Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay
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Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर , भारत के औषधि उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी , जिन्होंने 80 वर्ष पूर्व विदेशी कम्पनियों को भारतीय रोगियों की परिस्थिति का लाभ उठाकर अंधाधुंध लाभ कमाने से रोकने हेतु अपने घर में ही औषधियाँ बनाना प्रारम्भ किया । वह एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि अर्जित की ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : उनका वेतन रसायनशास्त्र विभाग को दान कर दिया जाता था और इस दान से विभाग के विकास कार्य चलते तथा निर्धन छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती , यह महान् व्यक्ति थे-
       ———————वैज्ञानिक आचार्य डॉ . प्रफुल्लचन्द्र राय ।

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प्रफुल्लचन्द्र राय का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : प्रफुल्लचन्द्र राय का जन्म खुलना जिले ( वर्तमान बांग्लादेश में ) के राऊली – कतिपारा में 2 अगस्त , 1861 को हुआ था । उनके पिता श्री हरिश्चन्द्र संस्कृत , फारसी तथा अंग्रेजी भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे । शिक्षा में गहन रुचि , विवेकपूर्ण चिन्तन , निर्धनों के प्रति सहानु भूति , संवेदना आदि सद्गुण प्रफुल्ल चन्द्र राय को अपने पिता से ही प्राप्त हुए ।

यहाँ उन्होंने लगन के प्रफुल्लचन्द्र राय की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम की ही प्राथमिक पाठशाला से प्रारम्भ हुई , सन् 1870 में हरिश्चन्द्र अपने परिवार को कलकत्ता ले आए , ताकि उनके बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके । यहाँ प्रफुल्लचन्द्र राय को हरे स्कूल साथ गहन अध्ययन किया , किन्तु पेचिश की बीमारी ने उन्हें स्कूल छोड़ने को बाध्य कर दिया ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : बीमारी शनैः शनैः समाप्त हो गई , किन्तु उनके स्वास्थ्य पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ गई  । वह जीवनपर्यन्त अपच तथा अनिद्रा के रोगी बने रहे । बीमारी के मध्य उन्होंने अपने पिता के पुस्तकालय का भरपूर लाभ उठाया तथा सस्कृत , बगला एवं अंग्रेजी की विविध विषयक पुस्तकें पढ़ डालीं । सन् 1876 में उन्होंने कलकत्ता के अल्बर्ट स्कूल में दाखिला लिया , घोर परिश्रम करने के फलस्वरूप उन्होंने परीक्षा में प्रथम स्थान अर्जित किया । उन्होंने अनेक पुरस्कार जीते।

आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय जीवनी चार्ट

1नामआचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय
2जन्म2 अगस्त 1861
3जन्म स्थानरारूली, खुलना, बंगाल प्रेसिडेन्सी, ब्रितानी भारत
4मृत्यु16 जून 1944 (उम्र 82)
5मृत्यु स्थानकोलकाता, भारत
6स्थापनादि बंगाल केमिकल एण्ड फार्मास्युटिकल वर्क्स
7योगदान रसायन विज्ञान, औषधि
8ग्रन्थ ‘ दि हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री
9पिताश्री हरिश्चन्द्र
10शिक्षा खुलना जिले ( वर्तमान बांग्लादेश में ) के ग्राम की ही प्राथमिक पाठशाला से
Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay

प्रफुल्लचन्द्र राय के आरंभिक जीवन मे मुसीबते


Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : उनके पिता की वित्तीय स्थिति अत्यन्त दयनीय होती जा रही थी । ऋणों का भुगतान करने हेतु उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति बेचने को बाध्य होना पड़ा । उन दिनों लन्दन यूनीवर्सिटी गिलक्राइस्ट प्राइज स्कॉलरशिप हेतु प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का आयोजन किया करती थी । राय ने अति कठिन परिश्रम करके इस परीक्षा को पास किया और 1882 में ब्रिटेन चले गए ।

Acharya Prafullachandra Rai biography :  सफल प्रत्याशी उच्च शिक्षा हेतु विदेश जा सकते थे । प्रफुल्लचन्द्र वहाँ उन्होंने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में बी.एस – सी . में प्रवेश लिया। विश्वविद्यालय में वह रसायनशास्त्र के प्रोफेसर श्री क्रम ब्राऊन से अत्यधिक प्रभावित हुए । अब रसायनशास्त्र उनका सर्वाधिक प्रिय विषय बन गया ।

जब प्रफुल्लचन्द्र राय बी.एस – सी . उपाधि परीक्षा की तैयारी कर रहे थे , तभी एक दिन उनका नाम प्रायः सभी प्रमुख ब्रिटिश समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ , जिसने उन्हें प्रसिद्ध कर दिया । इसके पीछे की कहानी बड़ी ही रोचक है । यह मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम को प्रकट करती है ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : वह हमेशा उस दिन की कल्पना किया करते , जब भारत स्वाधीन होगा । सन् 1885 में यूनीवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग में घोषणा की गई कि ‘ विद्रोह के पूर्व तथा पश्चात् का भारत ‘ विषय पर श्रेष्ठ निबंध लिखने वाले को पुरस्कृत किया जाएगा ।

प्रफुल्लचन्द्र राय ने इसमें भाग लेने का निर्णय लिया । उन्होंने भारत की ऐतिहासिक , राजनीतिक तथा आर्थिक स्थितियों का गहनता से अध्ययन किया । पश्चात् लेख लिखकर प्रेषित कर दिया । परिणाम घोषित हुए । पुरस्कार एक अन्य विद्यार्थी को मिला , किन्तु निर्णायकों ने प्रफुल्लचन्द्र राय का लेख अत्यन्त उच्च श्रेणी का माना ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : यह लेख भारत में ब्रिटिश सरकार की आलोचना से परिपूर्ण था , किन्तु उसमें हास्य का भी पुट था । इसकी एक प्रति महान् सांसद जॉन ब्राइट के पास प्रेषित की गई , जिन्हें भारत का मित्र माना जाता था । जॉन ब्राइट ने उन्हें जो उत्तर दिया , वह लन्दन के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ । इसने प्रफुल्लचन्द्र राय को प्रसिद्ध कर दिया ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : एक छात्र होते हुए भी उन्होंने इंगलैण्ड के निवासियों को यह समझाने का प्रयास किया कि पराधीनता में भारत क्या भुगत रहा है ? उसकी स्थिति कैसी है ? प्रफुल्लचन्द्र राय ने बी.एस – सी . की उपाधि 1885 में प्राप्त की । इसके पश्चात् उन्होंने रसायनशास्त्र में शोध कार्य किया ।उनके मौलिक कार्य के कारण उनके शोध ग्रन्थ के आधार पर उन्हें डी.एस – सी . की उपाधि प्रदान की गई । उन्हें विश्वविद्यालय की ‘ होप प्राइज स्कॉलर शिप ‘ प्राप्त हुई , जिसने उन्हें विश्वविद्यालय में एक और वर्ष तक अपना कार्य जारी रखने का अवसर प्रदान किया।

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1888 मे प्रफुल्लचन्द्र राय  का भारत आगमन

Acharya Prafullachandra Rai biography : प्रफुल्लचन्द्र राय 1888 में भारत वापस आए । योग्य होते हुए भी शिक्षा विभाग में उन्हें नौकरी न प्राप्त हो सकी , क्योंकि समस्त उच्च पद अंग्रेजों के लिए आरक्षित थे । लगभग एक वर्ष तक उन्होंने अपने विख्यात मित्र जगदीशचन्द बोस के साथ उनकी प्रयोगशाला में कार्य किया । सन् 1889 में वह कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में रसायनशास्त्र के असिस्टेण्ट प्रोफेसर नियुक्त हुए । उन्होंने अत्यन्त उत्साह से अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया । परिणामस्वरूप उन्हें एक सफल तथा प्रेरणादायक शिक्षक के रूप में अति प्रसिद्धि प्राप्त हुई ।

Acharya Prafullachandra Rai biography :  इस समय भारतीय रोगियों के लिए दवाइयाँ विदेश से आती थीं । इससे भारत की पूंजी बाहर चली जाती थी । प्रफुल्लचन्द्र राय ने इसे रोकना आवश्यक समझा । यद्यपि वह गरीबी की स्थिति में थे , तथापि उन्होंने इस महत्वाकांक्षी प्रयास का जोखिम उठाया । उन्होंने कुछ रसायन अपने घर में ही तैयार करना प्रारम्भ कर दिया । उनका काम इतनी तेजी से बढ़ा कि एक पृथक् कम्पनी की स्थापना आवश्यक हो गई ।

अनेक अड़चनों के बावजूद उन्होंने ‘ दि बंगाल केमिकल एण्ड फार्मास्युटिकल वर्क्स ‘ की स्थापना की , जो बढ़कर एक बटवृक्ष बन गई । इसके अतिरिक्त वह प्रेसीडेंसी कॉलेज में अपनी प्रयोगशाला में अनुसंधान कार्य में सक्रियतापूर्वक संलग्न रहे । ‘ मरक्यूरस नाइट्राइट ‘ तथा उसकी व्युत्पत्ति सम्बन्धी उनके प्रकाशनों से उन्हें सम्पूर्ण विश्व में मान्यता अर्जित हुई ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में अनेक छात्रों को उनके शोध कार्य में मार्गदर्शन दिया । यहाँ तक कि विदेशों की विख्यात वैज्ञानिक पत्रिकाओं ने उनके वैज्ञानिक शोध – पत्र प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया । प्रफुल्लचन्द्र राय प्रारम्भ से ही प्राचीन हिन्दू रसायन के शास्त्रों द्वारा किए कार्यों एवं खोजों में रुचि रखते थे।

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प्रफुल्लचन्द्र राय का ग्रन्थ और महात्मा गांधी जी से भेट

Acharya Prafullachandra Rai biography : अनेक वर्षों के अध्ययन के पश्चात् प्रफुल्लचन्द्र राय ने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘ दि हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री ‘ प्रकाशित किया । सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिकों ने उसकी सराहना की । अपने इस ग्रन्थ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि हिन्दू वैज्ञानिकों को इस्पात बनाने , नमक , सल्फाइड , भाप जमा कर सत्व निकालने की प्रक्रिया आदि का ज्ञान प्रारम्भ से था ।

सन् 1901 में प्रफुल्लचन्द्र राय अपने मित्र गोपालकृष्ण गोखले के निवास स्थान पर प्रथम बार महात्मा गांधी से मिले । गांधीजी की सादगी , राष्ट्रभक्ति व कर्त्तव्य के प्रति समर्पण भावना ने उन्हें प्रभावित किया । गांधीजी के मन में भी प्रफुल्लचन्द्र राय के प्रति सम्मान था । जब कभी बाढ़ से विनाश उत्पन्न होता , तब प्रफुल्लचन्द्र राय पीड़ितों की सहायता हेतु वहाँ पहुँच जाते ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : इससे महात्मा गांधी उन्हें ‘ बाढ़ों का डॉक्टर ‘ कहने लगे । सन् 1904 में वह एक अध्ययन दौरे पर यूरोप गए और वहाँ उन्होंने अनेक रासायनिक प्रयोगशालाओं का निरीक्षण किया । वहाँ वैज्ञानिकों ने उनका जोरदार स्वागत किया । उन्होंने मरकूयरस नाइट्राइट , अमोनियम नाइट्राइट आदि पर उनके ग्रन्थों की सराहना की । कुछ विश्वविद्यालयों ने उनको डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से अलंकृत किया ।

प्रफुल्लचन्द्र राय और भारत का इतिहास


Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : उन्होंने विलियम रेम्से , जेम्स डेवर , वाण्ट हाफ व बर्थ लाट जैसे विख्यात वैज्ञानिकों से मित्रता स्थापित की । प्रफुल्लचन्द्र राय ने एक अवसर पर कहा था कि “ जब यूरोप के लोग यह नहीं जाने थे कि कपड़ा किस प्रकार बनाया जाता है ? वे जानवरों की खाल पहन रहे थे और वनों में घूमा करते थे , उस समय भारतीय वैज्ञानिक आश्चर्यजनक रसायन बना रहे थे ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : इस तथ्य पर हमें गर्व करना चाहिए । ” परन्तु प्रफुल्लचन्द्र राय यह भी जानते थे कि अतीत पर गर्व करने के लिए मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं है । हमें अपने पूर्वजों का अनुसरण करना चाहिए और विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञानार्जन तथा प्रगति करनी चाहिए । सन् 1921 में , जबकि वह 60 वर्ष के हुए उन्होंने रसायनशास्त्र की प्रगति हेतु तथा दो अनुसंधान छात्रवृत्तियाँ जारी करने हेतु विश्वविद्यालय की शेष सेवा का समस्त वेतन अग्रिम रूप में दान कर दिया था ।

प्रफुल्लचन्द्र राय की उपलब्धियां और सम्मान


Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : यह दान की राशि लगभग दो लाख रुपए थी । इसके अतिरिक्त उन्होंने रसायनशास्त्र में वार्षिक अनुसंधान पुरस्कार हेतु महान् भारतीय रसायनवेत्ता नागार्जुन के नाम पर दस हजार रुपए की राशि तथा इसी प्रकार दस हजार रुपए की एक अन्य धनराशि प्राणीशास्त्र में अनुसंधान पुरस्कार हेतु सर आशुतोष मुखर्जी के नाम पर जारी करने हेतु दी ।

उनका जीवन उच्च विचार एवं सादा जीवन के आदर्श का मूर्त रूप था । उनके द्वारा दिए गए अनुसंधानों के कारण मान्यतास्वरूप उन्हें ‘ इण्डियन साइंस कांग्रेस ‘ तथा ‘ इण्डियन केमिकल सोसायटी ‘ का अनेक बार अध्यक्ष चुना गया । अनेक भारतीय तथा पाश्चात्य विश्वविद्यालयों ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधियों से अलंकृत किया । उन्हें साहित्य से भी बहुत लगाव था ।

प्रफुल्लचन्द्र राय जी का आत्मकथा और छात्रों की शिक्षा मे योगदान


Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : उन्हें शेक्सपियर के नाटकों के अनेक अंश तथा कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएँ कण्ठस्थ थीं । वह अंग्रेजी साहित्य के मर्मज्ञ थे । सन् 1932 में अंग्रेजी में अपनी आत्मकथा लिखी । इस ग्रन्थ का नाम था – ‘ दि लाइफ एण्ड एक्सपीरिएन्स ऑफ ए बंगाली केमिस्ट ‘ । इसकी सर्वत्र सराहना हुई ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : वह राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् के अध्यक्ष थे । उनका विश्वास था कि छात्रों के लिए मात्र उपाधियाँ प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं , उन्हें वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रयास करना चाहिए । छात्रों को तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर अपना स्वयं का व्यवसाय प्रारम्भ करना चाहिए । युवकों को स्वतः व्यापार तथा उद्योगों में प्रविष्ट होना चाहिए । उन्होंने कहा कि स्कूलों एवं महाविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए । समाज शिक्षा प्रफुल्लचन्द्र राय के जीवन में एक महान् आदर्श था ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : वह कहा करते थे कि किसी की सम्पत्ति का श्रेष्ठतम सदुपयोग उसका जनसेवा में व्यय करना होता है । उन्होंने अपनी समस्त आय अपने छात्रों तथा अपने आसपास के जरूरतमन्द लोगों में व्यय की । वह अपनी आय का बहुत ही थोड़ा अंश स्वयं की आवश्यकताओं पर व्यय करते थे ।

प्रफुल्लचन्द्र राय जी का समाज सेवा में योगदान


Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : सन् 1921 में खुलना जिले में अकाल पड़ा तथा सन् 1922 में उत्तरी बंगाल में भयंकर बाढ़ आई । लाखों व्यक्ति बेघरवार हो गए । जब उन्होंने सरकार से सहायता की याचना की , तो भी उस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया । प्रफुल्लचन्द्र राय ने एक राहत समिति गठित की । अपने छात्रों एवं यूरोपीय व भारतीय नागरिकों की सहायता से उन्होंने कपड़े तथा खाद्यान्न के साथ ही भारी धनराशि भी एकत्रित की ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : ये वस्तुएँ पीड़ित लोगों को तत्काल दी गई । उनके मन में चरखा एवं खादी आन्दोलन के प्रति भारी आदर था । उसकी उपयोगिता को समझते हुए वह प्रतिदिन एक घण्टा सूत कातते थे । खादी के प्रति गहन प्रेम के कारण उनके कुछ मित्र उन्हें ‘ चरखा श्री ‘ कहा करते थे । उनके मन में उत्कट देशभक्ति की भावना हिलोरें लिया करती थी , परन्तु उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग कभी नहीं लिया ।

Acharya Prafullachandra Rai biography : उनकी मान्यता थी कि देश को आजाद करने के साथ शिक्षित और सम्पन्न बनाने की भी आवश्यकता थी । जब उनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि वह कौंसिल के लिए खड़े हों , तो उनका उत्तर था कि ” देश को वैज्ञानिकों की भी जरूरत है . जब देश में तीस रसायनशास्त्री पैदा हो जाएंगे , तब मैं अपना काम छोड़कर राजनीति में भाग लूँगा . ” वह गांधीजी के चरखा के प्रधान प्रचारक बन गए थे । प्रफुल्लचन्द्र राय अपने छात्रों के प्रति बड़ा ही स्नेह रखते थे । वह कहा करते थे कि , “ व्यक्ति सदैव ही विजय की कामना करता है , परन्तु उसे अपने ही शिष्य के हाथों अपनी पराजय का स्वागत करना चाहिए । “

निष्कर्ष

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : डॉ . मेघनाथ साह व डॉ . शान्तिस्वरूप भटनागर जैसे विख्यात भारतीय वैज्ञानिक उनके शिष्यों में थे । उन्होंने मातृभाषा को स्कूली शिक्षा का माध्यम बनाने की वकालत की । वह विख्यात रूसी वैज्ञानिक मेण्डलीफ का उदाहरण दिया करते थे जो अपने पीरियाडिक लॉ ( आवर्त सारणी ) के लिए विख्यात थे । उन्होंने अपने शोध कार्य के परिणाम रूसी भाषा में प्रकाशित कराए थे । इसने उनकी महत्वपूर्ण खोज का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्य राष्ट्रों के वैज्ञानिकों को रूसी भाषा का अध्ययन करने हेतु बाध्य कर दिया . यदि हम नया ज्ञान विकसित करते हैं , तो अन्य देश के लोगों को हमारी भाषा सीखनी होगी ।

Acharya Prafullachandra Rai jiwan parichay : जब भारत विदेशी शासकों के अधीन था तथा देश में वैज्ञानिक अनुसंधान हेतु अत्यन्त कम सुविधाएँ थीं , उन्होंने अपने मेधावी शोध द्वारा न केवल भारत में , बल्कि विदेशों में भी ख्याति अर्जित की ।वह एक ऐसे वैज्ञानिक थे जो महान् मानवीय गुणों से ओतप्रोत थे । साथ ही एक महान् राष्ट्रभक्त व सामाजिक कार्यकर्ता थे । 16 जून , 1944 को विज्ञान कॉलेज में यह महान् वैज्ञानिक देशभक्त स्वतन्त्रता प्राप्ति के मात्र तीन वर्ष पूर्व गोलोकवासी हो गया . भारत एक अमूल्य निधि से वंचित हो गया ।

आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय के प्रमुख शिष्य कौन थे?

सत्येन्द्रनाथ बोसमेघनाद साहा, ज्ञानेन्द्रनाथ मुखर्जी, ज्ञानचन्द्र घोष

प्रफुल्लचन्द्र राय जी का आत्मकथा का नाम क्या है?

दि लाइफ एण्ड एक्सपीरिएन्स ऑफ ए बंगाली केमिस्ट

प्रफुल्लचन्द्र राय जी का आत्मकथा कब लिखा गया था?

सन् 1932