभक्त थी – ब्रजभाषा गद्य , राजस्थानी गद्य और खड़ी बोली में रचित गद्य , ब्रजभाषा गद्य और राजस्थानी गद्य प्रायः धार्मिक कथावार्ताओं , टीकाओं , प्रेम – कहानियों तथा ऐतिहासिक कथाओं तक सीमित था . खड़ी बोली हिन्दू – उर्दू के झगड़े के कारण अपना स्थिर रूप नहीं बना सकी थी . यद्यपि भारतेन्दु स्वयं ब्रजभाषा संस्कार से मुक्त नहीं थे , तो भी उन्होंने गद्य के लिए खड़ी बोली हिन्दी को सशक्त माध्यम बनाने का प्रयास किया ।

हिन्दी गद्य के क्षेत्र में उन्होंने विषयवस्तु और भाषा शैली को लेकर क्रान्तिकारी परिवर्तन किए . वस्तुतः भारतेन्दु की प्रतिभा का स्पर्श कर खड़ी बोली अपना रूप स्थिर कर सकी . भारतेन्दु को हिन्दी गद्य का प्रवर्तक स्वीकारते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा , “ हिन्दी गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत ही चलता मधुर और स्वच्छ रूप दिया . इस प्रकार भाषा का निखरा हुआ शिष्ट सामान्य रूप भारतेन्दु की कला के साथ ही प्रकट हुआ . ” गद्य साहित्य में भारतेन्दु के ऐतिहासिक योगदान को निबन्धकार तथा नाटककार के रूप में देखा जा सकता है ।

निबन्धकार के रूप में – भारतेन्दु के अधिकतर निबन्ध पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्पादकीय लेखों के रूप में हैं . इन सम्पादकीय लेखों को निबन्ध न मानने वाले आलोचकों ने भारतेन्दु को निबन्धकार ही नहीं माना है . डॉ . लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय , भारतेन्दु के लेखों को निबन्ध न कहकर लेख कहना अधिक ‘ युक्तिसंगत ‘ समझते हैं ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : इसी आधार पर वे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बजाय पं . बालकृष्ण भट्ट को हिन्दी का प्रथम निबन्धकार मानते हैं , किन्तु अधिकांश आलोचकों का मत यही है कि भारतेन्दु से ही हिन्दी निबन्ध का प्रारम्भ हुआ , उनके निबन्ध , निबन्ध विधा के प्राथमिक प्रयास होते हुए भी सच्चे निबन्ध के आवश्यक गुणों विद्यमान हैं ।

निबन्ध और लेख के सूक्ष्म अन्तर में यदि न पड़ा जाए , तो यह कहा जा सकता है कि की निबन्ध को विषय और भाषा – शैली की दृष्टि से विविध भावभंगिमा से समृद्ध करने में न्दु का ऐतिहासिक योगदान रहा है , भले ही उसे प्रारम्भिक प्रयास के रूप में देखा जाए ।

भारतेन्दु के निबन्धों में विषय वैविध्य उल्लेखनीय है । पुरातत्व , इतिहास , धर्म , कला , • समाज सुधार , राष्ट्रीयता , देशप्रेम , यात्रा – जीवनी वृत्तान्त , भाषा – साहित्य आदि अनेक विषयों पर भारतेन्दु ने निबन्ध लिखे . इनमें से अधिकांश निबन्ध अपने पाठक वर्ग को सम्बोधित कर स्वच्छन्द मनःस्थिति में लिखे गए हैं . इनके लेखन का मुख्य उद्देश्य नई चेतना जगाने के साथ ही उद्बोधन एवं मनोरंजन भी है ।

इसलिए इसमें गम्भीर विचार विश्लेषण के लिए अवकाश नहीं है । आत्मीयतापूर्ण , सुगम और सुबोध अभिव्यक्ति ही इनकी मुख्य विशेषता है . अपने परिवेश के प्रति सक्रिय और सतत् जागरूकता भारतेन्दु के निबन्धों में देखी जा सकती है । इसलिए उनकी ‘ निजता ‘ की जितनी स्पष्ट छाप निबन्धों में देखी जा सकती है , उतनी अन्य विधाओं में नहीं । (bhartendu harishchandra ka jeevan parichay )

भारतेन्दु के निबन्धों को निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –


1. पुरातत्व सम्बन्धी – गौरवपूर्ण भारतीय अतीत का परिचय देने तथा तत्सम्बन्धित कुछ भ्रान्तियों का निवारण करने के लिए भारतेन्दु ने पुरातत्व सम्बन्धी निबन्ध लिखे . इनमें राजा जनमेजय का दानपत्र , मणिकर्णिका और काशी , इण्डियन म्यूजियम आदि निबन्ध उल्लेखनीय हैं । ( bhartendu harishchandra ka jeevan parichay )


2. ऐतिहासिक – इतिहास के प्रति विशेष रुचि के कारण भारतेन्दु ने अनेक प्रसिद्ध ऐतिहासिक निबन्ध लिखे , जैसे- महाराष्ट्र का इतिहास , अग्रवालों की उत्पत्ति , बूँदी का राजवंश , खत्रियों की उत्पत्ति , अकबर और औरंगजेब , रामायण का समय , पुरावृत्त संग्रह .


3. धार्मिक – मार्ग शीर्ष महिमा , वैष्णव सर्वस्व , तदीय सर्वस्व , माघ स्नान विधि , हिन्दी कुरान – शरीफ , ईशु खीष्ट आदि धार्मिक निबन्धों की रचना भारतेन्दु ने विविध धर्मों में परस्पर परिचय एवं सद्भाव स्थापित करने के उद्देश्य से की थी ।


4. यात्रा सम्बन्धी – भारतेन्दु ने अनेक तीर्थ यात्राएँ की यात्राओं के सजीव वर्णन के साथ ही इन निबन्धों में स्थान विशेष के रीति – रिवाज , बोलचाल , सामाजिक व धार्मिक मान्यताएँ आदि की भी रोचक जानकारी मिलती है . बैजनाथ की यात्रा , लखनऊ की यात्रा , हरिद्वार की यात्रा मेंहदावल की यात्रा निबन्ध उल्लेखनीय हैं ।


5. जीवनीपरक निबन्ध – भारतेन्दु ने शंकराचार्य , जयदेव , वल्लभाचार्य , नेपोलियन , राजाराम शास्त्री , लार्ड मेयो , बीबी फातिमा , अली इमाम हसन जैसी सुकरात , विभूतियों पर सरल सुबोध शैली में जीवनीपरक निबन्ध लिखे ।


6. हास्य – व्यंग्य प्रधान – जिन्दादिली और विनोदी प्रवृत्ति भारतेन्दु के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता थी . यह विशेषता उनके हास्य – व्यंग्य प्रधान निबन्धों में मुखरित हुई हैं . इन निबन्धों में समाज में व्याप्त अन्धविश्वास और पाखण्ड तथा अंग्रेजी शासन की कुटिल नीतियों पर तीखे और चुभते हुए व्यंग्य किए गए हैं . कंकड़ स्रोत , अंग्रेज स्रोत , पाँचवें पैगम्बर , , लेवी प्राण लेवी , एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न निबन्ध इस कोटि के हैं।


7. आलोचनापरक – नाटक , हिन्दी भाषा , सूरदास , जयदेव , सम्पादक के नाम – पत्र आदि निबन्ध आलोचनापरक हैं . ‘ नाटक ‘ निबन्ध में भारतेन्दु ने प्राचीन भारतीय नाट्य शास्त्र तथा पाश्चात्य नाट्य कला के सिद्धान्तों का गम्भीर तात्विक विवेचन किया है .

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इसी प्रकार ‘ सम्पादक के नाम – पत्र में उन्होंने स्वयं प्रतिपादित चार रसों भक्ति , सख्य , वात्सल्य और आनन्द की स्थापना के सम्बन्ध में पुष्ट तर्क दिए हैं ।

इसके अतिरिक्त सबै जाति गोपाल की , स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन जैसे प्रहसन निबन्ध भी भारतेन्दु जी ने लिखे , इनमें लेखक की सर्जनात्मक कल्पना का चमत्कार दर्शनीय भारतेन्दु के निबन्धों की भाषा शैली विषय के अनुरूप अपनी भावभंगिमा ग्रहण करती रही है . पाण्डित्यपूर्ण और गम्भीर विचारों की अभिव्यक्ति में संस्कृत गर्भित भाषा प्रयुक्त हुई है . सामान्यतः उन्होंने बोलचाल की भाषा को ही अपनाया है ।

भारतेन्दु ने बोलचाल की भाषा को व्यवस्थित और परिमार्जित कर निखरा रूप प्रदान किया है . उसमें पूर्ण आत्मीयता का भाव है . व्यंग्य और हास – परिहास भारतेन्दु की भाषा की विशेषता है . कहा जाता है कि भाषा में हास्य और व्यंग्य का पुट सर्वप्रथम भारतेन्दु ने ही दिया ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : शैली की दृष्टि से किसी विशेष शैली के प्रति उनका आग्रह नहीं दिखाई पड़ता . उन्होंने अपनी स्वच्छन्द भावाभिव्यक्ति में विविध शैलियों को अपनाया . एक सम्पादक के नाते अपने लेखों द्वारा पाठकों से घनिष्ठ आत्मीयता और निकटता बनाने का प्रयास भारतेन्दु के निबन्धों को सफल बनाता है ।

यही उनके निबन्धकार के व्यक्तित्व की सफलता का मूल रहस्य भी है . उनके निबन्धों की दूसरी बड़ी विशेषता उनके माध्यम से प्रकट होने वाला राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण इस दृष्टि से भारतेन्दु के निबन्ध तत्कालीन जनजीवन की चेतना से सीधे जुड़े हुए हैं . साहित्यिक सौष्ठव की दृष्टि से भारतेन्दु के निबन्धों को भले ही उच्चकोटि का न माना जाए , किन्तु इससे उनका ऐतिहासिक महत्व कम नहीं हो जाता ।

अपने निबन्धों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी गद्य साहित्य को आधुनिक जीवन बोध से जोड़ा . उनके निबन्धों में नए भारत का स्वर प्रतिध्वनित है . यह क्या कम है ? हैं ।

भारतेन्दु के नाटक और विशेषता | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay


भारतेन्दु के नाटक काफी महत्वपूर्ण हैं । उनके नाटकों में ऐतिहासिक आख्यान हैं , देश की दुर्दशा का करुण चित्रण है , नवजागरण का आह्वान है , देशी रजवाड़ों के कुचक्रों का खुलासा है तथा धार्मिक – सामाजिक पाखण्डों पर गहरे व्यंग्य हैं ।

भारतेन्दु के नाटकों की प्रमुख विशेषता यह है कि बंगला नाटकों की तरह उन्होंने प्राचीन नाट्य शैली को एकदम छोड़कर अंग्रेजी नाटकों की नकल नहीं की और न ही प्राचीन नाट्यशास्त्र की जटिलता में स्वयं फँसे . लोक तत्वों की प्रमुखता ही उनके नाटकों की विशेषता है जिसके कारण उनके नाटक शिक्षित और सामान्य जन में समान रूप से लोकप्रिय हो सके . भारतेन्दु ने कुल सत्रह नाटक लिखे ।

इनमें कुछ अनुवाद भी हैं । पौराणिक नाटकों की संख्या अधिक है ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay :पाश्चात्य ट्रेजडी की शैली में दुःखांत नाटकों की परम्परा का श्रीगणेश सर्वप्रथम भारतेन्दु ने ही किया था . भारतेन्दु ने अपने समय में प्रचलित फारसी थियेटरों की हीन रुचि वाले नाच – गानों से भरपूर नाटकों का प्रबल विरोध किया। नाटकों द्वारा केवल मनोरंजन करना ही भारतेन्दु का मुख्य उद्देश्य न था , वल्कि वे जनमानस को जाग्रत करने के प्रबल पक्षधर थे ।

इसीलिए उनके नाटकों में मानवीय मूल्यों के प्रति गहरी आस्था और विदेशी शासन के प्रति तीखा व्यंग्य विद्रोह एकसाथ दिखाई पड़ता है , वे राष्ट्रीय भावना और नवजागरण की चेतना के सशक्त संवाहक हैं ।

भारतेन्दु ने नाटक लिखे और नाटकों में अभिनय: bhartendu harishchandra ka jeevan parichay

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay भारतेन्दु ने नाटक लिखे और नाटकों में अभिनय भी किया . इतना ही नहीं , नाट्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ ‘ नाटक ‘ की भी रचना की । अपने अन्तिम दिनों में वे उपन्यास लिखने की ओर प्रवृत्त हुए , किन्तु असमय निधन के कारण इस दिशा में कुछ न कर सके ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : उन्होंने केवल ‘ पूर्ण प्रकाश और चन्द्रप्रभा ‘ नामक उपन्यास लिखा जो मराठी उपन्यास का रूपान्तर था । पत्रकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘ गर तोप सामने हो , तो अखबार निकालो ‘ इस उक्ति को भारतेन्दु ने ही नहीं , उनके समकालीन अधिकतर लेखकों ने चरितार्थ किया । विदेशी शासन की तोप और बन्दूक से लड़ने का पत्र – पत्रिकाओं से अच्छा साधन क्या हो सकता था ?

हालांकि भारतेन्दु ने इस लड़ाई की अच्छी कीमत भी चुकाई . उन्हें अनेक बार ब्रिटिश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा . एक पत्रकार के रूप में भारतेन्दु का एकमात्र उद्देश्य था । सामाजिक तथा राष्ट्रीय उन्नति तथा जातीय स्वाभिमान को जगाना वे मानते थे कि ” जिस देश में और जिस समाज में उसी समाज और उसी देश की भाषा में समाचार पत्रों का जब तक प्रचार नहीं होता , तब तक उस देश और समाज की उन्नति नहीं हो सकती ।

समाचार पत्र राजा और प्रजा के बीच वकील है . दोनों की खबर दोनों को पहुँचा सकता है । जहाँ सभ्यता है , वहीं स्वाधीन समाचार – पत्र है . ” सन् 1868 ई . में भारतेन्दु ने ‘ कवि वचन सुधा ‘ का प्रकाशन कर हिन्दी पत्रकारिता को भारतीय जनजीवन के साथ जोड़ा . यहीं से हिन्दी पत्रकारिता के नए संदर्भ उभरे ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay: ‘ कवि वचन सुधा ‘ में पहले तो प्राचीन कवियों की रचनाएँ छपती थीं . उसमें कुछ सामग्री पद्य रूप में भी होती थी , किन्तु बाद में यह पत्र पूर्णतः गद्य में प्रकाशित होने लगा . पहले मासिक , फिर पाक्षिक और शीघ्र ही यह साप्ताहिक हो गया ।

इससे ‘ कवि वचन सुधा ‘ की लोकप्रियता का सकता है . प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान् गास द तासी ने अपने पत्र ‘ ली लैग्यू ’ बारे में लिखा है , ” बाबू हरिश्चन्द्र हिन्दी साहित्य के लिए सदा उत्साही रहे . हिन्दी कार्यों को पृथक् रूप से अपने ‘ कवि वचन सुधा ‘ में प्रकाशित करते रहे ।

” अनुमान किया जा में इस पत्र के ‘ कवि वचन सुधा ’ में ‘ नारि नर सम होहिं ‘ कहकर भारतेन्दु ने उस समय स्त्री – पुरुष की समानता की आवाज उठाई जब नारी समाज अपनी अधोगति की अवस्था में था . कांग्रेस का तब जन्म भी नहीं हुआ था , तब ‘ स्वत्व निज भारत गहै ‘ की उद्घोषणा करके भारतेन्दु ने ‘ स्वराज ’ की अलख जगाई थी . इस प्रकार राष्ट्रीय चेतना के जागरण में ‘ कवि वचन सुधा ‘ का अप्रतिम योगदान है ।

अन्ततः इस पत्र को सरकार के कोप का भाजन बनना पड़ा और सन् 1885 में प्रकाशित होना बंद हो गया . सन् 1873 में भारतेन्दु ने ‘ हरिश्चन्द्र मैंगजीन ‘ नामक दूसरा पत्र निकाला , वह मासिक पत्र था . एक वार पुनः इसने पत्र जगत् में धूम मचाई और काफी लोकप्रिय हुआ ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay :इसमें हिन्दी के अलावा अंग्रेजी और संस्कृत में भी रचनाएँ होती थीं . आगे चलकर ‘ हरिश्चन्द्र मैंगजीन ‘ का नाम बदलकर ‘ हरिश्चन्द्र चन्द्रिका ‘ , बाद में ‘ हरिश्चन्द्र निवेदिता ‘ हो गया . इस पत्र में राष्ट्रीय भावना , सामाजिक विषय के साथ विज्ञान और इतिहास सम्बन्धी ज्ञानवर्धक लेख प्रकाशित होते थे । (bhartendu harishchandra ka jeevan parichay)

एकता के सम्बन्ध में प्रकाशित एक लेख की ये पंक्तियाँ आज भी कितनी प्रासांगिक हैं ?

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay:  ” धर्म और व्यवहार को एक में न सानो तैंतीस करोड़ मनुष्य और तैंतीस करोड़ देवताओं को अलग – अलग मानो जहाँ त्यौहार का काम पड़े , सब एक – एक हो जाओ और जब अपने हित की बात आवे तब एक – सी आवाज दो . ” ब्रिटिश सरकार के प्रति तीखे व्यंग्य लेखों के कारण इस पत्रिका को भी सन् 1884 में बन्द होना पड़ा . इसके अतिरिक्त बाल पाठशालाओं के लिए ‘ बाल बोधिनी ‘ पत्रिका का प्रकाशन भी भारतेन्दु ने किया ।

इसमें स्त्री शिक्षा के लिए भी पर्याप्त सामग्री होती थी . यह पत्रिका भी चार वर्ष तक प्रकाशित हुई ।

वस्तुतः हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में भारतेन्दु का विशिष्ट महत्व इसलिए भी है कि उन्होंने अभिव्यक्ति के तमाम खतरों का सामना करते हुए मृत्यु- पर्यन्त राष्ट्रीय चेतना के प्रचार – प्रसार के लिए अपनी पत्रिकाएँ निकालीं ।

साथ ही अपने समकालीन अनेक लेखकों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करते रहे . निबन्ध , जीवनी , इतिहास – पुरातत्व , यात्रा – वृत्त और ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों पर पत्र – पत्रिकाओं के माध्यम से ही भारतेन्दु ने लेख लिखे . इस आधार पर कहा जा सकता है कि पत्रिकाओं द्वारा भारतेन्दु ने हिन्दी के प्रत्येक अभाव को दूर करने का भरसक प्रयास किया ।

भारतेन्दु की भाषाई चेतना | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : भारतेन्दु के समय में भाषा को लेकर अत्यन्त खींचतान चल रही थी . एक तरफ अंग्रेजी अपने पैर जमा रही थी , तो दूसरी तरफ उर्दू भी अपने कट्टर पक्षधरों के द्वारा सामने आ रही थी . हिन्दी का कोई स्वरूप स्थिर नहीं था ।

ऐसे समय में भारतेन्दु ने हिन्दी के उत्थान का बीड़ा उठाया . उन्होंने भाषा सम्बन्धी साम्राज्यवादी और फूट डालने वाली अंग्रेजों की नीति को भी अच्छी तरह समझा . इसीलिए उन्होंने कहा – “ निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल । बिन निज भाषा ज्ञान के , मिटत न हिय को सूल ॥

” भारतेन्दु ने ‘ निज भाषा ‘ कहकर केवल हिन्दी का ही समर्थन नहीं किया , बल्कि सभी भारतीय भाषाओं का समर्थन किया . भारतेन्दु की हिन्दी जनसामान्य की भाषा थी . अरबी – फारसी के बोलचाल के शब्दों से उन्हें कोई परहेज न था , किन्तु इन शब्दों के बलातु प्रयोग के वे हिमायती न थे ।

साथ ही जनपदीय बोलियों के शब्दों के प्रति भी उनका अनुरंग था . इस तरह भारतेन्दु ने खड़ी हिन्दी को एक नई चाल में ढालने की कोशिश की और इसमें वे सफल भी हुए ।

इस नई चाल की हिन्दी ने एक बड़ी ऐतिहासिक आवश्यकता की पूर्ति की . आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार , भारतेन्दु की मँजी हुई परिष्कृत भाषा से ही जनता को गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रकृत साहित्यिक रूप मिल गया और भाषा का स्वरूप स्थिर हुआ .

अंग्रेजों की भाषा नीति के विरुद्ध भारतेन्दु की भाषा | bhartendu harishchandra ka jeevan parichay


: अंग्रेजों की भाषा नीति के विरुद्ध भारतेन्दु की भाषा नीति जातीय संस्कृति और जातीय भाषा के उत्थान की नीति थी . हिन्दी तथा अन्य प्रादेशिक भाषाओं के विकास के सन्दर्भ में भारतेन्दु के इस कथन पर आज भी ध्यान देने की जरूरत है “ विविध कला , शिक्षा अमित , ज्ञान अनेक प्रकार | सब देसन से लै करहु , भाषा माँहि प्रचार ॥

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : ” कुछ आलोचक भारतेन्दु को उर्दू विरोधी मानते हैं , किन्तु उर्दू से उनका कोई विरोध नहीं था । हाँ , वे उर्दू के अरबी और फारसीकरण के उतने ही विरोधी थे जितने कि हिन्दी के संस्कृतीकरण के . भारतेन्दु ने ‘ रसा ‘ उपनाम से अपनी गजलों का संकलन ‘ गुलजारे पुरबहार ‘ प्रकाशित किया ।

मुशायरों में वे काफी भाग लेते थे . अतः उन पर उर्दू के विरोधी होने का आरोप तथ्यहीन है . हिन्दी भाषा और साहित्य की अनेक विधाओं में भारतेन्दु के योगदान को देखते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य में नवजागरण का सूत्रधार कहा जा सकता है ।

अपनी बहुमुखी प्रखर मेधा से उन्होंने भाषा , साहित्य , समाज , राजनीति , धर्म – सभी क्षेत्रों में नई चेतना का संस्कार किया . अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका के कारण वे हिन्दी गद्य के युग प्रवर्तक , युग निर्माता आदि विशेषणों से विभूषित हुए . निष्कर्षतः राष्ट्रीय चेतना से ओत – प्रोत नवजागरण के लिए किए गए भारतेन्दु के प्रयास अपनी सम्पूर्ण सार्थकता के साथ हमारे लिए आज भी प्रासांगिक हैं ।

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay : निष्कर्ष

bhartendu harishchandra ka jeevan parichay मे हमने bhartendu harishchandra के बारे में जाना है। bhartendu harishchandra ka jeevan parichay हम भारत वासी के लिए bhartendu harishchandra ka jeevan parichay गर्व की बात है।

भारतेन्दु के मृत्यु कब हुई?

6 जनवरी, 1885

भारतेन्दु का जन्म कब हुआ?

9 सितम्‍बर, 1850