Acharya Chatursen Shastri
Acharya Chatursen Shastri

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आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जीवन परिचय

Acharya Chatursen Shastri : उत्तर प्रदेश के जिला बुलन्दशहर में सिकन्दराबाद के पास एक छोटा – सा गाँव है । चांदौख इसी गाँव में एक क्षत्रिय परिवार में 26 अगस्त , 1891 को आचार्य चतुरसेन शास्त्री का जन्म हुआ । जन्म के बाद बालक का नामकरण संस्कार करते हुए पंडित ने कहा , “ राशि के हिसाब से तो इसका नाम चतुर्भुज होगा , परन्तु मैं इसे कुलदीपक ही कहूँगा । ” बालक के पिता केवलराम ठाकुर कम पढ़े – लिखे , एक सामान्य व्यक्ति थे । पंडित की बात पर हैरानी से उन्होंने पूछा– “ आखिर ऐसा क्यों ?

Acharya Chatursen Shastri : तो पंडित ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया , “ लड़के के ग्रह तुम्हारे घर के योग्य नहीं हैं , जिएगा तो कुल का मान बढ़ाएगा , कुलदीपक कहलाएगा । ” यही बालक चतुर्भुज बड़ा होकर प्रसिद्ध कथाकार , उपन्यासकार चतुरसेन शास्त्री बना। हालांकि इनसे पहले इनके परिवार में किसी ने कलम भी नहीं पकड़ी थी पिता को अक्षर ज्ञान था , किन्तु माँ नन्हीं देवी बिलकुल अनपढ़ थीं ।

Acharya Chatursen Shastri : ऐसे में लेखन का जो गुण शास्त्रीजी ने पाया , वह उनका खुद का निर्मित था । हाँ , माता – पिता ने उनकी तीव्र बुद्धि और पढ़ने में रुचि देखकर उनकी शिक्षा की व्यवस्था अवश्य की ।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री जीवनी चार्ट

नामआचार्य चतुरसेन शास्त्री
जन्म26 अगस्त , 1891
जन्म स्थानसिकन्दराबाद के गाँव – चांदौ मे
मृत्यु2 फरवरी , 1960
माता-पितानन्हीं देवी-केवलराम ठाकुर
राष्ट्रीयभारतीय
फिल्मधर्मपुत्र 1961
पेशालेखक
कार्यडॉक्टर- औषधी
शिक्षासिकन्दराबाद के ही एक स्कूल में
पहला उपन्यासहृदय की परख
आत्मकथायादों की परछाइयाँ
Acharya Chatursen Shastri

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का शिक्षा और आरंभि जीवनी

माँ – बाप चाहते थे कि लड़का पढ़ – लिखकर किसी योग्य बन जाए । सिकन्दराबाद के ही एक स्कूल में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई । फिर ये कुछ दिनों के लिए काशी गए और उसके बाद जयपुर के संस्कृत कॉलेज में भर्ती हुए । यहीं से सन् 1915 में आयुर्वेद और संस्कृत शास्त्री की परीक्षाएँ एकसाथ उत्तीर्ण की । उसी वर्ष आयुर्वेद विद्यापीठ से आयुर्वेदाचार्य की परीक्षा भी उत्तीर्ण की । आयुर्वेद विद्यापीठ के ये प्रथम आयुर्वेदाचार्य थे ।

Acharya Chatursen Shastri : शिक्षा समाप्त कर ये दिल्ली आ गए , तब तक इनके मन में लेखक बनने की कोई विशेष चाह नहीं थी । इनके जीवन का प्रथम उद्देश्य था- एक योग्य चिकित्सक बनना इसका कारण यह था कि बचपन से अपने आसपास दुःखी और बीमार लोगों को ही देखते आए थे । गाँव में छोटी – छोटी बीमारियों से लोगों को मरते हुए इन्होंने देखा था । मन से भावुक और संवेदनशील होने के कारण वह चाहते थे लोगों को स्वस्थ और सुखी बनाना ।

फिर उन्हें यह भी लगता था कि वैद्य बनकर मान – सम्मान के साथ धन की प्राप्ति भी होती है और स्वामि भर गई थी । शायद यही कारण था कि जयपुर संस्कृत कॉलेज में पढ़ते हुए कभी अपने पिता मान का भी कहीं हनन नहीं होता । कम उम्र से ही स्वाभिमान की मात्रा कुछ ज्यादा ही उनमें से पढ़ाई के लिए कुछ नहीं माँगा , बल्कि आर्य समाज का कुछ काम करके अपने खर्च प्रबंध किया ।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का औषधालय

Acharya Chatursen Shastri biography : दिल्ली आकर उन्होंने अपना औषधालय खाला , किन्तु अनुभव की कमी के कारण वह औषधालय चला नहीं । इनकी आर्थिक स्थिति बहुत बिगड़ गई । यहाँ तक की घर का खर्च चलाने के लिए पत्नी के जेवर तक बेचने पड़े । तब अपना औषधालय बंद करके एक सेठ के औषधालय में ₹ 25 माहवार पर नौकरी कर ली । कुछ ही समय बाद सन् 1917 में डी.ए.वी. कॉलेज , लाहौर में उन्हें सीनियर आयुर्वेद प्रोफेसर की नौकरी मिली .l.

ये लाहौर चले गए , किन्तु वहाँ भी एक वर्ष से ज्यादा नहीं टिक पाए , क्योंकि व्यवस्थापकों से इनकी बनी नहीं व्यवस्थापक किसी भी शिक्षक को एक नौकर से अधिक नहीं समझते थे और यह इनसे सहन नहीं हुआ । वहाँ से ये अजमेर अपने श्वसुर के यहाँ आ गए । श्वसुर का भी एक औषधालय या ‘ कल्याण औषधालय ’ । श्वसुर के कहने पर ये भी उसी औषधालय में बैठने लगे और कुछ ही समय में ये अपने श्वसुर से भी अधिक प्रसिद्ध हो गए ।

Acharya Chatursen Shastri biography: अजमेर के बड़े – बड़े सेठों के घरों में भी चिकित्सा के लिए यह जाने लगे । बाद में राजस्थान के कई राजघरानों तक इनकी पहुँच हो गई । एक चिकित्सक के रूप में इनकी ख्याति दिन – प्रतिदिन बढ़ती ही गई । एक चिकित्सक के रूप में तरह – तरह के लोगों के संसर्ग और सम्पर्क में इन्हें आना पड़ा । जिंदगी का जो विविध रूप इन्हें देखने को मिला , अपनी जिंदगी के संघर्षों से जिस तरह इन्हें जूझना पड़ा , उसने इन्हें लेखनी थामने के लिए मजबूर किया ।

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आचार्य चतुरसेन शास्त्री का पहला उपन्यास

Acharya Chatursen Shastri biography : तरह – तरह की घटनाएँ दुर्घटनाएँ , सुखद और त्रासद स्थितियों ने इनके अन्दर जो रचनात्मक शक्ति भरी , वह अद्भुत थी। सन् 1918 में इनका पहला उपन्यासहृदय की परख ‘ छपा । इस उपन्यास से एक लेखक के रूप में इन्हें कोई विशेष प्रतिष्ठा तो नहीं मिली , किन्तु लेखन के प्रति इनका चाव बढ़ा । सन् 1921 में इनकी एक किताब आई ‘ सत्याग्रह और असहयोग ‘ । यह एक राजनीतिक पुस्तक थी , तब देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का जोर था और महात्मा गांधी का प्रभाव पड़ चुका था , किन्तु उनकी नीतियों से चतुरसेन शास्त्री सहमत नहीं थे , अतः यह पुस्तक लिखी ।

Acharya Chatursen Shastri biography : हालांकि यह एक आलोचनात्मक पुस्तक थी , फिर भी गांधी – भक्तों ने इसे भी चाव से पढ़ा क्योंकि उनका मानना था कि यह पुस्तक गांधीजी से सहानुभूति रखने वाले एक व्यक्ति द्वारा लिखी गई है न कि किसी विरोधी द्वारा यह तत्कालीन राजनीति की जरूरतों की मांग पर आधारित थी । इस कारण काफी पसंद की गई और शास्त्रीजी की पहचान एक लेखक के रूप में बन गई ।

Acharya Chatursen Shastri: परन्तु शास्त्रीजी का लगाव राजनीति से नहीं था . वह तो सामान्य व्यक्ति से जुड़े हुए थे चट्टाने ‘ , ‘ आलमगीर ‘ जैसे उपन्यास और सैकड़ों कहानियाँ हमारे सामने आई । शास्त्रीजी का और उनके लिए ही कुछ लिखना भी चाहते थे । अतः वह पुनः साहित्य – सर्जना की ओर मुड़े और तब ‘ वैशाली की नगर वधू ‘ , ‘ वयं रक्षामः ‘ , ‘ सोमनाथ ‘ , ‘ सोना और खून ‘ ,सह्याद्रि की पूरा साहित्य इतना विविध रंगी है तथा गुण और मात्रा दोनों के हिसाब से इतना विशाल है । कि किसी को भी आश्चर्य में डाल सकता है ।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का लेखन कार्य मे सफलता

Acharya Chatursen Shastri : उनके ऐतिहासिक उपन्यासों पर शोध करने ले डॉ . विद्याभूषण भारद्वाज ने अपने शोध ग्रंथ में एक जगह लिखा है , ” आचार्य चतुरसेन शास्त्री हिन्दी के उन महान् साहित्यकारों में हैं जिनके लिखित साहित्य के परिमाण , गुण और । विविधता को देखकर भावी पीढ़ियाँ कदाचित् यह विश्वास नहीं कर सकेंगी कि यह एक ।

व्यक्ति का साहित्य है और उस समय शायद वह और उनका साहित्य भी एक किंवदंती के विषय बन जाएंगे सूर के सवा लाख पद , एक रात्रि में ‘ रामचन्द्रिका ‘ की रचना आदि बातें आज अविश्वसनीय बन गई हैं , परन्तु आचार्यश्री का साहित्य पुनः यह विश्वास दिलाता है कि ये सजीव और प्रत्यक्ष वास्तविकताएँ थीं ।

Acharya Chatursen Shastri : ‘ कहानी , उपन्यास , नाटक , निबंध तथा साहित्येतर विषयों की करीब दो सौ पुस्तकों के रचयिता आचार्य चतुरसेन शास्त्री को भारतीय इतिहास और संस्कृति से गहरा लगाव था तथा उनका अध्ययन भी काफी प्रगाढ़ था । जिस किसी भी काल की कहानी हो , उस काल विशेष की सभ्यता , ग्रामीण और नगरीय जीवन , रीति – रिवाजों , वेशभूषा , बोलचाल , स्थापत्यकला चित्रण , सैन्य संगठन , राजा प्रजा सम्बन्ध , युद्ध आदि का वर्णन जितना जीवंत और प्रामाणिक शास्त्रीजी की रचनाओं में हुआ है , अन्यत्र दुर्लभ है ।

साथ ही समकालीन स्थितियों की विषमताओं और असंगतियों की ओर भी उनके उपन्यास बरावर हमारा ध्यान खींचते हैं । इतिहास की भूलों को हम फिर न दोहराएँ , इस तरह से सावधान करते हैं । यों तो शास्त्रीजी की चर्चा एक ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में ही अधिक रही है , किन्तु उनकी कीर्ति को अक्षय रखने वाला उपन्यास ‘ वयं रक्षामः ‘ पौराणिक आख्यानों पर आधारित है । रामकथा को आधार बनाकर लिखा जाने वाला यह उपन्यास भारतीय संस्कृति का पूरा इतिहास है ।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का आत्मकथा

Acharya Chatursen Shastri biography: इस उपन्यास के सम्बन्ध में शास्त्रीजी ने अपनी आत्मकथायादों की परछाइयाँ ‘ में लिखा है- “ धर्म के रंगीन चश्मे से देखकर जिन्हें ( राम को ) सारे संसार ने अंतरिक्ष का देवता मान लिया था , मैंने उन्हें नर – रूप में इस उपन्यास में आपके समक्ष उपस्थित करने का दुस्साहस किया है । ‘ वयं रक्षामः ‘ कहने भर को उपन्यास है , परन्तु वास्तव में वह मेरा दुस्सह अध्ययन है ।

इसे लिखकर मैंने प्राचीन आर्य संस्कृति और सभ्यता की विस्मृत बातों का मूर्त किया है । वेद – ब्राह्मण – पुराण – स्मृति आदि से मिस्र , मेसोपोटामिया , वेविलोन , पर्शिया और यूनान के अति प्राचीन इतिहास का तुलनात्मक अध्ययन है । देव – दैत्य दानव – नागयक्ष – रक्ष – मानव – आनव – आर्य व्रात्य – मत्स्य – गरुण – ऋक्ष – महिष आदि इतिहासातीत जातियों की अब तक अविश्रुत , विस्मृत , सर्वथा नवीन , साधारण असाधारण स्थापनाएँ हैं ।

Acharya Chatursen Shastri : ” शास्त्रीजी के समकालीन समीक्षकों आलोचकों ने उनकी रचनाओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया , क्योंकि वे शास्त्रीजी को एक व्यावसायिक लेखक मानते थे । शास्त्रीजी साहित्येतर विषयों पर भी खूब लिखते थे , किन्तु इसी कारण उनकी उच्चकोटि की रचनाओं को भी खारिज कर देना उचित नहीं जान पड़ता । शास्त्रीजी सर्वप्रथम एक चिकित्सक थे , अतः उनका ध्यान मनुष्य के स्वास्थ्य और शारीरिक – मानसिक विकास की ओर जाना स्वाभाविक था ।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का योगदान

Acharya Chatursen Shastri : उनकी लेखनी मनुष्य के हर दुःख – सुख से जुड़ी थी ।  जहाँ कहानी और उपन्यासों के माध्यम से वह लोगों को मानसिक सुख संतोष प्रदान कर रहे थे , वहीं अन्य विषयों की पुस्तकों से ‘ स्त्रियों के रोग और उनकी चिकित्सा ‘ , ‘ आहार और जीवन ‘ , ‘ बच्चे कैसे पाले जाएं ‘ , ‘ आप व्यक्ति के शारीरिक विकास को , स्वास्थ्य को सुरक्षा दे रहे थे ।

‘ पथ्यापथ्य ‘ , ‘ आरोग्य शास्त्र , कैसे भरपूर नींद सो सकते हैं ‘ , ‘ मातृकला ‘ , ‘ नीरोग और जीवन ‘ , ‘ स्वास्थ्य रक्षा ‘ आदि पुस्तकें या फिर युवक – युवतियों का पथ – निर्देश करने के लिए लिखी गई ‘ कुमारिकाओं के गुप्त पत्र , ‘ अविवाहितों के पेचीदा गुप्त पत्र ‘ , ‘ कामकला के भेद ‘ आदि पुस्तकें लिखने के वह सही अधिकारी थे ।

निष्कर्ष : मृत्यु

Acharya Chatursen Shastri : समाज और मनुष्य के हित में इन पुस्तकों की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता और न इनके महत्व को ही कम आँका जा सकता है । फिर ऐसी पुस्तकें भी उन्होंने उसी गंभीरता और आस्था के साथ लिखीं , जिस गंभीरता और आस्था के साथ कोई कहानी या उपन्यास लिखते होंगे । वास्तव में , चतुरसेन शास्त्री बहुत बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनाकार थे , जिन्होंने अपनी रचनात्मक ऊर्जा को वेद , पुराण , इतिहास , संस्कृत , साहित्य , विश्व इतिहास , मानव सभ्यता का इतिहास आदि के अध्ययन से प्रज्ज्वलित किया था ।

Acharya Chatursen Shastri biography : उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लेखन को समर्पित कर दिया था , या यों कहें कि जीवन को लेखन का पर्याय बना दिया था । सच्चे अर्थों में जो मसिजीवी थे और जिनके हाथ से जीवन के अन्तिम क्षणों तक कलम नहीं छूटी । 2 फरवरी , 1960 को जब उनका देहावसान हुआ , उससे पूर्व वह ‘ सोना और खून ‘ लिख रहे थे । इस उपन्यास को दस खण्डों में लिखने की उनकी योजना थी , जो पूरी न हो सकी । इस उपन्यास के चार खंड ही लिख पाए थे कि काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया , परन्तु इतना तय है कि कलम का ऐसा धनी व्यक्ति कभी – कभी ही जन्म लेता है ।

Acharya Chatursen Shastri FAQ

आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास के नाम बताये?

वयं रक्षामः ‘ , ‘ सोमनाथ ‘ , ‘ सोना और खून ‘ , ‘ सह्याद्रि की पूरा साहित्य इतना विविध रंगी है आदि।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री फ़िल्में के नाम बताये।

धर्मपुत्र – 1961

आचार्य चतुरसेन शास्त्री के कहानियाँ के नाम बताये।

सोमनाथ, Kaam-Kala Ke Bhed, वयं रक्षामः: प्राचीन युग की पृष्ठभूमि पर आधारित एक महान् मौलिक उपन्यास1955, गोली, वैशाली की नगरवधू 1957

चतुरसेन शास्त्री किस प्रांत के निवासी थे?

सिकन्दराबाद के पास एक छोटा – सा गाँव है चांदौ प्रांत यही के निवासी थे।

आचार्य चतुरसेन शास्त्री का अंतिम उपन्यास का नाम बताये?

सोना और खून