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babu gulab rai ka jeevan parichay | बाबू गुलाबराय बायोग्राफी, babu gulab rai ka jeevani, birthday, biography

बाबू गुलाबराय का जीवन परिचय

babu gulab rai ka jeevan parichay : पूरे बाँह की कमीज , धोती , गले से दोनों घुटनों तक लटकती चादर , गौर वर्ण , चेहरे पर श्वेत ‘ भूरी मूँछें ‘ ’ , ‘ आँखों पर ढीला साधारण चश्मा , केशविहीन चमकती चाँदनी जिससे मिला उच्चतर दिखता चमचमाता ललाट , कानों और गर्दन को घेरता सफेद बालों का पट्ठा , सौम्य , गम्भीर मुखमण्डल – शब्द – रेखाएँ खींचती हैं- एक ऐसे व्यक्तित्व का बिम्ब , जो मैदानी सरिता के समान था ।

जिसने अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी कोई राह नहीं बदली तथा जो सदैव मंद मंद , मंथर – मंथर गति से प्रवाहमान रहा । वह अनमोल व्यक्तित्व था- बाबू गुलावराय वाबूजी हिन्दी , अंग्रेजी , संस्कृत और बंगला भाषा के विद्वान् थे । दर्शनशास्त्र और काव्यशास्त्र के सुजाता थे और ये साहित्य के गूढ़ गम्भीर विषयों को सुबोध शैली में हृदयंगम करा देने की कला में निरूपमेय निष्णात । द्विवेदीयुगीन नैतिक सांस्कृतिक परम्परा के प्रकर्ष प्रतिनिधि , शुद्ध , निबन्धकार , श्रेष्ठ गद्य शैलीकार बाबू गुलाबराय का व्यक्तित्व हिन्दी के एक सरस एवं सहज आलोचक के रूप में प्रसिद्ध रहा है ।

babu gulab rai ka jeevan parichay :प्रकृति से वह दार्शनिक थे , परन्तु हिन्दी की सेवा करते समय उनकी यह दार्शनिकता हिन्दी के निवन्ध और आलोचना साहित्य को एक विशिष्ट आलोक देने में समर्थ हुई है । बाबूजी की लेखनी ने जहाँ एक ओर गम्भीर चिन्तन की मुक्तमालिकाएँ गुम्फित की , वहीं दूसरी ओर विशुद्ध विनोद की सुमनांजलियाँ भी तैयार की दोनों का अपना – अपना माधुर्य और अपना – अपना मूल्य है तथा दोनों ही अपने – अपने क्षेत्र में महिमामय हैं।

बाबू गुलाबराय का जीवन परिचय चार्ट

नामबाबू गुलाबराय
जन्म17 जनवरी 1888,
जन्म स्थानजलेसर- इटावा नगर के छपैटी मुहल्ले में
मृत्यु13 अप्रैल 1963,
मृत्यु स्थानआगरा
माता पितागोमती देवी, बाबू भवानी प्रसाद
योगदानभारतीय लेखन कला में
शिक्षाएम. ए. (दर्शनशास्त्र) आगरा कॉलेज , सेंट जौन्स कॉलेज से
आत्मकथामेरी असफलताएँ’
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बाबू गुलाबराय का जीवन व्यक्तित्व

babu gulab rai ka jeevan parichay:  बाबू गुलाबराय जहाँ एक ओर अप्रतिम हास्य निबन्ध लेखक , उच्चकोटि के दार्शनिक , सुधी समालोचक और सफल अध्यापक थे , वहीं इन सबके ऊपर बाबूजी एक अत्यन्त उदारमना सन्त थे । दर्शन के महान् पण्डित होकर , बुद्धि का अखण्ड वैभव पाकर तथा मेघा

babu gulab rai ka jeevan parichay :  व्यक्तित्व की गहन चिन्तनशीलता पाकर भी उनमें सरसता का अजस स्रोत बहता था . उन्होंने आत्म विश्लेषण में लिखा भी है- ‘ मेरी आलोचना खीर और मक्खन की सी मीठी , स्निग्ध और मुलायम होती है . ‘ कहीं – कहीं व्यंग्य का बादाम निकल आता है । यद्यपि मैं स्वार्थी अवश्य रहा हूँ तथापि मैंने परकीर्ति को नष्ट करके कीर्ति नहीं चाही है ।

स्वार्थी होकर भी सिद्धान्ततः मानवतावादी रहा हूँ । ‘ परहित निरत निरन्तर मन क्रम वचन नेम निवहोगो ‘ के संकल्प को तो आलस्य और स्वार्थवश न निभा सका , किन्तु ‘ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ‘ की मानसिक शिव – संकल्प चारपाई पर पड़े – पड़े कम – से – कम अपने स्वजनों के लिए अवश्य कर लेता हूँ , ( मेरे निबन्ध , जीवन और जगत् , पृष्ठ 13 ) इससे स्पष्ट होता है कि वह कभी दूसरे की हानि नहीं करते थे और सदैव दूसरों का भला करने के लिए ही तत्पर रहते थे ।

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बाबू गुलाबराय का जन्म और शिक्षा कब और कहाँ हुआ?

babu gulab rai ka jeevan parichay : हिन्दी के अनेक प्रख्यात साहित्य – सृजकों के निर्माण में बाबूजी का प्रेरणामयी हाथ था । दिव्य अनुभूति और प्रौढ़ मनीषा से सम्पृक्त बाबू गुलाबराय का पैतृक घर उत्तर प्रदेश के जलेसर में था , लेकिन इटावा नगर के छपैटी मुहल्ले में उन्होंने जन्म लिया । आगरा कॉलेज , सेंट जौन्स कॉलेज से बी.ए. ( सन् 1911 ) एम . ए . और एल.एल.बी. ( सन् 1913 ) की परीक्षा उत्तीर्ण की । बाबूजी शिक्षा समाप्त करके सन् 1913 में छतरपुर महाराजा के प्राइवेट सेक्रेटरी नियुक्त हुए और वहाँ सन् 1932 तक रहे ।

babu gulab rai ka jeevan parichay : तत्पश्चात् आगरा जैन बोर्डिंग हाउस में रहे और सेंट जौन्स कॉलेज में अवैतनिक हिन्दी के प्रोफेसर हुए । उनकी पहली पुस्तक ‘ शान्तिधर्म ‘ सन् 1913 में प्रकाशित हुई । लेखन का यह सिलसिला 50 वर्ष तक अनवरत् चलता रहा । बाबू गुलाबराय ने काव्य की परम्पराओं के अध्ययन और सामाजिक रचनाओं के अनुशीलन के उपरान्त अपने अनुभव अनुस्यूत निष्कर्षों को सिद्धान्तों के रूप में प्रस्तुत किया ।

बाबू गुलाबराय के रचना का विशेषता

babu gulab rai ka jeevan parichay : बाबूजी के साहित्यादर्श के अभिदर्शन उसके ‘ सिद्धान्त और अध्ययन ‘ , ‘ काव्य के रूप ‘ , ‘ नवरस ‘ , ‘ अध्ययन और आस्वाद ‘ , ‘ साहित्य समीक्षा ‘ , ‘ हिन्दी नाट्य विमर्श ‘ , ‘ हिन्दी व् विमर्श ’ , ‘ हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास ‘ ग्रन्थों में होते हैं ।

babu gulab rai ka jeevan parichay : इन कृतियों में बाबूजी सिद्धान्त- विवेचक और व्याख्याता के रूप में सामने आते हैं । ‘ जीवन रश्मियाँ ‘ , ‘ मेरे निबन्ध ‘ , ‘ मेरी असफलताएँ ’ , कुछ उथले हुए कुछ गहरे रचनाएँ बाबूजी के जीवन की मान्यताओं , विचारधाराओं और कार्यक्षेत्रों को प्रतिबिम्बित करती हैं । ‘ राष्ट्रीयता ‘ , ‘ अभिनव ‘ , ‘ भारत के प्रकाश स्तम्भ ’ , ‘ सत्य एवं स्वतंत्रता के उपासक ’ , ‘ भारतीय संस्कृति की रूपरेखा ’ व ‘ मन की बातें ‘ पुस्तकों में आदर्श महापुरुषों के जीवन को शब्दित किया गया है । इस प्रकार चिन्तन , मनन , अध्ययन और उपस्थापन की भित्ति विशुद्ध भारतीय है ।


अतएव उनके सिद्धान्तों में बल है , शक्ति है , आर्जवभाव है । वस्तुतः काव्यशास्त्र के पुन राख्यानकाल में बाबूजी की हिन्दी को यह महान् देन है । हिन्दी आलोचना और हिन्दी निबन्ध साहित्य के क्षेत्र में बाबू गुलाबराय की सेवाएँ अनन्य हैं । बाबू गुलाबराय का सम्पूर्ण साहित्य , उनकी गहन अनुभूति , उत्कट साहित्य प्रेम , तीव्र लगन एवं अपार सामर्थ्य का द्योतक है ।

बाबू गुलाबराय के गुण व लेखन कला

babu gulab rai ka jeevan parichay : यह कलम के सिपाही थे , विचारों के धनी थे और लेखन कला में पूर्णनिष्णात  थे । बाबू गुलाबराय में सम्पादन कार्य की अद्भुत क्षमता थी । ‘ साहित्य संदेश ‘ जैसा आलोचनात्मक मासिक – पत्र बाबूजी की ही अनवरत् साधना का सुखद परिणाम था- साहित्यिक प्रवृत्तियों के प्रेरक महारथी आचार्य पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की इस मंगलकामना

babu gulab rai ka jeevan parichay :  साहित्यस्य समृद्धिश्च लोकानां रजन तथा , कृत्वा साहित्य सन्देश तिष्ठत्वं शरदां शतम् ये ‘ साहित्य संदेश ‘ का प्रथम अंक जुलाई 1937 में बाबू गुलाबराय के अथक प्रयास से प्रकाशित हुआ और इस मासिक – पत्र के प्रकाशक व्यवस्थापक थे ।  साहित्य प्रेमी श्री महेन्द्रजी जैन , आगरा . बाबू गुलावराय के मन – मानस पर गांधीवादी नैतिकता की अतिशय प्रभावना थी ।

गांधीवादी अहिंसात्मक नैतिकता ने बाबूजी को समन्वय की ओर उन्मुख किया। समन्वयवादी होने से उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया जिससे वह जीवन और साहित्य में दो अंतियों से सर्वथा विमुक्त रह सके । बाबूजी ने आस्था और अनास्था , परुष और कोमल , नवीन और प्राचीन , रूढ़ि और प्रगति एवं भौतिकता तथा आध्यात्मिकता को समन्वयकारी दृष्टिकोण से देखा , परखा और प्रस्तुत किया ।

निष्कर्ष

babu gulab rai ka jeevan parichay : इसमें बाबूजी के मन की सर्वोदयी भावना मुखर रही । आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी के शब्दों में , ” बाबूजी समरसता के प्रेमी थे जो प्रत्येक साहित्यिक आन्दोलन में सार रूप में विद्यमान रहती है । गुण – ग्राहकता उनकी प्रमुख विशेषता थी । नदियों की बाढ़ जब शामित हो जाती है , तब उसका जल पेय होने लगता है । बाबूजी इस परिशमित साहित्य जल के पानकर्ता थे ।

उनकी वृत्ति सच्चे अर्थों में मधुकर वृत्ति थी और यदि ‘ मधुकर सरिस सन्त गुन गाहा ‘ वाक्य किसी साहित्यज्ञ के लिए प्रयुक्त हो सकता है , तो वह बाबू गुलावराय के लिए निःसंशय प्रयुक्त होने योग्य है । ” वाजपेयीजी के ये शब्द बाबूजी साहित्यिक उच्चाशय का स्पर्श करते हैं । बाबू गुलावराय बीसवीं शती के हिन्दी गद्य लेखकों में अपनी सहृदयता , उदारता , समन्वयशीलता और अविरोधी दृष्टि के कारण समादृत रहे । वस्तुतः द्विवेदीयुगीन शैली में अधुनातन विचारों का प्रतिपादन करने वाले हिन्दी साहित्य के निर्मत्सर सेवी बाबू गुलाबराय की देन महनीय है ।

बाबू गुलाब राय किस युग के निबंधकार हैं ?

बाबू गुलाबराय द्विवेदी युग

बाबू गुलाबराय का भाषा-शैली बताये।

गुलाबराय जी की भाषा शुद्ध तथा परिष्कृत खड़ी बोली है।