Acharya Vinoba Bhave biography
Acharya Vinoba Bhave biography

Acharya Vinoba Bhave biography | आचार्य विनोबा भावे जीवन परिचय | Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay | Acharya Vinoba Bhave jiwani | Acharya Vinoba Bhave

Acharya Vinoba Bhave biography:- आचार्य विनोबा भावे भारत में महापुरुषों की श्रृंखला को बलवती करने में महाराष्ट्र राज्य का विशेष योगदान रहा है । इस राज्य ने राजनीति , समाज सुधार , सांस्कृतिक पुनर्जागरण आदि समस्त क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान करके भारत को महान् राष्ट्र होने को गौरव प्रदान करके अपने नाम को सार्थक किया है । एक ओर इसने ज्ञानदेव , नामदेव , एकनाथ , तुकाराम , समर्थ गुरु रामदास सदृश संत – महात्माओं को जन्म दिया ।

वहीं दूसरी ओर छत्रपति शिवाजी , गोपाल कृष्ण गोखले , महादेव गोविन्द रानाडे , लोकमान्य बालगंगाधर तिलक प्रभृति राजनीतिज्ञों एवं समाजसुधारकों को जन्म दिया है । इसी महाराष्ट्र की धरती में विनायक नरहरि भावे का जन्म हुआ । वह सप्तपर्णी सृष्टि के सप्तवर्णी विकास के आधुनिककालीन जीवन्त उदाहरण थे ।

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आचार्य विनोबा भावे जीवन परिचय

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : विनोबाजी अर्थात् कुछ मुट्ठीभर हड्डियों की प्रतिभा , एक महामानव रामराज्य के सपनों को यथार्थ में साकार करने की लालसा का इच्छुक , वशिष्ठ तुल्य महर्षि , सारे विश्व को ममता , मानवता , स्वतंत्रता , समानता व भ्रातृत्व का सन्देश देने वाला , शान्ति का पुजारी , भारतीय संस्कृति का प्रतीक ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : भारतीय संस्कृति के प्रतीक की हैसियत से हमारी आध्यात्मिक परम्परा को जीवित रखने में तो उनका योगदान अपूर्व था ही , परन्तु भारतीय राजनीतिक चिन्तन में भी उनका योगदान कम नहीं है। 11 सितम्बर , 1895 को महाराष्ट्र में कोलाबा जिले में गगोडा नामक ग्राम में भारत के महान् संत राजनीतिक , विचारक और भूदान आन्दोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे का जन्म हुआ था । उनका बचपन का नाम था- विनायक नरहरि भावे ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : बालक विनायक नरहर भावे बचपन से ही धार्मिक आडम्बरों और धर्मकाण्डों का कट्टर दुश्मन था । विनोबाजी के पिताश्री पं . श्री नरहर शम्भु राव भावे बड़ौदा राज्य में टैक्सटाइल इंजी नियर थे । माता श्रीमती रुक्मिणी देवी , अत्यन्त धर्मपरायण महिला थीं । ब्राह्मण परिवार होने के नाते इनके यहाँ नियमित रूप से धर्मग्रन्थों का पठन – पाठन , पारायण होता रहता था । विनोवाजी को धर्म और धर्मग्रन्थों के प्रति निष्ठा वस्तुतः रिक्थ के रूप में प्राप्त हुई ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay chart | आचार्य विनोबा भावे जीवन परिचय

नामआचार्य विनोबा भावे
बचपन का नामविनायक नरहरि भावे
जन्म11 सितम्बर , 1895
जन्म स्थानमहाराष्ट्र में कोलाबा जिले में गगोडा नामक ग्राम में
मृत्यु15 नवम्बर , 1982
मृत्यु स्थान (उम्र 87) पवनार, वर्धा
माता-पिताश्रीमती रुक्मिणी देवी-श्री नरहर शम्भु राव भावे
माता-पिता के कार्यअत्यन्त धर्मपरायण महिला- बड़ौदा राज्य में टैक्सटाइल इंजी नियर
प्रशिद्धि भूदान आन्दोलन
योगदानलेखक
धर्म हिन्दू
भाषामराठी, संस्कृत, हिंदी, अरबी, फ़ारसी, गुजराती, बंगला, अंग्रेज़ी, फ्रेंच आदि।
लेख पवनार आश्रम, भूदान आन्दोलन, विनोबा भावे के अनमोल वचन, विनोबा भावे के प्रेरक प्रसंग
कार्यलेखक,(चिन्तक) विचारक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक
प्रशिद्ध लेखभूदान , ग्रामदान तथा सम्पत्तिदान आदि
पुरस्कारसन् 1958 में उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार तथा सन् 1983 में ‘ भारत रत्न मिला।
Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay

आचार्य विनोबा भावे का आरंभिक जीवन |Acharya Vinoba Bhave jiwani

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : इनके पिताजी बड़ौदा में अकेले ही रहा करते थे । इस कारण उनका बाल्यकाल अपने विनोबाजी की बाल सहचरी थी । गाँव में पितामह श्री शम्भु राव भावे के संरक्षण में प्राकृतिक परिवेश में व्यतीत हुआ । अतएव प्रकृति ” 25 जीवन मार्च , 1916 को ‘ इण्टरमीडिएट परीक्षा देने का बहाना तो था ही ।

Acharya Vinoba Bhave jiwani  : साथियों के साथ दिया तथा वापस घर विनोबा भावे बड़ौदा से बम्बई चले आए । उन्होंने सूरत पहुँचकर अपने प्रण किया । उत्तर न जाने का प्रदेश के बनारस का पथ शहर में रहकर कुछ बदल समय भिक्षुक जीवन के रूप में गुजारा , परन्तु उतनी ही भिक्षा , जितना कि पेट भर सके । विनोबाजी बनारस छोड़कर हिमालय की कन्दराओं में जाने का मन बना रहे थे , तभी गांधीजी द्वारा स्थापित आश्रम की ओर प्रबल आकर्षण हुआ , क्योंकि इस आश्रम में सत्य , अहिंसा और ब्रह्मचर्य को प्रथम स्थान दिया गया था ।

Acharya Vinoba Bhave jiwani  : महात्मा गांधी ने विनोबाजी के व्यक्तित्व का परीक्षण अच्छी तरह कर लिया था । उनका मत था- ” विनोबा उस पवित्र आत्मा के समान हैं । जिनसे कुछ सीखा जा सकता है । ” आगे लिखते हुए गांधीजी कहते हैं- ” विनोबा आश्रम के स्तम्भों में से एक हैं । वह उन बहुत से लोगों में से ही नहीं हैं जो आश्रम में आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं , बल्कि वह तो उसे उपकृत करने के लिए आए हैं । कुछ प्राप्त करने के लिए नहीं , बल्कि कुछ देने के लिए आए हैं ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : ” सन् 1920 में वर्धा आश्रम के संचालन का पूर्ण कार्य विनोबाजी के हाथ में आया तथा सन् 1921 के बाद से वर्धा ही उनका कार्य क्षेत्र वन गया । सन् 1923 से वे ‘ महाराष्ट्र धर्म ‘ नामक पत्रिका का सम्पादन करने लगे । नागपुर झण्डा सत्याग्रह में उन्हें दो बार जेल यात्रा करनी पड़ी जहाँ उन्होंने भगवद्गीता के मराठी अनुवाद ‘ मीताई ‘ को पूरा किया । सन् 1932 में गांधीजी के वर्धा आने पर एक कन्या आश्रम खोला गया जिसका संचालन श्री विनोवाजी को सौंपा गया।

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आचार्य विनोबा भावे का समाज सेवा | Acharya Vinoba Bhave jiwani

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : सत्याग्रह आन्दोलन के समय विनोवाजी लगभग 2 वर्ष तक पूना जेल में रहे । विनोबाजी उस समय विख्यात हुए जब गांधीजी ने उन्हें व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही मनोनीत किया । विनोवाजी ने ‘ सर्वोदय ‘ आन्दोलन को जनहित में चलाया । सन् 1951 में तेलंगाना क्षेत्र में कम्युनिटी द्वारा चलाए गए आन्दोलन के प्रत्युत्तर में इस क्षेत्र की पद यात्रा की तथा भूदान आन्दोलन का प्रारम्भ किया ।

Acharya Vinoba Bhave jiwani  : सन् 1960 में चम्बल यमुना के डाकूग्रस्त क्षेत्र में डाकुओं का आत्मसमर्पण कराया । सन् 1975 में गौवध के विरोध में आमरण अनशन किया तथा सरकार के आश्वासन पर ही व्रत तोड़ा । वह अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में ‘ पवनार आश्रम ‘ में रहने लगे थे तथा वहाँ से ‘ मैत्री ‘ पत्रिका निकालते थे । उसी आश्रम में 15 नवम्बर , 1982 को उनका निधन हुआ । सन् 1958 में उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार तथा सन् 1983 में ‘ भारत रत्न ‘ से सम्मानित किया गया ।

विनोबाजी का दर्शन | Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : गांधीजी के अतिरिक्त विनोबाजी सन्त ज्ञानेश्वर तथा शंकर से भी ज्यादा प्रभावित हुए थे । उन्होंने कहा था- ” शंकर , ज्ञानेश्वर तथा गांधीजी ने मेरे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है । मैं श्री शंकराचार्य का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे बौद्धिक आधार तथा वेदान्त की पृष्ठभूमि प्रदान की है । मैं महान् सन्त ज्ञानेश्वर का भी कृतज्ञ हूँ । उन्होंने जो महाकाव्य लिखा , वह बहुत ही उज्ज्वल है । इसी महाकाव्य ने मेरे मन में उत्साह तथा भावनाएँ भरी हैं । ” विनोबाजी आध्यात्मिक सन्त थे ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : ईश्वर में उनकी अटूट निष्ठा थी । वह ईश्वर को भौतिक जगत् से भी अधिक महत्व देते थे । उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ रेण्डम रिफ्लेक्सन ‘ में लिखा है- ” मेरा ईश्वर में अडिग विश्वास है , परन्तु सामने रखे हुए लैम्प में नहीं ! क्योंकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ हमें जो अनुभूति कराती हैं , वह कई बार गलत भी हो सकती है , परन्तु ईश्वार की सत्ता का अनुभव करने वाली अनुभूति निर्धन्त है ।

Acharya Vinoba Bhave biography : ” विनोबाजी ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को सुलभ मानते हुए बताते हैं- “ ईश्वर प्राप्ति का सरल उपाय यह है कि उसकी मनुष्य को इच्छा हो । इच्छा नहीं तो ईश्वर प्राप्ति सम्भव नहीं । इच्छा है , दरवाजा खुला है , तो ईश्वर स्वयं प्रवेश करेगा । ईश्वर ऐसे मनुष्यों को ढूँढता ही रहता है , जो उसकी इच्छा करते हैं , किन्तु मनुष्य दरवाजा बन्द किए रहते हैं । ईश्वर को अन्दर आने ही नहीं देते । हमें ईश्वर को पाने की जितनी इच्छा है , उससे अधिक ईश्वर को हमारे अन्दर प्रवेश करने की इच्छा है , परन्तु हम हृदय बन्द रखते हैं , तो वह कैसे प्रवेश करें ?

हृदय खोलने का उपाय है –

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : सत्य , प्रेम और करुणा । ” विनोबाजी धार्मिक सहिष्णुता के आचरण पर अत्यधिक जोर देते रहे । इसलिए वह मन्दिर , मस्जिद तथा चर्च को समान प्यार करते थे । डॉ . लक्ष्मणसिंह ने अपनी पुस्तक ‘ आधुनिक भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक विचार ‘ में विनोबाजी को लेकर उनके विठोबा में मन्दिर प्रवेश के बारे में लिखा है । विनोबाजी ने कहा- ” मेरा मस्जिदों , गुरुद्वारों और चर्चों में उन धर्मों के मानने वालों ने समान प्रेम से स्वागत किया है ।

अजमेर को ‘ भारत का मक्का ‘ समझा जाता है । मैं सन् 1948 में वहाँ गया और 10 लाख मुसलमानों की भीड़ के सामने गीता के श्लोकों का उच्चारण किया । तत्पश्चात् मैंने उनकी नमाज में भाग लिया । नमाज के पश्चात् उपस्थित लोगों ने अपनी परम्परानुसार मेरे हाथ का चुम्बन लिया । ” मानव धर्म को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते हुए विनोबाजी ने लिखा है- ” कोई भी धर्म मानव धर्म के विरुद्ध नहीं है ।

मानव धर्म का अर्थ है –

Acharya Vinoba Bhave biography : सबके साथ भलाई से व्यवहार , सत्य , प्रेम और संयम । इतना तो हर धर्म में होना ही चाहिए । इसके अलावा और कुछ भी होना चाहिए ‘ आत्मा क्या है , ईश्वर से हमारा क्या सम्बन्ध है , क्या मरने के बाद पुनर्जन्म होता है ।

उपासना कैसे की जाए ? “

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : यह सभी धर्मों में अलग – अलग होती है । ‘ मूर्ति पूजा का खण्डन करते हुए विनोबाजी ने बताया है कि- ” मनुष्य का नैतिक व्यवहार ही उसके अभीष्ट लक्ष्य ( ईश्वर ) प्राप्ति तक ले जा सकता है । ” सन् 1955 में एक बार भाषण करते हुए उन्होंने बताया था- “ वर्तमान सामाजिक मूल्यों में एक महान् परिवर्तन लाना पूर्ण रूप से आवश्यक हो गया है , जैसे – पैसे की चोरी , मद्यपान , व्यभिचार , हत्या आदि . दूसरे कुछ अपराधों को महान् पाप समझा जाता है , जबकि दूसरों को मामूली पाप समझा जाता है ।

Acharya Vinoba Bhave jiwani  :  में यह अनुभव करता हूँ कि हम जब तक असत्य को मूल पाप नहीं मानते और अन्य पापों का गौण स्थान नहीं देते , तब तक हम अपने आध्यात्मिक परिवर्तनों में किसी भी प्रकार की प्रगति नहीं कर पाएंगे । ” आचार्य विनोबा भावे , गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप समाज की रचना करना चाहते थे ।इनका समाज ‘ सर्वोदय ‘ का समाज होगा , जिसमें सभी व्यक्तियों की उन्नति पर बल दिया जाएगा ।

आचार्य विनोबा भावे द्वारा सामाजिक परिवर्तन | Acharya Vinoba Bhave jiwani

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : सामाजिक परिवर्तन लाने में विनोवाजी ने शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन माना था । ‘ थॉट्स ऑन एजूकेशन ‘ में उनके शिक्षा सम्बन्धी विचार अंकित हैं । शिक्षा पर किसी भी प्रकार के सरकारी नियंत्रण को न स्वीकारते हुए उन्होंने बुनियादी शिक्षा का समर्थन किया ।

वास्तव में विनोवाजी अपने भूदान , सम्पत्तिदान तथा ग्रामदान आन्दोलन के द्वारा समाज में एक ऐसी क्रान्ति लाने में सफल हुए , जिसे एक नैतिक क्रान्ति की संज्ञा देना उचित ही है । चम्बल घाटी में कुख्यात डाकुओं का शासन था , परन्तु उनके मन में विनोबाजी ने जो मनोवैज्ञानिक क्रांति की , वह कोई कम मूल्यवान् देन नहीं है ।

Acharya Vinoba Bhave jiwani  : उन्होंने डाकुओं को ‘ बागी जीवन ‘ समाप्त करने की प्रेरणा दी । समस्त वागियों ने अपने हथियारों को त्यागकर शांतिमय जीवन व्यतीत करने का संकल्प लिया । इन वागियों को मिटाने में पुलिस को जहाँ लोहे के चने चबाने पड़े , वहाँ विनोवाजी सहज ही सफल हुए ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : समानता को स्वीकरते हुए विनोबाजी ने सर्वोदय के बारे में कहा था- ” सर्वोदय में समानता को सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया है । वर्तमान समाज में हमें विभिन्न प्रकार की असमानताओं को देखना पड़ रहा है । श्रम का अपमान , मातृ शक्ति की अवहेलना , दलित और पिछड़ी जातियों का तिरस्कार , धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों के प्रति दुर्भाव स्पष्ट रूप से सामाजिक असमानता के विविध रूप हैं । इन सबको समूल नष्ट करना है , तो उसका उपाय है – ग्रामदान ।

आचार्य विनोबा भावे द्वारा सामाज सुधार कार्य | Acharya Vinoba Bhave jiwani

Acharya Vinoba Bhave biography : अपने आर्थिक विचारों के तारतम्य में वह समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को समाप्त करना चाहते थे । इस हेतु विनोबाजी ने औद्योगीकरण का विरोध किया । भूदान , ग्रामदान तथा सम्पत्तिदान को अपनाया। वह सभी व्यक्तियों में पारस्परिक प्रेम की भावना के पक्षधर थे । उनका कहना था कि जब तक पूँजीपति वर्ग व सम्पत्तिशाली वर्ग अपनी सम्पत्ति के प्रति मोह की आशा नहीं त्यागता , तब तक समाज की अर्थव्यवस्था सभी लोगों की उन्नति के अनुरूप नहीं हो सकती ।

इस विषय में उन्होंने अपने विचार ‘ सर्वोदय विचार और स्वराज्य दर्शन में अंकित किए हैं- “ हमारे यहाँ गरीवी इस हद तक पहुँच गई है कि गरीब जनता को दूसरी जगह से उभारना बहुत ही आसान है । कह नहीं सकते कि फिर वह अहिंसा से ही काम लेगी । इसलिए हमें यह निश्चय करना चाहिए कि ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का पालन करने की हम पूरी कोशिश करेंगे और ज्यादा जायदाद न रखेंगे । इतनी जायदाद जायज और इतनी नाजायज ऐसी कोई लकीर थोड़े ही खींच सकते हैं ।

विनोवाजी का उद्देश्य था

शासनविहीन और शोषणविहीन समाज की स्थापना । वह मानते थे कि आदर्श राज्य में निम्न बिंदु देखते थे:-
न कोई शासक होगा ,
न शासित ,
न कोई शोषक होगा ,
न शोषित ,
Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : उसमें सम्प्रभुता राज्य या राजा की नहीं , बल्कि जनता की या यूँ कहिए व्यक्ति की अपनी होगी । ऐसे राज्य का आधार दण्ड नहीं , अपितु स्वशासन एवं नियंत्रण ही होगा । महात्मा गांधी की ही तरह विनोबाजी राज्य को दण्ड एवं हिंसा का प्रतीक मानते थे तथा उसका विरोध भी किया ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : राज्य के पक्ष में एक दलील यह दी जाती है कि आधुनिक राज्य पुराने राज्यों की तरह पुलिस राज्य नहीं होता , अपितु ‘ बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ‘ काम करने वाला कल्याण घरी राज्य होता है , इसलिए उसका स्वागत करना चाहिए ।

आचार्य विनोबा भावे के विचार, भूदान आन्दोलन
और सत्याग्रह | Acharya Vinoba Bhave jiwani

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay: विनोवाजी का कहना था ” अत्याणकारी राज्य के नाम से जनता का कल्याण होता है , तो भी मैं इसे ‘ कल्याणकारी या वेलफेयर स्टेट ‘ नहीं , बल्कि ‘ इलफेयर स्टेट ‘ ही कहूँगा , क्योंकि कुछ इने – गिने लोगों के हाथ में सत्ता सौंपने से ‘ वेलफेयर ‘ या ‘ कल्याण ‘ कभी हो ही नहीं सकता । ” विनोबाजी ” अपना कल्याण स्वयं करने की शक्ति जनता में होनी चाहिए और ऐसा न हुआ , तो शासक चाहे अकवर हो या औरंगजेब , जनता गुलाम की गुलाम ही रहेगी । “

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay:  कहना था यह मानना गलत है कि जनतंत्र में सत्याग्रह का कोई स्थान नहीं है । ‘ अभावात्मक -सत्याग्रह के लिए उसमें कम गुंजाइश होगी , परन्तु विधायक सत्याग्रह का उस पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा । ऐसे सत्याग्रह में में हिंसा को कोई स्थान होगा , न धमकियो का , वह ( सत्याग्रह ) प्रेमवाण या प्रेम प्रकर्ष होगा । यह सही है कि विनोबाजी सत्याग्रह में ‘ आग्रह ‘ की अपेक्षा ‘ सत्य ‘ पर अधिक जोर देते थे , परन्तु सत्याग्रह के महत्व को उन्होंने कभी नकारा नहीं , इस प्रकार विनोबाजी ने दण्ड की जगह प्रेम और शांति की स्थापना की और नीति एवं राजनीति के समन्वय की परम्परा जारी रखी ।

इसके अलावा उन्होंने आधुनिक लोकतंत्र के दोषों का स्पष्ट चित्र हमारे सामने रखा । इतना ही नहीं , उन्होंने पक्षविहीन लोकतंत्र और ग्रामस्वराज का महत्व ठीक से हृदयंगम कराया और सत्ता के अत्यधिक केन्द्रीकरण से वैयक्तिक स्वातंत्र्य कैसे कुचला जा सकता है ? इस बारे में हमें सावधान किया , विनोबाजी ने हमें यह भी अच्छी तरह समझाया कि हमारा श्रेय इंगलैण्ड या अमरीका के अंधानुकरण में नहीं , अपितु अपनी संस्कृति के अनुरूप लोकतंत्र का नव संस्करण में है ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : भूदान और ग्रामदान के जरिए उन्होंने क्रांति को मानवनिष्ठ बनाकर उसे एक नया आयाम दिया । चलाया , विश्वशान्ति और विनोबाजी भारतीय संस्कृति के प्रतीक आचार्य विनोबाजी का सम्पूर्ण जीवन त्याग , पास्परिक प्रेम , सहानुभूति का जीवन दर्शन है । स्वाभाविक है कि उनका हिंसा , युद्ध , शस्त्रीकरण से विरोध हो , उन्होंने अपने आन्दोलन को अहिंसात्मक ढंग इसलिए वह शांति के पुजारी कहे जाते हैं ।

उनका कहना था कि– ” जब निरन्तर शस्त्रों का संग्रह होगा , नए – नए प्रकार के अस्त्र – शस्त्र बनेंगे , राष्ट्रों के मध्य तनाव बढ़ेंगे , एक – दूसरे पर आरोप – प्रत्यारोप लगाए जाएंगे , तब ऐसे वातावरण में विश्वशांति का स्वप्न किस प्रकार पूरा हो सकेगा । ” उनका कहना था कि विश्वशांति पर मानव समाज का उत्थान व कल्याण निर्भर है । इसलिए सब लोगों को मिलकर विश्वशांति हेतु कार्य करना चाहिए , क्या विनोबा भावे अजराजकतावादी थे ? कुछ विद्वान् आलोचकों का कहना है कि विनोबाजी अराजकतावादी दार्शनिक थे ,

परन्तु क्या है अराजकतावाद ?

Acharya Vinoba Bhave jiwani  : हाँ अराजकतावाद एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा है जो राज्यविहीन , वर्गहीन , समाज की स्थापना की समर्थक है । यह विचारधारा राज्य सरकार तथा समाज की भी विरोध करती है । वह तो व्यक्ति को इतना अनुशासित देखना चाहती है कि शासन की आवश्यकता ही न रहे । विनोबाजी का आदर्श भी राज्यविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करता है । उनकी समझ में सरकार अनावश्यक है ।

आचार्य विनोबा भावे के उपदेश | Acharya Vinoba Bhave jiwani

विनोबाजी ने कहा था– ” मैं इस बात को तो समझ सकता हूँ कि कोई यह कहे कि खेतीबाड़ी के बिना , उद्योग के बिना , कला , प्यार तथा कर्म के बिना उसका गुजारा नहीं होता । मैं यह भी समझ सकता हूँ कि अगर लोग यह कहें कि शादी के बिना उनका गुजारा नहीं चल सकता , परन्तु मैं यह नहीं देख सकता कि इन वस्तुओं में सरकार को कैसे गिना जा सकता है ? ” विनोबाजी ने तो यहाँ तक कहा था कि ” यह देखने के लिए समाज में किस प्रकार अराजकता उत्पन्न होती है ? सरकार को दो वर्ष तक के लिए छुट्टी दे देनी चाहिए । “


Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : विनोबाजी ने सेना की आवश्यकता को भी नकारा , उन्होंने कहा था कि ‘ अहिंसावाद पर  आधारित शासन सेनामुक्त समाज होगा । ‘ उनके शब्दों में ” यदि किसी राज्य को कोई शिकायत है तो अहिंसात्मक राज्य उसे दूर करने का प्रयत्न करेगा और अगर आपसी बातचीत से फैसला नहीं हो सकता , तो मामला मध्यस्थता हेतु रखा जाएगा । अगर मध्यस्थ भी इस प्रकार के राज्य को संतुष्ट करने में असमर्थ रहता है और वह आक्रमण कर देता है , तो समाज अहिंसात्मक ढंग से इसका मुकाबला करेगा ।

Acharya Vinoba Bhave biography : सारे विश्व की सहानुभूतिस्वरूप उन्हें शस्त्र सहायता मिलेगी। इससे आक्रमणकारी की आत्मा को जगाया जाएगा और उसे हिंसा को त्याग करने पर बाध्य किया जाएगा । ” मूल्यांकन आचार्य विनोबाजी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन कर पाना आसान नहीं है ,

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : क्योंकि विनोवाजी समाज के सामने इस रूप में अवतरित हुए , जिसे किसी ने रामराज्य के सपनों को साकार करने का इच्छुक वशिष्ठ तुल्य महर्षि कहा , किसी ने विश्व को ममता मानवता मैत्री का सन्देश देने वाला विश्व शांतिदूत , तो किसी ने भारतीय संस्कृति की साक्षात् मूर्ति , किसी ने अराजकतावादी कहा , तो किसी ने आध्यात्मिक विचारों का महान् दार्शनिक बताया । वस्तुतः विनोबाजी गांधीवादी विचारक थे ।

निष्कर्ष | आचार्य विनोबा भावे जीवन परिचय


Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay : गांधीजी की सर्वोदयी सम्बन्धी विचारधारा को व्यावहारिक रूप देने के लिए उन्होंने भूदान , ग्रामदान तथा सम्पत्तिदान का जो मार्ग अपनाया । वह उनकी मौलिक देन है । डॉ . एस . राधाकृष्णन ने उनके विषय में लिखा था- ” विनोवा भावे ने अपने आपको जनता का सेवक सिद्ध किया ।

Acharya Vinoba Bhave jiwan parichay :  उनका वर्तमान लक्ष्य आत्मा की गहराई को प्राप्त करना था । महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद उन्होंने उनके आदर्शों का प्रचार शुरू कर दिया था । भूदान आन्दोलन उस विश्वास का स्वाभाविक परिणाम था जो उन्होंने अपने गुरु से प्राप्त किया था । ” वस्तुत : आचार्य विनोबाजी महात्मा गांधी के सच्चे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे । गांधीवाद का प्रचार व प्रसार उनका अभीष्ट लक्ष्य था ।

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FAQ

संत विनोबा भावे का जीवन परिचय दे।

11 सितम्बर , 1895 को महाराष्ट्र में कोलाबा जिले में गगोडा नामक ग्राम में भारत के महान् संत राजनीतिक , विचारक और भूदान आन्दोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे का जन्म हुआ था । उनका बचपन का नाम था- विनायक नरहरि भावे ।

विनोबा भावे का योगदान बताये?

आचार्य विनोबा भावे का सबसे मुख्य योगदान वर्ष 1955 में भूदान आंदोलन की शुरूआत करना था।

आचार्य विनोबा भावे का जन्म किस राज्य में हुआ?

आचार्य विनोबा भावे का जन्म महाराष्ट्र में कोलाबा जिले में गगोडा नामक ग्राम में हुआ।

विनोबा भावे का शिक्षा दर्शन बताये?

आचार्य विनोबा भाव का शिक्षा दर्शन दूसरों से अलग था वे किताबी भाषाओं को शिक्षण नहीं मानते थे उनका मानना था कि मनुष्य को शिक्षण उनके हस्तकला ,शैक्षणिक बल, मानव विकास तथा उनके शोषण शक्ति बढ़ाने से मनुष्य को शिक्षा प्राप्त होगी

विनोबा भावे के विचार क्या थे?

उनका कहना था कि जब तक पूँजीपति वर्ग व सम्पत्तिशाली वर्ग अपनी सम्पत्ति के प्रति मोह की आशा नहीं त्यागता , तब तक समाज की अर्थव्यवस्था सभी लोगों की उन्नति के अनुरूप नहीं हो सकती ।

आचार्य विनोबा भावे जेल कब गये थे?

1920 और 1930 के दशक में और 1940 में उन्हें पाँच साल के लिए जेल जाना पड़ा।

विनोबा भावे ने कौन सा व्रत लिया था ?

मौन व्रत रखा था , विनोबा भावे ने अपने अनुयायियों के लिए मौन व्रत रखा था