acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay
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acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay | आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय, ramchandra shukla ki rachnaye,acharya ramchandra shukla ki rachnaa,acharya ramchandra shukla ka janm

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acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay विषय प्रवेश – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी निबन्ध – क्षेत्र में पदार्पण करने से निबन्ध साहित्य में एक नया जीवन आया । द्विवेदी युग ( सन् 1905-1920 ) में विषय – विचार और परिमार्जन तो पर्याप्त हुआ , किन्तु इस काल में विश्लेषण और गहराई में जाने की प्रवृत्ति उत्पन्न न हो सकी । हिन्दी के निबन्ध लेखन पर शुक्लजी की अमिट छाप पड़ी और उनका रचनाकाल ( सन् 1920-1936 ) शुक्ल – युग के नाम से अभिहित होता है ।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय चार्ट

नामआचार्य पण्डित रामचन्द्र शुक्ल
जन्म 4 अक्टूबर 1882
जन्म स्थानबस्ती जिला
मृत्यु 2 फ़रवरी 1941
मृत्यु स्थानवाराणसी
माता-पिता विभाषी – चंद्रबली शुक्ल
पत्नी सावित्री देवी
बच्चे गोकुल चंद्र शुक्ल, केशव चन्द्र शुक्ल,दुर्गावती शुक्ल,
योगदानहिंदी साहित्य के इतिहास
कार्यलेखक
निबंध( i ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , ( ii ) तुलसी का भक्ति मार्ग आदि
कार्यकालसन् 1920-1936
शिक्षाबनारस हिंदू विश्वविद्यालय
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आचार्य शुक्ल के निबन्ध – सम्बन्धी विचार

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay : निबन्ध के स्वरूप के सम्बन्ध में आचार्य शुक्ल के विचार दो रूपों में प्राप्त होते हैं उनके द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य के इतिहास में एवं इधर – उधर बिखरे हुए रूप में हिन्दी साहित्य के इतिहास में निबन्ध के बारे में शुक्लजी ने लिखा है कि ” यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है , तो निवन्ध गद्य की कसौटी है । भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निवन्धों में ही सबसे अधिक सम्भव होता है ।

निबन्ध या गद्य – विधान कई प्रकार के हो सकते हैं विचारात्मक , भावात्मक , वर्णनात्मक , लेखक प्रसंग के अनुसार इन विधाओं का बड़ा सुन्दर मेल भी करते हैं। आधुनिक पाश्चात्य लक्षणों के अनुसार निबन्ध उसी को कहना चाहिए , जिसमें व्यक्तित्व अर्थात् व्यक्तिगत विशेषता हो । व्यक्तिगत विशेषता का यह अर्थ नहीं है कि उसके प्रदर्शन के लिए विचारों की श्रृंखला रखी ही न जाए ।

आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय : शुक्लजी भावात्मक निबन्धों में तो किसी सीमा तक विचार शैथिल्य को क्षमा कर देते हैं , परन्तु विचारात्मक निबन्धों में विचार श्रृंखला के शैथिल्य को वह अक्षम्य बताते हैं । ” शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है , जहाँ एक – एक पैराग्राफ में हो ।


acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay : ” विचार दवा दवा कर कसे गए हो अर्थात् एक – एक वाक्य किसी सम्बद्ध विचार खण्ड के लिए अपनी मान्यताओं की कसौटी के अनुसार , शुक्लजी ने बहुत कम निबन्धों को सराहा है । वह भावात्मक शैली का प्रयोग घोर विचार शैथिल्य तथा बुद्धि के आलस्य का प्रतीक मानते हैं ।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय कक्षा 10

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शुक्लजी के निबन्ध

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay शुक्लजी के निबन्ध – शुक्लजी के निबन्ध चिन्तामणि भाग -1 में संकलित हैं । इनके निबन्ध प्रायः दो प्रकार के हैं-
( i ) जीवन में सम्बन्ध रखने वाले अर्थात् सामान्य विषयों पर लिखे निबन्ध , तथा
( ii ) साहित्यशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले अर्थात् आलोचनात्मक निवन्ध ,

इन्हें क्रमशः रचनात्मक और विचारात्मक निबन्ध भी कह सकते हैं । शुक्लजी के निबन्धों का वर्गीकरण सामान्यतः इस प्रकार किया जाता है – चिन्तामणि भाग -1 में संकेलित शुक्लजी के 19 निबन्धों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है , यथा

( क ) भाव या मनोविचार सम्बन्धी निबन्ध इनकी संख्या 10 है-

( 1 ) भाव या मनोविकार ,
( 2 ) उत्साह ,
( 3 ) श्रद्धा – भक्ति ,
( 4 ) करुणा ,
( 5 ) लज्जा और ग्लानि
( 6 ) लोभ और प्रीति
( 7 ) घृणा ,
( 8 ) ईर्ष्या ,
( 9 ) भय , एवं
( 10 ) क्रोध .

( ख ) समीक्षात्मक निबन्ध इनकी संख्या 9 है -इनके दो उपवर्ग किए जा सकते हैं –

( I ) व्यावहारिक समीक्षा सम्बन्धी निबन्ध-

( i ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ,
( ii ) तुलसी का भक्ति मार्ग , एवं
( iii ) मानस की धर्मभूमि .

( II ) सैद्धान्तिक समीक्षा सम्बन्धी निबन्ध-

( i ) कविता क्या है ?,
( ii ) काव्य में लोक मंगल की साधना ,
( iii ) साधारणी – कारण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद , एवं
( iv ) रसात्मक बोध के विविध रूप ।

इनका निवन्ध ‘ काव्य में रहस्यवाद ‘ एक पृथक् पुस्तक के रूप में प्रकाशित है । यह भी विचारात्मक अथवा आलोचनात्मक निबन्ध है ।

शुक्लजी की निबन्ध शैली

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay शुक्लजी की निबन्ध शैली – चिन्तामणि भाग -1 में निवेदन के अन्तर्गत शुक्लजी ने लिखा है कि “ इस पुस्तक में मेरी अन्तर्रात्मा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं । यात्रा के लिए निकलती रही है- बुद्धि , पर हृदय को भी साथ लेकर ‘ अपना रास्ता निकालती हुई बुद्धि ‘ जहाँ कहीं मार्मिक या भावात्मक स्थलों पर पहुँची है , वहाँ हृदय थोड़ा बहुत रमता और अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कहता गया है ।

इस प्रकार यात्रा के श्रम का परिहार होता रहा है । बुद्धि पथ पर हृदय भी अपने लिए कुछ – न – कुछ पाता रहा है । ” स्पष्ट है कि शुक्लजी के निबन्धों में बुद्धि तत्व और हृदय तत्व का मणि कांचन संयोग उपलब्ध होता है ।

शुक्लजी की निवन्ध शैली की सामान्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-

आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय : अतलदर्शी प्रतिभा , गूढ़ गुम्फित विचार परम्परा , मौलिकता , सशक्त प्रतिपादन शैली , विषय सम्बद्धता , विवेचन की समाहाट शक्ति , वैज्ञानिकता विचारों की अनुगामिनी भाषा तथा बुद्धि पक्ष एवं हृदय पक्ष का शास्त्रीय प्रक्रिया व्यक्तित्व की गहरी छाप , व्यंग्य विनोद का पुट , गोचर विधान , भाषा की सामंजस्य , शुक्लजी के मनोविकार सम्बन्धी निबन्धों में शुक्लजी के व्यापक जीवन दर्शन और अध्ययन के साथ उनके स्वतंत्र चिन्तन और उनकी भावुकता का ऐसा कलात्मक समन्वय उपलब्ध होता है , जिससे प्रतिपाद्य विषय में एक विशिष्ट उत्कर्ष , आकर्षण और गाम्भीर्य का समावेश हो गया है।

इन्हें पढ़कर चिन्तन के विकास के लिए नए क्षेत्रों की उपलब्धि होती है । यह पाठक के चिन्तन को प्रभावित भी करते हैं और उसको उद्बुद्ध भी करते हैं । निबन्धों पर शुक्लजी के व्यक्तित्व , चिन्तक एवं कुशल अध्यापक की छाप मुखर रहती है ।  भाषा सरल , साहित्यिक सौन्दर्य से मण्डित है । बीच – बीच में व्यंग्य विनोद के छींटे पाठक का रंजन एवं श्रम का परिहार करते चलते हैं । अपनी गम्भीर संयत एवं मार्मिक शैली में इन्होंने छोटे – छोटे वाक्यों के द्वारा विषय को एकदम स्पष्ट एवं हृदयंगम करा देते हैं । शुक्ल का अध्यापक रूप एकदम उभर कर आ जाता है ।

वह अनुच्छेद निबन्धों में ( पैराग्राफ ) के प्रारम्भ में सूत्र रूप में सिद्धान्त एवं नियम का प्रतिपादन कर देते हैं और अंत में सारांश यह कह कर प्रतिपाद्य विषय को एकदम स्पष्ट कर देते हैं । बीच में व्याख्या करते हैं और आवश्यकतानुसार जीवन एवं जगत् से व्यावहारिक उदाहरण देकर विषय को सर्वथा बोधगम्य कर देते हैं । आवश्यकतानुसार यथास्थान वह सूक्तिपरक वाक्यों का भी प्रयोग करके पाठक की । चिन्तन पद्धति को उत्तेजित करते चलते हैं , यथा ‘ यदि प्रेम स्वप्न है , तो श्रद्धा जागरण है ।

‘ शब्द – भण्डारण के प्रति भी शुक्लजी की दृष्टि एक कुशल अध्यापक की है। वह यह नहीं देखते हैं कि शब्द किस भाषा का है , बल्कि यह देखते हैं कि अपना मन्तव्य प्रकट करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द कौनसा है ? हम देख सकते हैं कि शुक्लजी ने संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों के अतिरिक्त देशज एवं विदेशी ( अरबी , फारसी एवं अंग्रेजी ) शब्दों का निस्संकोच प्रयोग किया है ।

शुक्लजी का स्थान एवं महत्व

आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय शुक्लजी का स्थान एवं महत्व– शुक्लजी के नाम पर एक युग का प्रवर्तन ही नहीं हुआ , अपितु उनके बाद भी निबन्ध साहित्य के क्षेत्र में शुक्ल परम्परा का निर्वाह किया गया है । शुक्लोत्तर युग में उनकी परम्परा पर निबन्ध लिखने वाले प्रमुख हस्ताक्षर हैं – बाबू गुलाबराय , श्री वियोगी हरि , आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी , डॉ . हजारी प्रसाद द्विवेदी , डॉ . रामविलास शर्मा तथा डॉ . नगेन्द्र ।

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay : ये निबन्धकार शुक्लजी की भाँति काव्य का लक्ष्य रस तथा साहित्य को जीवन की अभिव्यक्ति मानते हैं । शुक्लजी के निबन्धों को देखकर कहा जा सकता है कि उनका हृदय कवि का , मस्तिष्क आलोचक का तथा जीवन अध्यापक का है । इन तीनों कवि , आलोचक तथा अध्यापक का समन्वय ही वस्तुतः हिन्दी निबन्ध साहित्य को शुक्लजी का योगदान है । शुक्लजी ने निबन्ध साहित्य के विकास का मार्ग प्रशस्त ही नहीं किया , बल्कि इसको एक नई दिशा भी प्रदान की ।

acharya ramchandra shukla ka jeevan parichay FAQ

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म कब हुआ?

4 अक्टूबर 1882

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की रचना का नाम बताये!

( 1 ) भाव या मनोविकार ,( 2 ) उत्साह ,( 3 ) श्रद्धा – भक्ति ,( 4 ) करुणा ,( 5 ) लज्जा और ग्लानि

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की निबंध शैली बताये!

शुक्लजी की निबन्ध शैली – चिन्तामणि भाग -1

अचार रामचंद्र शुक्ल की भाषा शैली क्या है?

संस्कृत के तत्सम एवं तद्भव शब्दों के अतिरिक्त देशज एवं विदेशी ( अरबी , फारसी एवं अंग्रेजी ) शब्दों का प्रयोग


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