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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य adi shankaracharya Jayanti

adi shankaracharya jayanti : आदिकाल से भारतीय वसुन्धरा अनगिनत ऋषि – मुनियों के पदचाप से गौरवान्वित होत रहीं है । इन्हीं संत , महर्षियों के पुण्य प्रताप से भारतीय संस्कृति अमरवेल की भाँति अजर अमर रही है और अनेक आपात स्थितियों को भी सहन करती रही है। जब देश राजनीतिक दृष्टि से भिन्न – भिन्न टुकड़ों से विभाजित था । धार्मिक दृष्टि से प्रमुख धर्मों के आचार्यों द्वार प्रतिपादित मर्यादाएँ उनके अपने – अपने समर्थकों द्वारा विध्वंस हो रही थीं । बौद्ध धर्म जो किस समय अपने नैतिक और वौद्धिक आदर्शों के लिए श्रेष्ठ माना जाता था । adi shankaracharya jayanti

कालान्तर में द्वेष विद्वेष का केन्द्र वन गया था । मर्यादाएँ टूट चुकी थीं । बौद्ध धर्म की आत्मा का हनन हो चुक भिक्षु – भिक्षुणियाँ विलासी हो गए थे । वैदिक क्रियाकाण्ड जनमानस की चेतना पर प्रभाव हो चला था । सामाजिक मान्यताएँ धाराशायी हो रही थीं । नैतिकता , जिसके सहारे भारत को कभी विश्वगुरु की उपाधि मिली थी ।

पतनोन्मुख हो चली थी । भक्ति , आस्था एवं प्रेरणा के केन्द्र – मठ एवं आश्रम पाखण्ड एवं भ्रष्टाचार के अड्डे वन गए थे । चारों तरफ विद्वेष की ज्वाला धधक रही थी । ऐसी ही विषम , आपदापूर्ण स्थिति में एक महामनीषी के पदार्पण से धरा कृतार्थ हो उठी । सारे भूमण्डल की सुपुप्तावस्था पर तुषारापात हुआ । जनभावना प्रस्फुटित हो उठी । नैतिक चेतना पुनः खिल उठी । जागरण के अमरगीत गुंजरित हो उठे ।

adi shankaracharya biography jayanti

शुभ नामजगद्गुरु आदि शंकराचार्य
जन्म788 ई .
जन्म स्थानकेरल प्रान् के कालड़ी ( कालन्दी ) ग्राम
माता-पिता आर्याम्विका – शिवगुरु
ग्रन्थ8
उपनिषदों12
गुरुआचार्य गोविन्द भगवत्पाद
मृत्यु477 ईसा पूर्व
शंकराचाय जयंती6th मई 2022 Friday / शुक्रवार
adi shankaracharya jayanti
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य  का जन्म और माता-पिता परिचय

adi shankaracharya jayanti : यह परिवर्तन जिसके कारण सम्भव हुआ । यह महामानव कोई दूसरा नहीं आदिगुरु शंकराचार्य थे ।  जिन वरदहस्त पाकर कालान्तर में सारा भारत एकता का शंखनाद करने लगा । ऐसा कहा जाता है कि उनका जन्म भगवान शंकर के प्रसाद से 788 ई . में केरल प्रान् के कालड़ी ( कालन्दी ) ग्राम में हुआ था ।
इनकी माता आर्याम्विका एक धर्मनिष्ठ महिला थी और पिता शिवगुरु भगवद् पूजा में ही समर्पित रहते थे । वे बहुत समय तक निःसंतान रहे किन्तु कालान्तर में भगवान शंकर की आराधना से प्राप्त संतान का नामकरण उन्होंने शंक ही किया ।

पिता शिवगुरु वालक शंकर के आगमन का पूर्णरूप से सुखाभास भी नहीं कर पा थे। कि उन्हें इस संसार से जाना पड़ा अर्थात् जब शंकर तीन वर्ष के थे , तभी उनके पिता क देहावसान हो गया । शंकर बचपन से ही इतने प्रतिभावान थे कि एक बार जो सुन या पढ़ ले थे , वह उन्हें कंठस्थ हो जाता था । कहा जाता है कि तीन वर्ष की ही अवस्था में उन्हें मातृ भाषा का मलयालम का अधिकारिक ज्ञान हो गया था ।

आदि शंकराचार्य के शिक्षा कैसे हुई? आदि शंकराचार्य श्लोक?

adi shankaracharya jayanti : गुरुकुल रहकर उन्होंने व्याकरण , साहित्य और शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन किया था । उनकी अद्वितीय प्रतिभा और विशुद्ध चरित्र के कारण उनके गुरु की भी विशेष कृपादृष्टि उन पर रहती थी । मात्र दो वर्ष की गुरुकुल पढ़ाई में ही उन्होंने समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था और आठ वर्ष की अवस्था तक उनकी विद्वता और पाण्डित्य का डंका केरल के कोने – कोने में प्रतिध्वनित होने लगा था । आठ वर्ष की अवस्था में उनकी वैराग्य भावना इतनी प्रबल हो गई थी कि वे घर छोड़ने के लिए लालायित हो उठे माँ को यह वचन देकर , ” माँ मैं कहीं भी रहूँ अन्त में तुम्हारा श्राद्ध कर्म अपने हाथों से करूँगा .

” घर छोड़कर चल दिए । कई दिनों की यात्रा की थकान मिटाने के लिए शंकर एक दिन एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे । ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप की गर्मी से आकुल मेढक को एक नाग अपने फन से छाया प्रदान कर रहा था । यह विचित्र दृश्य उनके मन को जहाँ आश्चर्य चकित कर रहा था । वहीं बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य कर रहा था । उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचने में समय नहीं लगा कि यह स्थान किसी पुण्यात्मा के प्रसाद से आकण्ठ स्नात है । पूछने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह शृंगी ऋषि का पावन आश्रम रहा है ।

आदि शंकराचार्य का प्रथम मठ कहाँ बनाया और  शंकराचार्य के पहले शिष्य का नाम क्या था?


adi shankaracharya jayanti : उन्हीं के पुण्य प्रताप से यहाँ जीव – जन्तु , पशु – पक्षी आपसी वैरभाव भुलाकर शान्तिपूर्वक वास करते हैं । इस घटना ने शंकर के मन को प्रभावित किया और उन्होंने तत्काल संकल्प किया कि मैं इस स्थान की शान्ति और पवित्रता को बनाए रखने के लिए अपना प्रथम मठ यहाँ बनवाऊँगा और कालान्तर में उन्होंने अपने संकल्प को साकार कर दिखाया ।

वह स्थली आज शृंगेरी मठ के नाम से इतिहास प्रसिद्ध है । शंकर इस्ततः परिभ्रमण करते हुए नर्मदा नदी के किनारे उस गुफा में पहुँचे जहाँ गौड़पाद के शिष्य आचार्य गोविन्द भगवत्पाद साधना में रत थे । ध्यान भंग होने पर अल्प वयस्क बालक की योग्यता , विद्वता , प्रकाण्ड पाण्डित्य और चरित्रनिष्ठा से वे अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें अपना शिष्य बना लिया ।

adi shankaracharya jayanti : वहाँ कुछ समय रहकर शंकर ने उपनिषद् , ब्रह्मसूत्र और अद्वैत सिद्धान्त के मर्म को समझा  । गुरु गोविन्दपाद ने उनकी योग्यता की परख करके उन्हें दीक्षा भी दे दी । कुछ समय के पश्चात् वह अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से आचार्य शंकर बन गए और जिन्हें सारा संसार आदिगुरु शंकराचार्य के नाम जानता है। कहा जाता है कि एक दिन गुरुजी ध्यानमग्न थे । नर्मदा नदी में बाढ़ आयी थी । बाढ़ का जल गुफा में प्रविष्ट होने वाला था ।

अन्य शिष्यगण चिन्तातुर और भयाकुल हो रहे थे । शंकर ने अपने सहपाठियों की चिन्ता दूर करने के लिए एक घड़े को गुफा के द्वार पर लगा गुफा के द्वार पर जितना भी जल आया , सब उस घड़े में समा गया । ध्यान टूटने पर गुरुजी को जब इस घटना की जानकारी हुई , तो उन्होंने शंकर से कहा कि वत्स ! अब तुम काशी विश्वनाथ का दर्शन कर व्यासजी की इच्छा के अनुसार ब्रहसूत्र पर भाष्य लिखो । गुरुजी क आज्ञा से काशी में निवास करते हुए एक दिन उन्हें चाण्डाल के रूप में साक्षात् भगवान शंक से अद्वैत का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ । adi shankaracharya jayanti

ब्रह्म सत्य है , जगत् मिथ्या है और आत्मा औ ब्रह्म एक है , यह ज्ञान प्राप्त कर आचार्य शंकर उस स्थान की ओर उन्मुख हुए जहाँ व्यासजी ने ब्रह्मसूत्र लिखा था . शंकराचार्य दुर्गम एवं दुरूह घाटियों , वनों , उपवनों एवं जंगलों को पा करते हुए वदारिकाश्रम पहुँचे . यहाँ पर चार वर्ष रहकर आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्र पर भाष लिखा . कालान्तर में वहीं ज्योतिपीठ मठ की स्थापना की . वहाँ से केदारनाथ पहुँचे ।

adi shankaracharya jayanti : वैदिवक्रियाकाण्ड से धरा को बचाने का संकल्प लेकर प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिल भट्ट के पास गए । उन्होंने बताया कि चूंकि मैंने कर्म की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए ईश्वर के अस्तित्व का जहाँ उन्हें अपने शरीर को धान की भूसी से सुलगाते देखकर शंकर द्वारा कारण पूछने पर खण्डन किया है । जबकि ईश्वर में मेरी आस्था है । अपने इस पुरोगामी कृत्य पर पश्चाताप करने के लिए ही मैं ऐसा कर रहा हूँ । शंकर ने अर्धदग्ध कुमारिल को शरीरान्त से बचाने का प्रस्ताव रखा , तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि मुझे आप पर विश्वास है , किन्तु अब मैं जीना नहीं चाहता ।

मुझे अपना पश्चाताप पूर्ण करने दीजिए और मेरे शिष्य मंडनमिश्र को अपना शिष्य स्वीकार कर लें वही इस अद्वैत का प्रचार करेगा ।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य  के शिष्य और शृंगेर मठ की स्थापना कहाँ हूँ?


adi shankaracharya jayanti : आचार्य शंकर और मंडनमिश्र का शास्त्रार्थ जगत् प्रसिद्ध है । मण्डनमिश्र उच्चकोटि के विद्वान् और सुप्रसिद्ध कर्मकाण्डी थे । आचार्य शंकर ने विद्वान् मंडनमिश्र और उनकी विदुषी पत्नी शारदा को शास्त्रार्थ में परास्त कर अपना शिष्य वना लिया । मंडनमिश्र आचार्य शंकर द्वारा दीक्षित होकर इतिहास प्रसिद्ध सुरेश्वराचार्य बन गए और अद्वैत वेदान्त का प्रचार – प्रसार करने लगे ।

उत्तर भारत में अद्वैत का प्रचार – प्रसार और विस्तार करने के पश्चात् आचार्य शंकर दक्षिण भारत की और उन्मुख हुए और मद्रास में श्री शैल स्थान की ओर गए । वहाँ पहुँचकर कार्यपालिकों के प्रभाव को समाप्त किया और उनकी अशुद्ध , अपवित्र पूजन विधि से वहाँ की जनता को ऋण दिलाया ।

वहाँ से वे महाराष्ट्र पधारे और महावलेश्वर मन्दिर गए और वहीं से शृंगेरी जाकर शृंगेर मठ की स्थापना की । उस समय तक यह स्थान शंकराचार्य के सिद्धान्त के प्रचार – प्रसार का मुख्य केन्द्र हो गया था । एक दिन शृंगेरीमठ में निवास करते हुए शंकराचार्य को अचानक माता की बीमारी का बोध हुआ । वहाँ की व्यवस्था सुरेश्वराचार्य को सौंपकर शंकराचार्य उसी मार्ग से माँ के अन्तिम दर्शन के लिए कालड़ी ( कालिन्दी ) ग्राम की ओर चले जिधर से घर छोड़कर यात्रायित हुए थे ।

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जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने मरणासन्न माँ को कोन सा ज्ञान दिया?

adi shankaracharya jayanti : मनस्वी शंकर को अपने पास देखकर माँ के नेत्रों में प्रेमाश्रु की अविरल धारा प्रवाहित होने लगी । शंकराचार्य ने मरणासन्न माँ को अद्वैत ब्रह्म के निर्गुण ज्ञान का उपदेश दिया । नियमतः संन्यासी न तो दाह संस्कार कर सकता है और न ही अग्नि का स्पर्श कर सकता है , किन्तु मातृभक्ति में निमज्जित शंकर माता की इच्छा और अपनी श्रद्धा के अनुसार संन्यासी जीवन के उन नियमों के वन्धन में नहीं पड़े , क्योंकि इसका कोई आध्यात्मिक आधार नहीं था ।

उन्होंने अपने कुल और ब्राह्मणों के विरोध के बावजूद भी माता का श्राद्ध बड़ी तन्मयता एवं लगन से किया । उनका रोम – रोम माता के स्नेह , प्यार और त्यागपूर्ण जीवन के प्रति कृतज्ञ था । माता के प्रति शंकराचार्य द्वारा स्थापित आदर्श आज भी भारतीय संस्कृति का एक सुदृढ़ सोपान है । एक साधू के द्वारा दाह – संस्कार की क्रिया देखकर ग्रामवासी ग्राम छोड़कर अन्यत्र चले गए । adi shankaracharya jayanti शंकर ने थोड़ी बहुत लकड़ी एकत्रित करके घर के सामने ही माँ का दाह – संस्का किया ।जिससे वह स्थान श्मशान के रूप में बदल गया । धन्य है वह पुत्र जिसने माँ के सम्मान को ध्यान में रखकर सारे बन्धन तोड़ डाले ।

भारत की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ –

  1. उत्तर में ज्योतिपीट – वद्रीनाथ ,
  2. दक्षिण में शृंगेरीपीठ – मैसूर ,
  3. पूर्व में गोवर्धन पीठ – जगन्नाथपुरी ,
  4. पश्चिम में – द्वारिकापीठ – द्वारिकापुरी ।

माँ के क्रियाकर्म से निवृत्त होने के पश्चात् आचार्य शंकर ने अपनी तेजस्वी वाणी में सम्पूर्ण भारत भू पर ब्रह्म एक है , जो सबमें निहित है । उससे कोई अलग नहीं है , अमर सन्देश  विस्तारित किया ।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा कहाँ-कहाँ पीठ बनाये गये हैं?


adi shankaracharya jayanti : सारे भारत को एकसूत्र में बाँधने के उद्देश्य से उन्होंने मैसूर में अंगेरीपीठ , जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ , द्वारिका में द्वारिकापीठ , बद्रीनाथ में ज्योतिपीठ की स्थापना की । इनका कार्यभार अपने ओजस्वी सर्वगुण सम्पन्न शिष्यों को सौंपकर तथा इनके संचालन हेतु कठोर नियम बनाकर 32 वर्ष की अल्पायु में समाधिस्थ हो गए।
इतनी कम उम्र में इतना अधिक कार्य शायद ही किसी महापुरुषों के कर – कमलों से सम्भव हुआ हो । उनके बारे में यह उक्ति उनकी महानता को व्यक्त करती है “ ।

अष्टवर्षे चतुर्वेदी , द्वादशे सर्वशास्त्रवित् षोडसे कृतवान भाष्यं , द्वात्रिशे मुनेरभ्यगात् . ” अर्थात् आठ वर्ष में ही चारों वेद और बारह वर्ष की अवस्था में समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया । सोलह वर्ष की अवस्था तक अपने ग्रन्थों का लेखन कार्य सम्पन्न कर लिया था और बत्तीस वर्ष की अवस्था में चिर समाधि ले ली।

अद्वैत का आधारभूत ग्रन्थ ‘ ब्रह्मसूत्र शांकर भाष्य ‘ उनकी अमर कृति है . इसके अतिरिक्त समस्त प्रसिद्ध उपनिषदों पर भाष्य तथा गीता पर भी भाष्य लिखे और विवेक चूड़ामणि , सौन्दर्य लहरी , उपदेश साहसी तथा विष्णु सहस्रनाम भाष्य लिखकर के इतिहास के पृष्ठों पर अमर हो गए ।

शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रन्थ : adi shankaracharya jayanti
  1. ब्रह्मसूत्र भाष्य ,
  2. गीता भाष्य ,
  3. सर्ववेदान्त सिद्धान्त संग्रह ,
  4. विवेक चूड़ामणि ,
  5. प्रबोध सुधाकर ,
  6. ईश ,
  7. केन ,
  8. कठ आदि
  9. 12 उपनिषदों के भाष्य ।
  10. भारतीय संस्कृति को उनकी चमत्कारिक देन है ।

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adi shankaracharya jayanti : कृत्य

  • राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से चतुर्मठ की स्थापना ,
  • साहित्य की दृष्टि से उपर्युक्त ग्रन्थों का लेखन ,
  • सामाजिक दृष्टि से क्रियाकाण्डों से मुक्ति तथा
  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अद्वैत की स्थापना आदि ।

उनके कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कृत्य हैं , जो भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं ।

adi shankaracharya jayanti : बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाकर , पथ भ्रष्टों को धार्मिक सन्देश द्वारा उचित मार्गदर्शन देकर , धर्म और पथ के नाम पर बिखरती मानवता को एक सूत्र में बाँधने का उन्होंने स्तुत्य प्रयास किया था । प्रत्येक प्रकार की परिस्थितियों से जूझने और अपना मार्ग प्रशस्त करने की उनमें अनोखी क्षमता थी । वे दिव्य पुरुष थे , किन्तु साधारण मानव की तरह उन्होंने धरा पर भ्रमण करते हुए मानवता की अभूतपूर्व सेवा की ।

‘ ब्रह्म सत्यं ‘ , ‘ जगन्मिथ्या ‘ , जीवो ब्रह्ममैव नापरः ‘ का उद्घोष कर वर्ग , जाति धर्म तथा सम्प्रदाय से खण्डित होती मानवता की रक्षा करने का अतुलनीय प्रयास उन्होंने किया था । लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व का उनका सन्देश आज भी अमृततुल्य है ।

adi shankaracharya jayanti : उन्होंने आजीवन ज्ञान की साधना की थी । वे सच्चे ज्ञानी थे । मोक्ष के लिए वे ज्ञान को आवश्यक मानते थे । उनके अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है , किन्तु अज्ञानतावश व्यक्ति अनेकानेक ‘ सत्य ‘ को स्वीकार कर भटकता रहता है । उनके अनुसार जगत् केवल व्यावहारिक सत्य है , पूर्ण सत्य नहीं है ‘ आत्मा और ब्रह्म एक ‘ का अद्वैत दर्शन देकर उन्होंने औपनिषदिक वाक्य ‘ त्वाम् तत्वमासि ‘ और ‘ अयमात्मा ब्रह्म ‘ , को ही विस्तारित किया ।

adi shankaracharya jayanti : उनकी वाणी तथा उनका ज्ञान और दर्शन आज भी प्रासंगिक है। ऐसी महान् विभूतियाँ किसी काल विशेष की नहीं होतीं , प्रत्युत सार्वकालिक होती हैं । अतः यह आवश्यक है कि उनके द्वारा बनाए मार्ग पर चलकर समस्याओं को समाधान देने का प्रयास किया जाए । यदि ऐसा होता है , तभी ऐसे महापुरुषों का धरा पर आगमन सार्थक हो सकेगा । उन्होंने भारतीय संस्कृति को जो योगदान दिया , वह सर्वथा स्तुत्य है । राष्ट्रीय एकता के लिए उनका प्रयास अनुकरणीय है। ।

adi shankaracharya jayanti : निष्कर्ष

adi shankaracharya jayanti इस वर्ष 2022 6thMay 2022 Friday / शुक्रवार को है। इसके लिए आप अपना research जरूर करे। तो दोस्तो आज हमने( adi shankaracharya jayanti) इस ब्लॉग पर adi shankaracharya biography jayanti को जाना और शंकराचार्य के शिष्य, गुरु, माता-पिता आदि जानकारीयो को जाना। तो इसी तरह के informative article के लिए हमारे ब्लॉग पर बने रहे। आपका कीमती समय देने के लिए धन्यवाद।

FAQ और adi shankaracharya jayanti

शंकराचार्य का जन्म किस राज्य में हुआ?

केरल प्रान् के कालड़ी ( कालन्दी ) ग्राम

शंकराचार्य के गुरु कौन थे?

आचार्य गोविन्द भगवत्पाद

शंकराचार्य का मृत्यु कब हुआ था?

मृत्यु477 ईसा पूर्व

आदि शंकराचाय जयंती 2022 कब है?

6th May 2022Friday / शुक्रवार